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Hasya Kahani: Credit Card ki Barsi/ हास्य कहानी: क्रेडिटकार्ड की बरसी

नमस्ते! आज बात किसी ऐसे की जिसको साथ होने पर हम कोसते रहते है पर जब पास न हो तो याद ज़रूर आती है| इंसान के जीवन में लगभग हर मोड़ पर ऐसा कोई मिलता ही है, चाहे यार हो या रिश्तेदार| अजी वो छोड़िये अपनी ही औलाद जब हाथ से निकल जाए तो क्या हम कोसते नहीं है? पर अपने तो अपने ही होते हैं, जब छोड़ कर चले जाते हैं तो हर छोटी से छोटी बात याद आती है|
आज इमोशनल होने का कारण और तिथी दोनों ही वाज़िब है, आज हमारे ऐसे ही सुख दुःख के साथी की दूसरी बरसी जो है| मैट ब्लैक फिनिश, उस पर चमकदार रंग से उभरता हमारा नाम साथ ही चमचमाता मास्टर कार्ड का लोगो…..जी हाँ हमारा अपना क्रेडिटकार्ड,….ठीक दो साल पहले आज ही के दिन एक्सपायर हुआ था| ना –ना करते हुए भी तेरह- चौदह साल का साथ तो रहा ही होगा| आज जब दीपावली की सफाई का ड्राई-रन चल रहा था तो अचानक पुराना लिफाफा हाथ में आ गया और वो दिन, वो सारी यादें आँख के सामने आ गई…..लगा मानों कल की ही बात हो……
नौकरी करते करीब तीन-चार साल बीत चुके थे और शुरुआती पड़ाव में ही हम बम्बई की चहल-पहल और लखनऊ की तहजीब देख चुके थे| जैसे ही लखनऊ छोड़ जबलपुर पहुंचे लगा कि गृहस्ती के नाम पर जो कुल जमा दो अटैची लिए फिरते थे अब उसको आगे बढ़ाने का समय आ चुका था| हालाँकि बैचलर थे पर लगा कब तक? आज नहीं तो कल गले मैं माला तो चढ़नी ही है…तो सबसे पहले 2BHK का बड़ा सा घर किराए पर ले लिया| पूरे घर में एक गद्दा, दो अटैची और हम….गलती से भी छींक निकल जाए तो ऐसा लगता था मानो किसी हिल स्टेशन के ईको पॉइंट पर खड़े हो….अपनी ही छींक घूम फिर कर तीन चार बार गूंजती थी| बड़े कॉर्पोरेट की नौकरी थी तो ऑफिस के सहकर्मियों के घर आने से पहले, घर रहने लायक दिखे ऐसा बनाना था….ऐसा नहीं था कि इसके पहले की नौकरियां बुरी थी जो गृहस्ती न जुटा पाए, पर लड़कपन की खुमारी उतरते- उतरते हम बंबई से लखनऊ और लखनऊ से जबलपुर पहुँच चुके थे|
वो उदाहरण तो आप ने सुना ही होगा न कि ‘दो पेपर कप लीजिये और उसके तले में सुराख़ कर दीजिए…एक में एक दो महीन सुराख़ और दुसरे कप में बहुत बड़ा छेद…फिर दोनों कप में पानी डालिए, बारीक सुराग वाले कप में पानी ठहरेगा और धीरे धीरे कर गिरेगा’, यह हुआ उधाहरण उनका जिनकी कमाई और खर्चे में बड़ा अंतर होता है….ठहरने वाला पानी यानी सेविंग| अब अगला उदाहरण हमारे जैसों के लिए….वही बड़े छेद वाला पेपर कप….जितना कमाया सब बाहर बिना किसी देरी के….काहे की सेविंग| माता-पिता तो कह-कह कर थक गए पर हमें तो यही लगता था कि जो आता है वो जाता ही है….एविंग-सेविंग सब मोह माया है|
खैर देर से ही सही सद्बुद्धि आई, लगा कि धीरे-धीरे ही सही पर अब गृहस्ती का सामान जोड़ा जाय| दोस्तों और सहकर्मियों से बात की तो सभी ने अपनी बुद्धि, विवेक और अनुभव के आधार पर अपनी –अपनी राय रख दी….शादी शुदा की राय अलग थी और कुवारों की अलग| न जाने क्यों ऐसी ही किसी राय में क्रेडिटकार्ड का जिक्र चल निकला…नाम तो याद नहीं पर ज़रूर कोई कुंवारा ही होगा, वरना शादी शुदा ऐसी राय दे, कम ही सुना है| हमने खुद शादी के बारह साल में कभी ऐसी सलाह न दी होगी|
तो ज़नाब क्रेडिटकार्ड में दिलचस्पी बढ़ी और थोड़ी रिसर्च के बाद एक नामी बैंक का क्रेडिटकार्ड अप्लाई कर दिया गया..घबराहट तो हो रही थी पर उस ज़माने में क्रेडिटकार्ड अपने आप में स्टेटस सिंबल हुआ करता था, तो एक अलग तरह का एक्साईटमेंट भी था|
सीना तो तब चौड़ा हुआ जब पूरे ऑफिस के सामने ब्लू-डार्ट के कुरियर बॉय ने हमारा नाम पुकारा और एक कड़क शानदार पैकेट हाथ में थमा गया| पूरी जिंदगी खाकी रंग के डाकिये को देखने वाले और बेहद ही इमरजेंसी में मधुर या मारुती कूरियर की सेवा लेने वाले को ब्लू-डार्ट का पैकेट आना वो भी ऑफिस के दसियों लोगों के बीच…..समान की और सामान को रिसीव करने वाले की पर्सीव्ड वैल्यू तो ऐसे ही बढ़ जानी थी|
खैर सारे एक्साईटमेंट और उस ब्लू-डार्ट के पैकेट को हमने डाला दराज़ में और लग गए अपनी दिनचर्या निपटाने| शाम बिना भूले पैकेट अपने बैग में डाला और पहुच गए अपने ईको पॉइंट अर्थात 2BHK फ्लैट पर| एक्साईटमेंट इतना था की खाना पैक कराना ही भूल गए थे, वैसे भी भूख किसे थी| बस फटाफट पैकेट निकला और बिना पलक झपके क्रेडिटकार्ड की अनबॉक्सिंग कर डाली| बीसियों कागज के बीच एक काले रंग का कार्ड….मैट फिनिश और उसपर चमकदार रंग से उभरा हमारा नाम….वाह! लगा मानों देखते ही रहें| कुछ कागजों को उलटने पलटने पर ज्ञात हुआ की निन्यानबे हज़ार की लिमिट थी ….मतलब निन्यानबे हज़ार की खरीददारी….मतलब बहुत सारी| फिर क्या, बाकी कागजों को पलटने की ज़हमत ही नहीं उठाई…वैसे भी इतने बारीक अक्षरों में लिखे थे कि आँख न भी ख़राब हो तो आदमी शक़ में आई-टेस्ट करवा ले|
वो पहला दिन था जब हम, हमारा क्रेडिटकार्ड और हमारा लेदर का पर्स एक दुसरे के पूरक हुए थे, उसके बाद तो दीवान..घड़ी…जूते…टीवी….म्यूजिक सिस्टम…किचन का सामान…….बस एक बार दुकानदार कह भर दे की ‘जी हाँ क्रेडिटकार्ड एक्सेप्ट करते हैं!’, मजाल है जो हम दुकान से खाली हाथ उतर जाएं| पैंतालिस दिन का रोटेशन सर्किल वाकई मज़े दे रहा था…..शापिंग का सिलसिला यूँ की चलता रहा जब तक कि हमारे 2BHK फ्लैट में प्रतिध्वनि होना बंद न हो गया….| अब क्रेडिट पर लिया था तो चुकाना भी था, शुरू-शुरू में तो 2-3 हज़ार का सामन आता था पर चार-पांच महीने बीतते पेमेंट का सिलसिला किश्तों में तब्दील हो गया| हर महीन सात-आठ हज़ार चुकाना ही था| खैर अकेले थे तो संभव था, बस पेपर कप के नीचे जो बड़ा छेद था उस पर टेप मार कर छेद छोटा करना था, और इकठ्ठा होने वाले पानी से क्रेडिटकार्ड की किश्त चुकानी थी| मजबुरी थी तो किया और चुकाते –चुकाते साल बीत गया| अब हम जबलपुर को टाटा –बॉय बोल कर राजस्थान आ चुके थे| नयी नौकरी, नयी जगह, नए लोग…पहले तो लगता था की सभी बड़ी-बड़ी मूछों वाले और पगड़ी पहनने वाले होंगे पर हकीकत अलग थी..जब जयपुर में उतरे तो पता चला विज्ञापन में दिखने वाला राजस्थान और हमारी कर्मभूमि बनने जा रहा राजस्थान दोनों अलग थे|
बैचलर अभी भी थे पर 2BHK का चस्का लग चुका था, वैसे भी मकान ईको पॉइंट न बने जितना सामान तो अब इकठ्ठा हो चुका था तो ब्रोकर की मदद से एक 2BHK जयपुर शहर में भी ले लिया| शुरुवाती कुछ दिन तो क्रेडिटकार्ड की सेवा को विराम दिया पर जुआ, शराब और क्रेडिटकार्ड की लत एक बार लग जाए तो छुटाए नहीं छूटती….वही हुआ जिसका डर था क्रेडिटकार्ड की घिसाई वापस शुरू|
दिन बीते और देखते ही देखते वो दिन भी आ गया जिसका इंतज़ार हर कुंवारा करता है…जी हाँ हमारी शादी तय हो गई थी, अब शादी तय हुई थी तो शादी से जुड़े खर्चे भी होंगे….मोटे तौर पर दिखने वाले और बड़े खर्चों की जिम्मेदारी माता-पीता ने उठा ली थी पर हमारा भी कुछ फ़र्ज़ बनता था आखिरकार अपने ही घर की शादी थी..वो भी अपनी…, ताल ठोक कर कह दिया की अपने कपड़े और हनीमून का खर्चा हम खुद उठाएँगे| घरवालों को भी लगा कि बेटे को जिम्मेदारी का अहसास है तो सभी ने हामी भर दी|
हाँ तो कर दिया था पर लाते कैसे पेपर कप का छेद अब भी काफी बड़ा था, तो बस….. ‘हारे का सहारा….क्रेडिट कार्ड हमारा’…,लिस्ट बनाई और चल पड़े शॉपिंग करने, सूट-शेरवानी…घड़ी…जूते…बेल्ट सब खरीद डाला, करना क्या था बस काले कार्ड को घिसना था और पिन डालना था …इतना ही नहीं हनीमून का होटल….फ्लाइट का टिकट सब बुक हो गया….भला हो क्रेडिट कार्ड का|
लोग भले ही दिन रात कोसे पर उम्मीदों की उड़ान के लिए जिन पंखों की ज़रुरत होती है वो पंख क्रेडिटकार्ड की लगता है ….भले ही कुछ दिन बाद हवा में ही उखाड़ भी दे और आप औंधे मुह ज़मीन पर आ गिरें| वही हुआ क्रेडिटकार्ड की किश्त अब तनख्वाह का मोटा हिस्सा खाने लगी थी पर वाह रे नशा, मजाल है जो एक भी दुकान पर दाम सुन कर शिकन आई हो|
खैर शादी अभी तय हुई थी…हुई नहीं थी, हम अब भी अकेले थे और किस फ़िज़ूल खर्ची पर मेढ़ बाँध कर रोकना है और उस पैसे की नहर से कैसे क्रेडिट कार्ड की सिचाई करनी है हम मैनेज कर ले रहे थे….वैसे भी हम उस विचारधारा के समर्थक थे जिसमें नहाते समय बनियान को पैरों के नीचे रख देते है ताकी शरीर पर लगने वाला साबुन शरीर से होता हुआ बनियान पर गिरे और कपड़े धोने के साबुन के खर्चों में कटौती हो….साथ खुशबू वो बोनस|
पर आप की विचारधारा तब तक ही कारगर है जब तक आप कुंवारें है…एक बार आपने दाम्पत्य जीवन में प्रवेश किया तो सारी विचारधारा की पुड़िया बना कर आप ही की शेरवानी की जेब में डाल दिया जाता है…और आप की पत्नी की विचारधारा ही आप की विचारधारा बन जाती है| सुनने में अजीब लगेगा पर शादी-शुदा लोग हमारी बात से सहमत होंगे ऐसा हमें द्रढ़ विश्वास है| हमारे साथ भी कुछ वैसा ही हुआ…हमारी विचारधारा बदलने लगी…शॉपिंग का एक्सपीरियंस ही बदल गया….एक समय था जब दूर से ऊँगली दिखा कर ही बोल दिया करते थे कि फलां घड़ी या फलां जूता पैक कर दो, पर एक उस हादसे के बाद से तो हमे कल्चरल शॉक लग गया था…कभी सोचा नहीं था की शॉपिंग का ये प्रारूप भी होता होगा….
हुआ यूँ की शादी के कुछ दिन बाद हमारी श्रीमती जी हमारे साथ जयपुर आ गईं, दांपत्य जीवन सुखमय बीतने लगा…हमारी पहली सालगिरह आने वाली थी तो हमने श्रीमति जी को सोने की चेन दिलाने का वादा कर डाला| दोनों खुश थे, वो इस बात से कि पति को साल गिरह याद थी और हम इस बात से कि श्रीमति जी खुश थीं| सालगिरह का दिन आया, प्लान यह बना की पहले शॉपिंग करेंगे फिर शाम किसी शानदार रेस्टोरेंट में डिनर करेंगे..कॉकटेल के साथ| ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों एक बड़ी ज्वेलरी शॉप में पहुचे और सेल्समेन को अपनी आमद का कारण कह सुनाया| हमें क्या पता था कि सोने की चमक में खोना क्या होता था…एक मिडिल क्लास आदमी की नज़र में सोने की चेन, मतलब …वो पतली वाली…एक या सवा तोले की, पर इनसेंटिव पाने वाले ‘स्टार ऑफ़ द मंथ’ सेल्समैन क्या होते है वो तो हमने उस दिन ही महसूस किया| दिखाते ही दिखाते उसने एक तोले से होते हुए चेन का वज़न और हमारी श्रीमति जी का मानस कब साढ़े तीन तोले तक पंहुचा दिया पता ही न चला| आखिरकार एक चेन को देख हमारी श्रीमति जी की आँखों में चमक आ ही गई, उन्होंने हलके से मुस्कुरा कर हमें देखा और बोलीं, ‘ये वाली कैसी है’| हम क्या बोलते, उड़ता तीर भी तो हमने ही लिया था सो बोल दिया, ‘अच्छी है’| इधर चेन से श्रीमतीजी की आँखें चमक रही थी और उधर वजन का कांटा देख हमारे सर पर सितारे चमक रहे थे| दर्द छुपाते हुए सेल्समेन से बोले, ‘हाँ भाई कितने की है…?’ सेल्समेन की वो कुटिल मुस्कान हम आज तक न भूल पाए| वो तो भला को क्रेडिटकार्ड का जो उस समय हमारा सम्मान बच गया, यह बात अलग है की क्रेडिटकार्ड की किश्ते भरते-भरते हमारा आत्मसम्मान ही हमें धिक्कारने लगा था|
खैर समझदार वही होता है जो अपनी गलतियों से सीखता है, उस हादसे के बाद तो हमने तौबा कर लिया कि आगे से चलकर कभी कोई वादा नहीं करेंगे…सरप्राइज गिफ्ट दे दो वो बात अलग है|
धीरे-धीरे समय बदला तो शॉपिंग का नजरिया भी बदला, अब हमारा एक प्रमुख काम कोचवान की तरह गाड़ी इस दुकान से उस दुकान ले जाना भी था| श्रीमति जी का क्या था एक –एक घंटे दुकान पर पचासों कपड़े निकलवाने के बाद कहा ‘पसंद नहीं आया, कही और चलते हैं’, अच्छा ऐसा भी नहीं था की खुद बोल दें, दुकानदार को नए- नए बहाने सुनाकर वहां से बाहर निकालने की जिम्मेदारी भी हमारी थी| समय के साथ समझ आ ही गया कि लेडीज कपड़ों के व्यापारी सिद्ध बाबाओं से कम नही होते…चेहरा पढ़ लेते हैं| शुरू-शुरू में तो लगता था कि आज पिटे या कल पर कसम से पिछले बारह साल में ऐसा मौका आया ही नहीं…इस धैर्य के लिए हम पूरे लेडीज शॉपिंग से जुड़े व्यापारी वर्ग के कृतज्ञ हैं|
लेडीज शॉपिंग के चलते दुकानदारों की महिमा के साथ साथ एक और बात का दिव्यज्ञान हुआ कि शॉपिंग में हमारी राय कोई खास मायने नहीं रखती हम तो बस सपोर्ट के लिए ले जाये जाते हैं….ताकी कल को कोई ऊँच-नीच हो तो बोल सकें ‘आप भी तो थे!’
खैर बात वापस क्रेडिटकार्ड पर…अब जिम्मेदारी और बढ़ गई थी, एक तो क्रेडिटकार्ड की बढती किश्त ऊपर से लेडीज शॉपिंग के लिए घंटों दुकान पर इंतज़ार करना| इतना ही नहीं, हर वो सामान जो हमने नग के हिसाब से खरीद रखा था अब वो सेट में था और वो भी स्टील, मेलामाइन और बोन-चाइना की वैरायटी में| ढाई लोगों की गृहस्ती में तीन अलग-अलग साइज़ के कूकर और दो अलग-अलग साइज़ की कढ़ाई क्यों चाहिए भला, ये बात न हम शॉपिंग करते समय समझ पाए थे न आज|
क्रेडिटकार्ड की बदौलत देखते ही देखते ढाई लोगों के परिवार में कब 2BHK छोटा पड़ने लगा पता ही न चला और क्रेडिटकार्ड की किश्तों का सिलसिला जबलपुर से होता हुआ, जयपुर, दिल्ली और हैदराबाद पहुच गया| जब भी किसी माल या दुकान के पास से गुज़रते मन की इच्छा उम्मीद की उड़ान भरना चाहती, क्रेडिटकार्ड पर्स से निकलता और उड़ान को पंख लगा जाता…और जाते जाते किश्तों की बेड़ियाँ पैर में डाल जाता|
खैर हर किसी की जिंदगी में वो दिन आता ही है जब उनका कोई ख़ास, कोई अपना उन्हें छोड़ कर चला जाता है..हमारे साथ भी यही होने वाला था..पता तो था पर इस बार हम अपना दिल मज़बूत कर चुके थे|
आखिरकार दो साल पहले आज ही के दिन हमारा क्रेडिटकार्ड एक्सपायर हो गया| आज इस बात को बीते दो साल हो चुके है पर हमने हिम्मत दिखाई और क्रेडिटकार्ड के बिना जीना सीख ही लिया|
अगर आप भी क्रेडिटकार्ड के बिना जीना सीख चुकें है तो आप बधाई के पात्र हैं और उम्मीद है सुखी होंगे और यदि किसी करणवश आप यह मोह अभी तक नहीं छोड़ पाए है तो हिम्मत जुटाइये और धीरे- धीरे ही सही पर इसको अपनी जीवनशैली से अलग करना शुरू कीजिये….विश्वास दिलाता हूँ इसके बिना जीवन कहीं ज्यादा सुखमय महसूस कीजियेगा|

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Chinese Lok Kathayen-4/ चीनी लोक कथाएँ-4

कहानी-सफेद नागिन: चीनी लोक कथा

पूर्वी चीन के हानचाओ शहर में स्थित पश्चिमी झील अपने असाधारण प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्वविख्यात है। देश विदेश के अनेक कवियों ने इस पर कविताएँ लिखी हैं और अनेक लोककथाओं में इसका वर्णन है। ऐसी ही लोक कथाओं में से एक है सफेद नागिन की कहानी। कहानी इस प्रकार है-

एक सफेद नागिन ने हजार साल तक कड़ी तपस्या कर अंत में मानव का रूप धारण किया| वह एक सुन्दर युवती में बदल गई और उसका नाम हुआ पाईल्यांगची। एक नीली नागिन ने पाँच सौ साल तपस्या की और एक छोटी लड़की के रूप में बदल गयी, नाम पड़ा श्योछिंग। पाईल्यांगची और श्योछिंग दोनों सहेलियों के रूप में पश्चिमी झील की सैर पर आईं, जब दोनों टूटे पुल के पास पहुँचीं तो श्योछिंग ने अलोकिक शक्ति से वर्षा बुलाई, वर्षा में श्युस्यान नाम का एक सुन्दर युवा छाता उठाए झील के किनारे पर आया। वर्षा के समय पाईल्यांगची और श्योछिंग के पास छाता नहीं था, वे काफी बुरी तरह पानी से भीग रही थीं, उन की मदद के लिए श्युस्यान ने अपना छाता उन दोनों को दे दिया और  स्वयं पानी में भीगता खड़ा रहा। ऐसे अच्छे चरित्र वाला युवा पाईल्यांगची को बहुत पसंद आया और श्युस्यान को भी सुंदर युवती पाईल्यांगची के प्रति प्रेम का अनुभव हुआ। श्योछिंग की मदद से दोनों की शादी हुई और उन्होंने झील के किनारे दवा की एक दुकान खोली। श्युस्यान बीमारियों की चिकित्सा जानता था, दोनों पति पत्नी निस्वार्थ रूप से मरीजों का इलाज करते थे और स्थानीय लोगों में वे बहुत लोकप्रिय हो गए।

शहर के पास स्थित चिनशान मठ के धर्माचार्य फाहाई को पाईल्यांगची के पिछले जन्मों का रहस्य मालूम था। उसने गुप्त रूप से श्य़ुस्यान को उसकी पत्नी का रहस्य बताया कि पिछले जन्म में वह सफेद नागिन थी। उसने श्युस्यान को यह भी बताया कि वह पाईल्यांगची का असली रूप कैसे देख सकता है। श्युस्यान को फाहाई की बातों से आशंका हुई।

इसी बीच त्वानवू पर्व आ गया। चीन का यह पर्व प्राचीन काल से ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस उत्सव पर लोग चावल से बनायी गई मदिरा पीते हैं, वे मानते हैं कि इससे सब विपत्तियों से रक्षा होती है। इस उत्सव के दिन श्युस्यान ने फाहाई द्वारा बताए तरीके से अपनी पत्नी पाईल्यांगची को मदिरा पिलाई। पाईल्यांगची गर्भवर्ती थी, मदिरा उस के लिए हानिकारक थी, लेकिन पति के बार-बार कहने पर उसने मदिरा पी ली। मदिरा पीने के बाद वह सफेद नागिन के रूप में वापस बदल गई, जिससे भय खा कर श्य़ुस्यान की मौत हो गई।

अपने पति को जीवित करने के लिए गर्भवती पाईल्यांगची हजारों मील दूर तीर्थ खुनलुन पर्वत में रामबाण औषधि गलोदर्म की चोरी करने गयी। गलोदर्म की चोरी के समय उस ने जान हथेली पर रख कर वहाँ के रक्षकों से घमासान युद्ध लड़ा, पाईल्यांगची के सच्चे प्रेम से प्रभावित हो कर रक्षकों ने उसे रामबाण औषधि भेंट की। पाईल्य़ांगची ने अपने पति को फिर से जीवित कर दिया, श्युस्यान भी अपनी पत्नी के सच्चे प्यार के वशीभूत हो गया, दोनों में प्रेम पहले से भी ज्यादा गाढ़ा हो गया।

धर्माचार्य फाहाई का मन दुष्टता से फिर भी न भरा। उसने श्युस्यान को धोखा दे कर चिनशान मठ में बंद कर दिया और उसे भिक्षु बनने पर मजबूर किया। इस पर पाईल्यांगची और श्योछिंग को अत्यन्त क्रोध आया, दोनों ने जल जगत के सिपाहियों को ले कर चिनशान मठ पर हमला बोला और श्युस्यान को बचाना चाहा। उन्होंने बाढ़ बुला कर मठ पर धावा करने की कोशिश की लेकिन धर्माचार्य फाहाई ने भी दिव्य शक्ति दिखा कर हमले का मुकाबला किया। क्योंकि पाईल्यांगची गर्भवती थी और बच्चे को जन्म देने वाली थी, इसलिए वह फाहाई से हार गयी और श्योछिंग की सहायता से पीछे हट कर चली गई। वो दोनों फिर पश्चिमी झील के टूटे पुल के पास आईं, इसी वक्त मठ में नजरबंद श्युश्यान मठ के बाहर चली युद्ध की गड़बड़ी से मौका पाकर भाग निकला, वह भी टूटे पुल के पास आ पहुँचा। संकट से बच कर दोनों पति-पत्नी ने चैन की साँस ली। इसी बीच पाईल्यांगची ने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन बेरहम फाहाई ने पीछा करके पाईल्यांगची को पकड़ा और उसे पश्चिमी झील के किनारे पर खड़े लेफङ पगोडे के तले दबा दिया और यह शाप दिया कि जब तक पश्चिमी झील का पानी नहीं सूख जाता और लेफङ पगोड़ा नहीं गिरता, तब तक पाईल्यांगची बाहर निकल कर जग में नहीं लौट सकती।

वर्षों की कड़ी तपस्या के बाद श्योछिंग को भी सिद्धि प्राप्त हुई, उसकी शक्ति असाधारण बढ़ी, उसने पश्चिमी झील लौट कर धर्माचार्य फाहाई को परास्त कर दिया, पश्चिमी झील का पानी सोख लिया और लेफङ पगोडा गिरा दिया एवं सफेद नागिन, पाईल्यांगची को बचाया। यह लोककथा पश्चिमी झील के कारण सदियों से चीनियों में अमर रही और पश्चिमी झील का सौंदर्य इस सुन्दर कहानी के कारण और प्रसिद्ध हो गया।

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Chinese Lok Kathayen-2/ चीनी लोक कथाएँ-2

कहानी-चितकबरे जूते: चीन की लोक कथा

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फुंग ची बहुत रईस आदमी था । उसने अपने लिए अपार दौलत जमा कर रखी थी । उसकी पत्नी उसे लाख समझाती थी कि इतनी कंजूसी अच्छी बात नहीं, परंतु वह मानता ही नहीं था ।

फुंग ची इतना कंजूस था कि कपड़े फट जाने पर उन्हीं पर पैबंद लगवा कर पहनता रहता था । यही हाल उसके जूतों का था । उसने वर्षों से अपने लिए जूते नहीं खरीदे थे । उनमें जगह-जगह छेद होकर पैबंद लग चुके थे । सर्दियों में वह गर्मी पाने के लिए गोबर की भांप से सेंकता था ।

घर में यूं तो नौकर-चाकर भी थे, परंतु वे भी उसकी कंजूसी से परेशान होकर जल्दी ही भाग जाते थे ।

एक दिन फुंग ची एक गली से गुजर रहा था । वहां बच्चे गली में खेल रहे थे । फुंग ची जब उधर से निकला तो उसका एक पैर नाली में चला गया । उसने पैर निकाला तो देखा कि उसका जूता फट गया था । पंजे के पास से तला अलग होकर उसका पैर दिखाई दे रहा था । बच्चों ने फुंग ची को उसके घर पहुंचने में सहायता की और वह अपने घर पहुंच गया ।

अगले दिन फुंग ची मोची के पास जूते ठीक करवाने पहुंचा तो मोची ने बताया – “सेठ जी, ये जूते बहुत पुराने हो चुके हैं अत: इन्हें जोड़ने का कोई लाभ नहीं है ।”

परंतु फुंग ची ने जिद करके उन्हीं जूतों को ठीक करवा लिया । एक सप्ताह बाद वह फिर उसी गली से गुजरा, जहां बच्चे खेल रहे थे । एक बच्चे की निगाह फुंग ची के जूतों पर पड़ी । वह एक बच्चे के कान में फुसफुसाया – “जरा इसके जूते तो देख ।”

सभी बच्चे हंसकर फुंग ची के जूते देखने लगे । फुंग ची चिढ़ गया और जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने लगा । बच्चों को इसमें बहुत आनन्द आया । शुई बड़ी नटखट लड़की थी वह चिल्लाकर बोली – “वाह, क्या चितकबरे जूते हैं ।”

सारे बच्चे एक स्वर में बोले – “क्या चितकबरे जूते हैं ?”

फुंग ची सुन कर चिढ़ते हुए आगे बढ़ गया । इसके बाद जब भी फुंग ची उधर से गुजरता बच्चे चिल्लाकर कहते – “चितकबरे जूते ।”

धीरे-धीरे “चितकबरे जूते” फुंग ची की चिढ़ बन गई। वह जहां कहीं भी जाता, कोई न कोई जरूर आवाज लगा कर कहता – “चितकबरे जूते ।” और फुंग ची चिढ़ जाता ।

घर पर उसकी पत्नी ने बहुत समझाया कि अब इन जूतों को फेंककर नए जूते खरीद लो, परंतु फुंग ची ने उसकी बात नहीं मानी, लेकिन जब धीरे-धीरे बात पूरे शहर में फैल गई तो वह अपने जूतों से सचमुच परेशान हो गया । उसने निश्चय किया, वह इन जूतों को किसी भिखारी को दान में दे देगा । अत: वह सुबह उठकर सैर को गया और लौटते वक्त एक भिखारी को अपने जूते दे आया ।

भिखारी जूते पाकर बहुत खुश हुआ क्योंकि सर्दी का मौसम था । परंतु सेठ के जाने के बाद जब उसने जूतों को देखा तो उन पर बहुत सारे पैबंद देखकर उन्हें हैरानी से देखने लगा । फिर सड़क के किनारे बैठकर वह उन जूतों को पहनने का प्रयास करने लगा ।।

उसी समय उधर से पुलिस का एक सिपाही निकला । उसने भिखारी को जूतों को उलटते-पलटते देखा तो उसे शक हुआ कि भिखारी कहीं से जूते चुरा कर लाया है । उसने भिखारी को अपने पास बुलाया तो जूतों को देखते ही पहचान गया कि ये जूते फुंग ची के हैं । वह भिखारी से बोला – “तूने जूते चोरी किए हैं, अत: तुझे थाने चलना पड़ेगा ।”

भिखारी बोला – “साहब, मैं यह जूते चुरा कर नहीं लाया । एक सेठ जी मुझे अभी देकर गए हैं ।”

परंतु सिपाही बोला – “जिस सेठ के यह जूते हैं, वह कंजूस सेठ तुझे जूते दे ही नहीं सकता । उसे ये जूते बहुत प्रिय हैं । तू झूठ बोलता है । मैं थाने में चल कर ही तय करूंगा कि तुझे क्या सजा दी जाए ।”

सिपाही भिखारी को लेकर थाने में चला गया और फुंग ची को बुलवा भेजा । फुंग जी थाने के बुलावे को सुनकर भौचक्का रह गया और सोचने लगा कि मेरा वहां क्या काम हो सकता है ? फुंग ची थाने पहुंच गया तो अपने पुराने जूतों को वहां रखे देखकर उसे बहुत हैरानी हुई । भिखारी को जेल में डाल दिया गया था ।

फुंग ची ने यह कहने की कोशिश की कि भिखारी ने चोरी नहीं की है परंतु सिपाहियों ने बिना सुने सेठ को उसके चितकबरे जूते वापस दे दिए । फुंग ची बहुत दुखी मन से जूते वापस ले लाया और उनसे छुटकारा पाने का उपाय सोचने लगा ।

उसकी पत्नी ने कहा – “मेरी बात मानो तो जूतों को कूड़ेदान में फेंक दो ।”

फुंग ची को यह विचार जंच गया और उसने अपने घर के कूड़े के साथ जूते कूड़ेदान में फेंक दिए । दो दिन तक जब जूतों की कोई खबर नहीं मिली तो फुंग ची जूतों की तरफ से निश्चिंत हो गया ।

परंतु तीसरे दिन सुबह घर की घंटी बजी । दरवाजे पर एक सफाई कर्मचारी खड़ा था, वह बोला – “सेठ जी, मैं आपसे इनाम लेने आया हूं ।”

सेठ ने खुश होकर कहा – “किस बात का इनाम मांग रहे हो, पहले यह तो बताओ ?”

सफाई कर्मचारी ने पीछे से जूते निकालते हुए कहा – “किसी नौकर या चोर ने आपके चितकबरे जूते कूड़ेदान में छिपा दिए थे । आज मैंने सफाई की तो सोचा आपके जूते आपको वापस कर दूं तो मुझे इनाम मिलेगा, इसलिए आपके घर चला आया ।”

फुंग ची की इच्छा हुई कि वह बहुत जोर से चीखे और क्रोध से डांट कर भगा दे । परंतु वह बड़ा सेठ होने के नाते ऐसा न कर सका । चुपचाप जूते रखकर कर्मचारी को वहां से भगा दिया ।

अब फुंग ची का किसी काम में मन नहीं लगता था । वह हरदम उन जूतों से पीछा छुड़ाने का उपाय सोचता रहता था । एक दिन उसके मन में विचार आया कि क्यों न मैं इन जूतों को नदी में फेंक दूं, पानी के बहाव के साथ ये जूते कहीं दूर चले जाएंगे, फिर उसने एक पुल पर खड़े होकर उन जूतों को नदी में फेंक दिया और चुपचाप घर की ओर चल दिया ।

थोड़ी ही देर में कुछ बच्चे उसके पास भागते हुए आए और बोले – “अंकल आपके चितकबरे जूते किसी ने नदी में फेंक दिए । हम नदी में नहा रहे थे तभी हमने इन जूतों को किसी को ऊपर से फेंकते देखा । हमने पानी में तुरंत आपके चितकबरे जूते पहचान लिए । यह लीजिए अपने जूते ।”

अब फुंग ची क्रोध से पागल हुआ जा रहा था । उसे जूतों से छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था । वह सारा दिन घर में ही बिताने लगा । उसका व्यापार में मन नहीं लगता था । इस कारण उसका व्यापार मंदा होता जा रहा था ।

एक दिन सबुह वह नगर की सीमा पर पहुंच गया और नगर से बाहर जाने वाले एक यात्री से प्रार्थना की – “भाई, यह जूते चाहें तो आप ले लें । अन्यथा आप नगर से बाहर जा रहे हैं तो इन्हें अपने साथ ले जाएं, वहां किसी जरूरतमंद को दे दें ।”

अजनबी व्यक्ति सेठ की तरफ हैरानी से देख रहा था कि कोई व्यक्ति अपने जूते शहर से बाहर क्यों भेजना चाहता है । फिर उसने सेठ की परेशानी समझकर जूतों को एक थैले में डाल लिया ।

सेठ वापस आ गया, परंतु अगले दिन नगर के राजा ने फुंग ची को बुलाने भेजा तो फुंग ची बहुत हैरान-परेशान हो गया । वह वहां पहुंचा तो उसे बताया गया कि एक परदेशी उसके चितकबरे जूते चुराकर नगर की सीमा के बाहर ले जा रहा था, अत: उसे गिरफ्तार कर लिया गया है ।

फुंग ची रोने और गिड़गिड़ाने लगा । राजा को कुछ समझ में न आया कि जूते मिल जाने पर वह रो क्यों रहा है । राजा ने पूछा – “फुंग ची, तुम इतने धनी सेठ हो और तुम्हारे ये प्रसिद्ध चितकबरे जूते तुम्हें मिल गए फिर भी तुम रो क्यों रहे हो ?”

फुंग ची ने रोते-रोते राजा को जूतों और कंजूसी की सारी कहानी सुना दी । साथ ही यह भी बता दिया कि लोगों ने उसकी चिढ़ ‘चितकबरे जूते’ बना दी है ।

राजा ने कहा – “ठीक है, हम इन चितकबरे जूतों को शाही संग्रहालय में रख देते हैं ताकि जब लोग तुम्हारे जूते देखें तो तुम्हारी कंजूसी को याद करें । तुम्हें इन चितकबरे जूतों से मुक्ति मिल चुकी है, तुम यहां से खुशी से जा सकते हो ।”

फुंग ची को इतनी राहत तो अवश्य मिल गई कि अब वे चितकबरे जूते उसके पास वापस नहीं आएंगे । परंतु अब वह यह सोचकर परेशान था कि शाही संग्रहालय में जूतों को रखने से लोग उन जूतों को कभी नहीं भूल सकेंगे ।

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बड़ो की कहानी/Badon ki Kahani

कहानी-झगड़े की जड़ (Jhagde ki Jad)

“बिल्लू की मम्मी, बाहर आओ…….अरे क्या नालायक बच्चे की माँ है….बाहर आओ….” पिंकू की माँ गुस्से में चीखती हुई बोली।

अगले घर से बिल्लू की माँ गरजी, “क्या हो गया क्यों चीख रही हो….”

पिंकू की माँ भड़कते हुए बोली, “अरे तेरा लौंडा है या जानवर…कोई तहज़ीब सिखाई है या नहीं….”

“ए…. आवाज़ नीची कर….क्या भौक रही है….सास से डांट खा कर आई है क्या?” बिल्लू की माँ पलट कर बोली।

पिंकू की माँ गुस्से में तमतमाई हुई बोली, “ए तू देख अपने को, और अपना घर….जानवर जैसी औलाद पैदा की है….देख कितनी ज़ोर से मारा है मेरे पिंकू को…”

बिल्लू की माँ ने बिल्लू को देखा, पूरी तरह धूल में सना खड़ा था, वो बोली, “बिल्लू…बिल्लू… हाय राम, क्या हो गया तुझे….ये कमीज़ कैसे फट गई….चुड़ैल देख अपनी औलाद को….क्या हाल कर दिया रे मेरे बच्चे का।”

पिंकू की माँ गरजी, “ए…. जबान संभाल…. तू चुड़ैल… तू डायन….अरे संभाल तेरे जानवर को…”

बिल्लू की माँ ने बराबर की टक्कर देते हुए कहा “जबान संभाल कर बात कर….तेरी गज़ भर लंबी जबान काट कर चूल्हे में डाल दूंगी। देख रही हो बहन,…इसी जबान के चलते रोज़ घर पर लात खाती है….न पति सेठता है न सास…..अरे दो बार तो घर से निकाल भगाया था” 

अब तो पिंकू की माँ और भी भड़क गई थी, बोली, “जा जा कमीनी….तू देख अपना घर….पति घर पर पड़ा रहता है और खुद दिन भर बाहर घूमती फिरती है…”

बिल्लू की माँ बोली, “चुड़ैल, इलजाम लगाती है…तू देख अपना घर…अरे सुनते हो जी! देखो तो बिल्लू का मार- मार कर क्या हाल कर दिया है….बाहर आओ।”

पिंकू की माँ भी अपने पति को बुलाते हुए बोली, “अरे जा-जा….बुला तेरे मरद को …देखती हूँ उसे भी….सुनो! बाहर आओ जी! ये चुड़ैल अपनी औकात दिखा रही है।”

बिल्लू के पापा बाहर आते हुए बोले, “अरे क्या हो गया बिल्लू की माँ, क्यों चीख रही हो?”

“देखो जी, बिल्लू की क्या हालत कर दी है, दरिंदे की तरह नोच डाला है, पूरी कमीज का सत्यानाश कर दिया।” बिल्लू की माँ बोली

बिल्लू के पापा, पिंकू की माँ की ओर मुखातिब हुए और बोले, “पिंकू की मम्मी, समझाओ अपने पिंकू को, क्या है यह सब?”

उधर पिंकू के पापा कमीज पहनते हुए बाहर आए और गरजे, ” ए… इधर देख कर बात कर…औरत से क्या बात कर रहा है….साले अपनी औलाद को देख….हमें क्या बोलता है।”

अब बारी बिल्लू के पापा की थी, बोले, ” तमीज़ से बात कर बे….दो मिनट में औकात दिखा दूंगा…”

“@#$%%^, *&^#@@, साले मुझे औकात दिखाएगा, साले मुंह खोला तो तेरा सर खोल दूंगा” पिंकू के पापा बोले।

भड़कते हुए बिल्लू के पापा बोले, ” साले @@$%%^, *&^#@@, साले डरपोक, दम है तो हाथ लगा कर दिखा…तेरी तो..@##$%%।”

“….आ साले, ले आ गया….तेरी तो….@###$$%$, (*/#/@/@…ये ले…” पिंकू के पापा बिल्लू के पापा का कॉलर पकड़ते हुए बोले।


फिर क्या धूम-धड़ाम, ढिशूम-ढिशूम, पटका-पटकी, सर फुड़उवल……


उधर दूर पान की दूकान पर खड़ा संतोष सब तमाशा देख रहा था, बोला, “का भईया चौरसिया, क्या हो गया?”

“अरे का बताई, पहले मनोहर और परकास की मेहरारू लड़ीं, फिर ओके बाद उ दोनों।” चौरसिया पान पर कत्था मलते हुए बोला।

“अबे पर लड़े काहे….जमीन, जायजाद या औरत…झगड़ा कौन बात का है।” संतोष ने उचक कर तमाशा देखते हुए पूछा।

“अरे नहीं…. दोनों के लौंडे लड़ लिए, उसी बात पर टंटा सुरु…पहले गाली- गलौज फिर सर फुड़उवल।” चौरसिया पान पकड़ाते हुए बोला।

संतोष ने पान मुंह में डालते हुए पूछा, “अच्छा…लौंडे कहाँ है?….ठीक तो है?….ज्यादा मार लगी है क्या?” 


चौरसिया मुस्कुराया और बोला, “काहे की मार, वो देखो, दोनों पारक में खेल रहे हैं।”

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Dakshin Africa ki Lok Kathayen -7(ज़ुलु लोक कथाएं-7)

कहानी-चतुर सियार(Clever Jackal)-दक्षिण अफ्रीका की लोक कथा

“कैसे हो प्यारे बच्चों?” बूढ़ी दादी ने शाम बच्चों को पास बुला कर पूछा| वह आगे बोली, “क्या तुम्हे पता है, कभी- कभी चतुर होना भी ज़रूरी होता है, देखो अपनी चतुराई से कैसे नोजवागा कितनी ही बार खाने के बर्तन से बहार निकल पाया है|

“सियार भी तो बहुत चतुर जानवर होता है…सच है न दादी!” छोटा शिपोह बोला| सिपोह किसी और जानवर का भी नाम ले सकता था पर उसने जानबूझ कर सियार का ही नाम लिया क्योंकि सब प्यार से उसे म्पू-न्गु-शे बुलाते थे, जिसका मतलब होता है सियार| जब वह बहुत छोटा था तो रोते हुए वह सियार की ही तरह आवाजें निकाला करता था इसलिए उसकी दादी गोगो ने उसको यह नाम दिया था| जबकि सिपोह को लगता था कि उसका नाम म्पू-न्गु-शे अर्थात सियार इसलिए रखा गया क्योंकि वह बहुत चुस्त और फुर्तीला है|

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बूढ़ी दादी हंसी और शिपोह को देखते हुए बोली, “सही बात है मेरे बच्चे, सियार बहुत ही चतुर होता है, इतना चतुर कि चतुराई से अपनी जान भी बचा लेता है|”

“हाँ दादी, मुझे याद है कैसे सियार ने चतुराई से चरवाहे जाबु की जान बुबेशी शेर से बचाई थी| दादी सियार की कोई और कहानी सुनाओ ना”, सिपोह प्यार से बोला|

“हाँ दादी” सभी बच्चे एक साथ बोले “सुनाओ ना दादी”

“ठीक है बच्चों, सुनाती हूँ..ध्यान से सुनो और सीखो|” इतना बोलकर बूढ़ी दादी पेड़ के तने से टिक कर आराम से बैठ गई, और बोली “बहुत समय पहले…..”

एक जंगल में सियार एक पतले संकरे चट्टानी रास्ते से गुजर रहा था| हमेशा की ही तरह उसने अपनी नाक जमीन की तरफ कर रखी थी ताकि कोई भी अनजानी गंध को आसानी से पकड़ सके| “क्या पता कब मुझे कुछ खाने को मिलेगा|” वह अपने आप से बोला| हालाँकि दोपहर की तेज़ गरमी में एक चूहा भी मिलना मुश्किल था| यह ज़रूर था की उसे एक दो छिपकली ज़रूर मिल जाए|

तभी उसे उस रास्ते में जानी पहचानी सी हलचल महसूस हुई, “अरे नहीं!” सियार मन ही मन भुनभुनाया और अपनी जगह पर ही ठिठक गया| जब उसने देखा की शेर उसकी ओर ही आ रहा है और भागने का और कोई रास्ता भी नहीं है तो डर के मारे उसका बुरा हाल हो गया| वह पहले भी कई बार बुबेशी शेर को मूर्ख बना चुका था, उसे लगा इस बार ज़रूर महान बुबेशी अपना बदला ले लेगा| तभी अचानक ही उसे एक चाल सूझी|

“बचाओ! बचाओ!” ऊपर की ओर देखते हुए वह चट्टानी संकरे रास्ते पर घुटनों के बल सरकने लगा|

यह देख शेर आश्चर्य से रुक गया|

“बचाओ!” सियार डर का भाव लाकर रोते हुए बोला|

सियार ने शेर को देखा और बोला, “ओ महाराज बुबेशी, बचाइए, हमारे पास समय बिलकुल नहीं है, ऊपर देखिये वो बड़ी –बड़ी चट्टानें गिरने वाली हैं| हम दोनों दब कर मर जाएंगे| ओ ताकतवर महान राजा कुछ कीजिए, हमें बचाइए|” सियार अपना सर हाथ से ढक कर झुक गया|

शेर ने सावधानी से ऊपर देखा लेकिन इससे पहले कि वह कुछ सोच पाता सियार गिड़गिड़ाते हुए बोला, “महाराज अपनी ताकत का प्रयोग कीजिए और इन लटकती हुई चट्टानों को रोकिए|”

शेर ने अपने ताकतवर कंधे चट्टानों से टिकाए और उन्हें ऊपर की ओर धकेलने लगा|

“ओ महाराज, धन्यवाद!” सियार फ़ौरन बोला| “मैं फ़ौरन ही एक बांस ढूँढ कर लाता हूँ और इस पत्थर से टिका देता हूँ, इससे हम दोनों को जान बच जाएगी|” यह बोल कर सियार वहां से रफूचक्कर हो गया|

अब शेर वहां अकेला खड़ा चट्टान को ऊपर की ओर धकेलने की कोशिश करता रहा| न जाने कितने दिनों तक शेर उस चट्टान को पकड़े खड़ा रहा और न जाने कब उसे यह अहसास हुआ कि सियार उसे फिर एक बार अपनी चतुराई से मूर्ख बना अपनी जान बचा गया था|

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Italy ki Lok Kathayen-1(इटली की लोक कथाएँ-1)

कहानी-गरीबों को याद रखो: इटली की लोक कथा

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एक समय की बात है, किसी जगह पर तीन भाई साथ-साथ रहा करते थे। उनका सेब का एक पेड़ था। उन्होंने बारी-बारी उस पेड़ की देखभाल करने के लिए आपस में निश्चय किया था। जब दो भाई खेतों में काम करने चले जाते, तो तीसरा भाई पेड़ की रखवाली करने के लिए घर पर ही रह जाता था। वह यह देखता रहता कि कोई भी किसी प्रकार पेड़ को हानि न पहुंचा सके और न ही कोई चोरी से सेब तोड़ ले।

एक बार उन तीनों भाईयों की परीक्षा लेने के लिए स्वर्ग से एक दूत आया। भिखारी के रूप में, वह सेब के पेड़ के निकट गया । उस दिन सबसे बड़ा भाई पेड़ की रखवाली कर रहा था। वह भिखारी हाथ फैलाकर बोला, “बाबा, ईश्वर के नाम पर, एक पकी सेब दे दो ।”

सबसे बड़े भाई ने उसे एक सेब दे दी और कहा, “यह मेरे हिस्से की सेब है, इसलिए मैं तुम्हें दे रहा हूं। अन्य नाशपातियां मेरे भाइयों के हिस्से की हैं।”

दूत ने उसे धन्यवाद दिया और चला गया।

दूसरे दिन दूसरा भाई पेड़ की देखभाल कर रहा था। उस दिन भी दूत भिखारी के रूप में आया और एक पकी सेब की भीख मांगने लगा। दूसरे भाई ने कहा, “यह लो, यह सेब मेरे हिस्से की है। परन्तु मैं और नहीं दे सकता, क्योंकि ये मेरे भाइयों के हिस्से की हैं।”

दूत दूसरे भाई को भी धन्यवाद देकर चला गया।

तीसरे दिन जब दूत सबसे छोटे भाई के पास आया, तो उसने भी अपने बड़े भाइयों की भांति उत्तर दिया।

अगले दिन प्रात:काल दूत, साधु के रूप में, उन तीनों भाइयों के घर गया। उस समय तक वे सभी घर पर मौजूद थे। साधु ने कहा, “बच्चों, मेरे साथ आओ । सेब के पेड़ की रखवाली करने की अपेक्षा मैं तुम्हें अच्छा काम दूंगा।”

तीनों भाई उसके साथ हो लिए। चलते-चलते वे दूर एक बड़ी गहरी नदी के किनारे पहुंचे ।

साधु ने सबसे बड़े भाई से पूछा, “बेटे! मांग, क्यार मांगता है?”

सबसे बड़े भाई ने कहा, “कितना अच्छा होता, यदि इस नदी का जल मदिरा में बदल जाए और उसका मालिक मै बन जाऊं।”

साधु ने अपनी छड़ी घुमाई और सारी नदी मदिरा की हो गई। लोग बड़े-बड़े पीपों में मदिरा भर-भरकर ले जाने लगे। कुछ देर में ही ऐसा मालूम पड़ने लगा, मानो एक बड़ा व्यवसाय हो रहा हो। लोग अपने काम में व्यस्त इधर-उधर भाग रहे थे और सबसे बड़े भाई को सम्मानपूर्वक ‘मालिक-मालिक’ कहकर संबोधित कर रहे थे।

दूत जो साधु के वेश में था बोला, “तुम्हारी इच्छा पूरी हो गई। तुम धनवान हो गए। परन्तु गरीबों को मत भूल जाना। उनका ध्यान रखना।”

सबसे बड़े भाई को मदिरा के व्यवसाय में लगाकर, साधु दोनों भाइयों के साथ आगे बढ़ चला। वे एक ऐसे बड़े मैदान में पहुंचे जहां कि बहुत-से कबूतर दाना चुग रहे थे।

दूत ने दूसरे भाई से कहा, “मांगो, तुम क्या मांगते हो?”

दूसरे भाई ने उत्तर दिया, “यदि ये कबूतर बदलकर भेड़ हो जाएं और मैं इनका मालिक बन जाऊं, तो इससे सुन्दर और क्या होगा?”

दूत ने पहले की भांति अपनी छड़ी घुमाकर फिर से पहले जैसी रेखाएं बना दीं। सहसा पूरा मैदान भेड़ों से भर गया। घर और दालान बन गए। स्त्रियां भेड़ों को दुहने लगीं और पनीर बनाने लगीं। कुछ लोग बाजार में बेचने के लिए मांस तैयार करने लगे और कुछ उनकी सफाई में लगे हुए थे। वे सभी अपने-अपने कार्य में व्यस्त थे और दूसरे भाई को उन्होंने अपना मालिक समझ लिया था।

दूत ने कहा, “अब तुम्हारी इच्छा पूरी हो गई। तुम सुखी और सम्पन्न बन गए हो परन्तु निर्धनों का ख्याल रखना ।”

तब दूत और सबसे छोटा भाई वहां से चल दिए। कुछ दूर जाने के पश्चात्‌ दूत ने कहा, “बेटे, तुम भी कुछ मांग लो।”

सबसे छोटे भाई ने चुपके से कहा, “मुझे केवल एक ही चीज चाहिए और वह है एक धर्मपरायण स्त्री।”

दूत ने कहा, “बेटे! तुमने बड़ी कठिन चीज़ मांगी। संसार भर में केवल तीन धर्मपरायण स्त्रियां हैं। उनमें से दो विवाहित हैं। तीसरी राजकुमारी है, जिसके साथ विवाह करने के लिए दो राजा प्रयत्न कर रहे हैं। आओ, हम लोग भी राजा के पास चलें और तुम्हारी इच्छा उनसे कहें।”

अतः वे उस नगर की ओर चल पड़े, जहां राजकुमारी रहती थी लम्बी यात्रा के कारण थके-हारे वे राजमहल में घुसे।

राजा ने उनकी प्रार्थना सुनी | परन्तु जब उसने उनका आने का आशय सुना तो उसने कहा, “मैं कुछ भी निर्णय नहीं कर सकता । दो राजा और यह नवयुवक, तीनों मेरी बेटी से विवाह करने के इच्छुक हैं। क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता ।”

दूत ने कहा, “ईश्वर ही इसका फैसला करेंगे।”

राजा ने भी कहा, “ठीक है, पर कैसे?”

दूत ने कहा, “अंगूर की लता की तीन डालियां काट लो और उन्हें राजकुमारी को दे दो। राजकुमारी प्रत्येक डाली के ऊपर विवाह के इच्छुक एक-एक प्रत्याशी का नाम लिख-लिखकर तीनों डालियां आज रात बगीचे में गाड़ दे। रात-भर में जिस डाली में फूल खिलकर सुबह अंगूर के गुच्छे नज़र आएं, उसी के साथ राजकुमारी का विवाह कर दें ।”

राजा ने कहा, “यह बहुत अच्छा उपाय है।”

राजकुमारी, दोनों राजकुमार और युवक-तीनों इस उपाय पर राजी हो गए। तीन डालियों पर उनके नाम लिखकर बगीचे में गाड़ दिये गए। प्रातःकाल दो डालियां सूख गईं। तीसरी डाली हरी-भरी थी और उसमें अंगूर के गुच्छे लटक रहे थे। इस डाली पर सबसे छोटे भाई का नाम लिखा हुआ था। राजा को यह शर्त माननी पड़ी। उसे अपनी प्रतिज्ञानुसार राजकुमारी का ब्याह उस युवक से करना पड़ा। राजा ने अपनी लड़की और दामाद को आर्शीवाद दिया।

एक साल के बाद, दूत पुनः पृथ्वी पर यह देखने के लिए आया कि अब वे तीनों भाई कैसे रह रहे हैं। भिखारी बनकर वह सबसे बड़े भाई के पास गया, जो अपने शराब के व्यवसाय में व्यस्त था।

दूत ने कहा, “बाबा, भिखारी को भी एक प्याला शराब दे दो।”

बड़े भाई ने चिल्लाकर कहा, “बदमाश! निकल यहां से! यदि मैं सभी भिखारियों को शराब मुफ्त देता रहूंगा तो खुद भी शीघ्र ही भिखारी बन जाऊंगा ।”

दूत ने अपनी छड़ी घुमाकर क्रॉस का चिन्ह बनाया। चिन्ह बनाते ही शराब की दुकान, गोदाम और काम करने वाले मजदूर-सभी गायब हो गए । वहां पहले की भांति लम्बी-चौड़ी और गहरी नदी बहने लगी।

दूत क्रोधित होकर बोला, “तुम धनवान बनके गरीबों को भूल गए। अतः तुम फिर से जाकर अपने सेब के पेड़ की देखभाल करो ।” फिर दूत दूसरे भाई के पास गया, जो कि दूध तथा भेड़ों के करोबार में लगा हुआ था।

दूत ने गिड़गिड़ाकर कहा, “बाबा, ईश्वर के नाम पर पनीर का एक टुकड़ा दे दो।”

दूसरे भाई ने कहा, “अरे, भाग यहां से, नहीं तो कुत्तों से कटवा दूंगा। तुम्हारे जैसे आलसियों को मैं पनीर नहीं देता ।”

दूत ने पहले की भांति अपनी छड़ी से दो आड़ी-तिरछी लकीरें खींचकर क्रॉस का चिन्ह बनाया। सभी भेड़ें, काम करने वाले मज़दूर आदि सब गायब हो गए और पहले की तरह वहां मैदान हो गया, जहां पर बहुत से कबूतरों का झुंड पहले की भांति ही चुगने लगा था।

दूत क्रोधित होकर बोला, “तुम निर्धनों को भूल गए हो अतः तुम सेब के पेड़ के पास जाकर पहले की भांति ही उसकी रखवाली करो ।”

अब दूत शीघ्रता से जंगल में पहुंचा जहां कि सबसे छोटा भाई अपनी स्त्री के साथ रहता था। वे दोनों एक झोंपड़ी में रहते थे और उन्हें रुपये-पैसे की बड़ी तंगी थी।

दूत जो कि अब भी भिखारी के वेश में था, उनके निकट आकर बोला, “भगवान तुम्हारा भला करे! मुझे खाने को कुछ भोजन और रात के लिए आश्रय मिलेगा?”

सबसे छोटे भाई ने कहा, “हम लोग निर्धन हैं, परन्तु आप यहां रहें और जो कुछ रूखा-सूखा हमारे पास है उससे हम आपकी सेवा करेंगे।”

पति-पत्नी दोनों ने दूत को आग के निकट सर्दी से बचने के लिए स्थान दिया। पत्नी ने रात का भोजन अलग-अलग तीन आदमियों के लिए रखा। वे इतने गरीब थे कि उनके पास आटा तक न था। उन्होंने पेड़ों की छाल को कूटकर, उसके आटे से रोटियां बनाई थीं। उसकी पत्नी शर्म के मारे मरी जा रही थी। उसने कहा, “हम लोग बहुत ही लज्जित हैं। आपको खिलाने के लिए हमारे पास आटे की रोटियां तक भी नहीं हैं।”

दूत हँसता हुआ बोला, “चिंता न करो ।”

छोटे भाई की पत्नी जब भोजन लेने के लिए रसोई में गई, तो देखा कि रोटियां गेहूं के आटे की हो गई हैं। उसके आश्चर्य की सीमा न रही। वह बोली, “भगवान तेरी माया विचित्र है।” खुशी के मारे, उसकी आंखों में आँसू छलछला आये। वह निकट के झरने से एक घड़ा जल ले आयी। जब वह प्यालों में जल उड़ेलने लगी, तो पानी मधुर मदिरा में बदल चुका था। सबसे छोटे भाई को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। परन्तु वह बोला कुछ नहीं।

दूत उनके सत्कार से खुश होकर बोला, “आप लोगों ने गरीबों को नहीं भुलाया। ईश्वर आपका भला करे।”

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Iceland ki Lok Kathayen-1(आइसलैंड की लोक कथाएँ-1)

कहानी- चम्मच का सूप: आइसलैंड की लोक कथा

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एक बार एक किसान किसी काम से शहर गया । जैसे ही शाम होने लगी, उसे लगा कि उसे तुरंत गांव लौट जाना चाहिए । अगर देर हो गई तो अंधेरे में घर पहुंचना मुश्किल हो जाएगा । वह अपना काम अधूरा छोड़कर गांव की ओर चल दिया ।

वह थोड़ी ही दूर गया था कि अचानक बादल घिर आए, ठंडी हवाएं चलने लगीं । उसने अपनी चाल तेज कर दी । परंतु कुछ ही देर में बूंदा-बांदी होने लगी । किसान ने सोचा कि अगर मैं तेज चलूं तो शायद रात होने से पहले अपने घर पहुंच जाऊंगा ।

परंतु मौसम को यह मंजूर नहीं था । काली घटाओं के कारण जल्दी ही अंधेरा छाने लगा । बारिश भी तेज होने लगी । किसान ने आगे बढ़ना ठीक नहीं समझा । आगे जंगल का खतरनाक रास्ता था । एक तो खराब मौसम, ऊपर से जंगली रास्ता सोचकर किसान डर से मारे कांपने लगा ।

वह एक छोटे-से घर के आगे बरामदे में दुबक कर बैठ गया । परंतु ठंडी हवाओं के कारण उसे सर्दी लगने लगी । रात होते-होते उसे सर्दी के साथ-साथ भूख भी लगने लगी । उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था । वह सोचने लगा कि इस समय थोड़ा-सा कुछ गरम खाने को मिल जाता तो उसकी सर्दी भी मिट जाती और भूख भी कम हो जाती ।

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Dakshin Africa ki Lok Kathayen -4(दक्षिण अफ्रीका की लोक कथाएं-4)

कहानी-आसमानी बिजली और तूफ़ान: अफ्रीकी लोक-कथा

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बहुत पहले आसमानी बिजली और तूफ़ान बाकी सारे लोगों के साथ यहीं धरती पर रहा करते थे, लेकिन राजा ने उन्हें सारे लोगों के घरों से बहुत दूर अपना बसेरा बनाने का आदेश दिया हुआ था।

तूफ़ान असल में एक बूढ़ी भेड़ थी जबकि उसका बेटा आसमानी बिजली एक गुस्सैल मेढा। जब भी मेढा गुस्से में होता वह बाहर जाकर घरों में आगज़नी किया करता और पेड़ों को गिरा देता। वह खेतों को भी नुकसान पहुंचाता और कभी तो लोगों को मार भी डालता। वह जब भी ऐसा करता उसकी माँ ऊंची आवाज़ में डांटती हुई उसे और नुकसान न पहुंचाने और घर वापस आने को कहती, लेकिन आसमानी बिजली अपनी माँ की बातों पर ज़रा भी ध्यान दिए बिना तमाम नुकसान करने पर आमादा रहता। अंत में जब यह सब लोगों की बर्दाश्त से बाहर हो गया, उन्होंने राजा से शिकायत की।

सो राजा ने एक विशेष आदेश दिया और भेड़ और उसके मेढे को शहर छोड़कर दूर झाडियों में जा कर रहने पर मजबूर होना पड़ा। इस से भी कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि गुस्सैल मेढा अब भी कभी कभार जंगलों में आग लगा दिया करता और आग की लपटें जब-तब खेतों तक पहुंचकर उन्हें तबाह कर दिया करतीं।

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Hasya Kahani: Pocket Radio /हास्य कहानी : पॉकेट रेडियो -छोटी उम्र की खुराफात का एक नमूना

पिछले पंद्रह मिनट से हम तीन फिट की दीवार पर कान पकड़े खड़े थे और माता जी गुस्से से हाथ में हमारा ही प्लास्टिक का बैट लिए इंतजार कर रहीं थी कि ज़रा हिले तो दो चार लगा दें| हमें तो समझ ही नहीं आ रहा था कि ऐसा भला क्या हो गया जो इतनी ज़बरदस्त सजा दे दी गई थी, पर माता जी का पारा गरम था, एक तो उनके आदेश का उल्लंघन ऊपर से एक बड़ा कांड…..

बात उन दिनों की है जब हम शर्ट और हाफ पैंट पहना करते थे, वैसे हाफ पैंट तो अब भी पहनते है पर शौखिया, उस समय वो हमारा ऑफिशियल ड्रेसकोड हुआ करता था| जी हाँ उमर होगी कोई आठ या नौ साल| इलाहाबाद में हम अपने माता पिता और छोटी बहन के साथ किराये के मकान में रहा करते थे| पिता जी टेलीफोन डिपार्टमेंट में टेक्निकल इंजिनियर थे और माता जी ने घर परिवार का बीड़ा उठा रखा था|

ज़िन्दगी सुकून भरी थी, घर से स्कूल और स्कूल से घर, न मोबाइल था न केबल टीवी| लकड़ी के शटर वाले ब्लैक एंड वाइट टीवी पर दूरदर्शन और लगभग उतने ही बड़े रेडियो में बिनाका गीतमाला| घूमने के लिए गर्मियों की छुट्टीयों में कानपुर अपनी दादी – नानी का घर|

सितम्बर या अक्टूबर की बात होगी, मौसम ने करवट लेना शुरू ही किया था कि एक रोज़ कानपुर से हमारे बड़े पापा के ज्येष्ठ पुत्र और हम सब में सबसे बड़े, भाई साहब अपने घनिष्ट मित्र के साथ इलाहाबाद आए| एस.एस.सी. का इम्तहान था और सेंटर इलाहाबाद पड़ा था| घर में मेहमान आए तो कौन खुश नहीं होता, न खेलने जाने की रोक-टोक, न डांट का डर और पूड़ी-पकवान अलग से| हमारा भी हाल वही था, इन बातों से एक अलग ही ख़ुशी थी मन में|          

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स्विट्ज़रलैंड की लोक कथाएँ-1 Switzerland ki lok kathayen-1

टॉम और सौतेली मां: स्विट्ज़रलैंड की लोक-कथा

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बहुत समय पहले की बात है, एक शहर में एक आदमी रहता था। कुछ समय बाद उसकी पत्नी की मृत्यु हो गयी। उसकी एक बेटी थी जिसका नाम टॉम था। पिता और बेटी दोनों आराम से रहते थे।
एक दिन उस आदमी ने दूसरी शादी करने का फैसला किया। उसकी शादी तो हो गई लेकिन उसकी दूसरी पत्नी बहुत चालाक निकली | कुछ ही दिनों में सौतेली मां ने टॉम के साथ बुरा बर्ताव करना शुरू कर दिया। वह टॉम से सारा दिन काम करवाती और एक पल के लिए भी उसे खाली नहीं बैठने देती थी। इस पर भी कई बार वह टॉम को खाना न देती और वह बेचारी बिना कुछ बोले भूखी सो जाती।
इधर टॉम की सौतेली मां के घर एक पुत्री ने जन्म लिया। उसका नाम “काम” रखा गया। टॉम अपनी छोटी बहन से बहुत प्रेम करती थी। पर उसकी मां को यह भी अच्छा नहीं लगता था। वह जब टॉम को अपनी बेटी काम के साथ बैठे देखती, वह उसे गुस्से में कहती, “जाओ यहां से, सुबह से यहां बैठी क्या कर रही हो?”
कुछ दिनों बाद टॉम के पिता की मृत्यु हो गयी। अब तो उसकी मां का व्यवहार और भी खराब हो गया।
टॉम को इतने बड़े घर में रसोईघर के साथ वाला एक गन्दा-सा कमरा मिला हुआ था। वह वहीं उठती-बैठती और वहीं सोती। उसे दूसरे कमरों में जाने की मनाही थी। बस सफाई करने के लिए वह वहां जा सकती थी।
टॉम को बहुत काम करना पड़ता था। सारे घर की सफाई करती, कपड़े साफ करती, फर्श रगड़ कर धोती और सारे घर का भोजन बनाती । भैंस को नहलाना, चारा डालना, लकड़ी काटना, कुएं से पानी लाना जैसे बहुत से काम उस छोटी सी लड़की को करने पड़ते। काम करते-करते कई बार तो वह बहुत थक जाती, लेकिन किसी से शिकायत न करती।