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Germany ki Lok Kathayen-2/ जर्मनी की लोक कथाएँ-2

ग्रिम ब्रदर्स की कहानी-नीली रोशनी: जर्मनी की लोक कथा

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एक सैनिक बहुत साल तक अपने राजा की सेवा करता रहा, पर अन्त में उसे बिना वेतन या इनाम के निकाल दिया गया। अब उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी रोटी कमाने के लिए क्याि करे। वह बड़े उदास मन से घर की तरफ चल दिया। पूरा दिन चलने के बाद शाम को वह एक घने जंगल के पास पहुँचा। अभी कुछ ही दूर गया था कि उसे पेड़ों के बीच से रोशनी चमकती दिखाई दी। उसने अपने थके हुए पैरों को उधर ही बढ़ा दिया। जल्दीक ही उसे एक झोंपड़ी दिखी जिसमें एक बुढ़िया चुड़ैल रहती थी। उस बेचारे ने उसकी खुशामद की कि वह उसे रात को वहाँ ठहर जाने दे और कुछ खाने-पीने के लिए भी दे दे। वह कुछ सुनने को तैयार नहीं थी, पर इस आदमी से पीछा छुड़ाना भी आसान नहीं था। आखिर वह बोली, “चलो, मैं तुम पर दया कर दूँगी, पर बदले में तुम्हें सुबह मेरा पूरा बगीचा खोदना पड़ेगा ।” सैनिक उसकी हर बात मानने को तैयार था, इसलिए उसका मेहमान बन गया।

अगले दिन उसने अपनी बात पूरी की, और बड़ी सफाई से पूरा बगीचा खोद डाला। यह काम करने में उसका पूरा दिन लग गया। शाम को उसे चले जाना था, तब वह बुढ़िया से बोला, “सारा दिन काम करने से मैं बेहद थक गया हूँ, मुझे एक रात और ठहर जाने दो।” पहले तो उसने मना कर दिया, पर फिर इस शर्त पर राजी हुई कि वह अगले दिन एक गाड़ी भरकर लकड़ी काट देगा।

उस दिन भी उसने काम तो पूरा कर दिया, पर करते-करते फिर रात हो गई। इसके अलावा वह इतना थक गया था कि उसने फिर एक रात रुकने की आज्ञा माँगी। अबकी बार बुढ़िया ने उससे यह वचन माँगा कि वह कुएँ में नीचे जलती नीली रोशनी उसे ला देगा।

सुबह होते ही वह उसे कुएँ तक ले गई, उसकी कमर में एक लम्बी रस्सी बाँधी और उसे नीचे उतार दिया । कुएँ में, जैसा कि चुड़ैल ने बताया था, नीली रोशनी थी। उसने रस्सी हिलाकर उसे इशारा दिया कि वह उसे ऊपर खींच ले। पर उसने सैनिक को बस इतना ऊपर खींचा कि वह हाथ बढ़ाकर रोशनी ले सके और बोली, “पहले मुझे रोशनी पकड़ा दो, मैं सँभाल लूँगी।” सैनिक भाँप गया कि इसका इरादा ठीक नहीं है। सच ही वह रोशनी लेकर सैनिक को कुएँ में वापिस धकेलने की सोच रही थी। सैनिक उसके बुरे इरादे को भाँप गया और बोला, “मैं जब तक कुएँ से सही-सलामत बाहर नहीं निकल आऊँगा तब तक तुम्हें रोशनी नहीं दूँगा।” यह सुनते ही वह बहुत नाराज हो गई और उसने उसे रोशनी समेत नीचे फेंक दिया। वह सालों से उस रोशनी को हासिल करना चाहती थी। इधर बेचारा गरीब सैनिक कुछ देर निराश होकर नीचे की गीली मिट्टी पर पड़ा रहा और सोचने लगा कि अब उसका अन्त पास ही है। उसकी जेब में आधा भरा चुरुट था। उसने सोचा “क्यों न इसे पीकर खत्म कर दूँ। दुनिया में अपना आखिरी मजा ले लूँ।” उसने नीली रोशनी से उसे जलाया और पीने लगा।

अचानक धुएँ का बादल उठा और उसके बीच से एक काला बौना आता दिखाई दिया। वह बोला, “सैनिक तुम्हें क्या चाहिए?” उसने जवाब दिया “कुछ नहीं ।” तब बौने ने कहा, “तुम नीली रोशनी के मालिक हो, इसलिए मुझे तुम्हारी हर बात माननी होगी।” उसने कहा, “सबसे पहले मुझे इस कुएँ से बाहर निकालो ।” उसके कहने की देर थी कि बौना उसका हाथ पकड़कर उसे नीली रोशनी समेत ऊपर ले आया। सैनिक फिर बोला, “अब एक दया और करो, उस बुढ़िया को मेरी जगह कुएँ में डाल दो ।” बौने ने यह भी कर दिया। अब उन्होंने उसका खजाना ढूँढ़ना शुरू कर दिया। सैनिक जितना सोना-चाँदी ले जा सकता था, उतना उठाने लगा। फिर बौने ने कहा, “अगर कभी मेरी जरूरत पड़े तो तुम सिर्फ नीली रोशनी से अपना पाइप जलाना और मैं फौरन तुम्हारे पास पहुँच जाऊँगा।”

सैनिक अपनी खुशकिस्मती से बहुत खुश था | वह पहले शहर की सबसे महँगी सराय में गया। उसने कुछ बढ़िया कपड़े बनवाये और अपने लिए एक अच्छा-सा कमरा तैयार करने को कहा। यह सब हो जाने पर उसने बौने को बुलाया और बोला, “राजा ने मुझे एक पैसा भी न देकर भूख-प्यास से मरने को छोड़ दिया था। अब मैं उसे दिखाना चाहता हूँ कि अब मैं मालिक हूँ। आज शाम को राजा की बेटी को यहाँ लाओ, उसे मेरी सेवा करनी होगी ।” बौना बोला, “यह खतरनाक काम है।” पर चला गया। फिर गहरी नींद में सोती राजकुमारी को सैनिक के पास ले आया।

अगले दिन बहुत सुबह वह उसे वापिस छोड़ आया। राजकुमारी अपने पिता को देखते ही कहने लगी, “मैंने पिछली रात एक अजीब-सा सपना देखा; मुझे लगा कि मुझे हवा में उड़ाकर एक सैनिक के घर ले जाया गया। वहाँ मैंने नौकरानी की तरह उसकी सेवा की ।” राजा इस अजीब कहानी के बारे में सोचता रहा। फिर उसने अपनी बेटी से कहा कि वह अपनी जेब में छेद करके मटर भर ले। जो वह कह रही है वह अगर सपना नहीं, सच हुआ तो गली में मटर के दानों के गिरने से यह पता चल जाएगा कि वह किधर गई थी। उसने वैसा ही किया पर बौने ने भी यह बात सुन ली थी। शाम होने पर सैनिक ने फिर से राजकुमारी को लाने के लिए कहा। बौने ने दूसरी गलियों में भी मटर के दाने बिखेर दिए। अब यह जानना मुश्किल हो गया कि कौन-से राजकुमारी की जेब से गिरे । इधर लोग-बाग सारा दिन मटर के दाने बटोरते रहे और साथ ही यह भी सोचते रहे कि इतने सारे दाने कहाँ से आए।

राजकुमारी ने फिर पिता को बताया कि उसके साथ दुबारा वैसा ही हुआ, तब राजा ने कहा, “तुम अपने साथ अपना एक जूता ले जाना और वहाँ छिपा देना जहाँ तुम्हें ले जाया जाएगा।” बौने ने यह भी सुन लिया। जब सैनिक ने फिर से राजकुमारी को लाने को कहा तब बौना बोला, “इस बार मैं तुम्हें नहीं बचा सकता। मुझे लगता है कि इस बार तुम जरूर पकड़े जाओगे, और यह दुर्भाग्य होगा ।” पर सैनिक नहीं माना। तब बौने ने समझाया कि “ध्यान रखना, सुबह जल्दी शहर के दरवाजे से बाहर निकल जाना।” राजकुमारी ने पिता के कहे के अनुसार सैनिक के कमरे में एक जूता छिपा दिया। उसके वापिस पहुँचने के बाद राजा ने पूरे शहर में जूता ढूँढ़ने का आदेश दिया। जूता जहाँ छिपाया गया था, वहाँ मिल गया। सैनिक भागा तो सही पर जल्दी न करने की वजह से पकड़ा गया और जंजीरों से बाँधकर जेल में डाल दिया गया। सबसे बुरी बात यह हुई कि शहर छोड़ने की जल्दी में वह नीली रोशनी, सोना-चाँदी सब अपने कमरे में ही छोड़ गया। अब उसकी जेब में सिर्फ एक अशर्फी थी।

वह उदास खड़ा जेल की जाली के बाहर देख रहा था, तभी उसे अपना एक दोस्त जाता दिखा। उसने उसे पुकारकर कहा, “मेरा एक बण्डल सराय में छूट गया है, अगर तुम ला दोगे तो मैं तुम्हें एक अशर्फी दूँगा।” उसके दोस्त को लगा, इतने से काम के बदले में एक अशर्फी तो काफी है। वह गया और लाकर सैनिक को दे दिया। सैनिक ने फौरन पाइप जलाया, धुआँ उठने के साथ उसका दोस्त वह बौना आ गया। वह बोला, “मालिक डरना मत। बस जब आपकी पेशी होगी तब नीली रोशनी को साथ ले जाना मत भूलना। बाकी हिम्मत रखना, सब कुछ अपनी गति से चलने देना ।” जल्दी ही पेशी हुई, मामले की पूरी छानबीन हुई, कैदी को दोषी पाया गया। जब फैसला सुनाया गया तो उसे फाँसी की सज़ा दी गई।

उसे ले जाया जा रहा था, तब उसने राजा से एक बात की अनुमति माँगी। राजा ने पूछा “क्या चाहिए?” वह बोला, “मुझे रास्ते में एक पाइप पी लेने दो ।” राजा ने कहा, “एक नहीं दो पियो ।” तब उसने नीली रोशनी से अपना पाइप जलाया, पल-भर में बौना उसके सामने खड़ा था। सैनिक ने हुक्म दिया, “इस सारी भीड़ को या तो भगा दो या मार दो। रही राजा की बात, तो उसे तीन टुकड़ों में काट दो।” बौने ने सब काम करना शुरू कर दिया, जल्दी ही भीड़ हटा दी; पर राजा ने दया की भीख माँगी। अपनी जान के बदले में वह सैनिक को अपनी बेटी देने के लिए तैयार हो गया। उसने यह भी मान लिया कि उसके बाद पूरे राजपाट का मालिक वह सैनिक ही होगा।

(ग्रिम ब्रदरज़)

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Denmark ki Lok Kathayen-4/ डेनमार्क की लोक कथाएँ-4

कहानी-खिलौने की बतख: डेनमार्क की लोक कथा

एक बार की बात है कि एक मक्खा, एक टिड्डा और एक खिलौना बतख में यह बात हुई कि देखें उनमें से कौन सबसे ऊँचा कूदता है।

सो उन्होंने यह तमाशा देखने के लिये सारी दुनियाँ को बुलावा भेजा। पर जब तीनों एक कमरे में मिले तो तीनों को लगा कि वे तो तीनों ही सबसे ज़्यादा ऊँचा कूदने वाले हैं।

जब राजा को इस मुकाबले का बुलावा आया तो उसने सोचा कि यह मुकाबला बेकार नहीं जाना चाहिये सो उसने यह घोषणा करा दी कि वह अपनी बेटी की शादी उसी से करेगा जो उस मुकाबले में सबसे ऊँचा कूदेगा क्योंकि वह यह मुकाबला बेकार नहीं जाने देना चाहता था।

सबसे पहले मक्खा आगे आया। वह बहुत ही अच्छे तौर तरीके वाला था क्योंकि उसकी नसों में कुलीन परिवार का खून दौड़ रहा था। वह आदमियों के साथ रहता था जो अपने आपमें दूसरे जानवरों के लिये एक बहुत बड़ी बात थी। उसने चारों तरफ झुक कर लोगों को नमस्ते की।

उसके बाद टिड्डा आया। वह साइज में मक्खे से कहीं ज़्यादा बड़ा था पर बड़ी शान से चल रहा था। वह अपने वही हरे रंग के कपड़े पहने था जिनको पहन कर वह पैदा हुआ था। उसने बताया कि वह मिश्र के किसी बड़े पुराने परिवार से आता था और यहाँ भी उसकी बहुत इज़्ज़त थी।

सच्चाई तो यह थी कि जब वह खेतों से बाहर लाया गया था तो उसको रहने के लिये एक तीन मंजिल का एक बहुत बड़ा मकान दिया गया।

उसका यह मकान ताश का बना हुआ था और ताश के पत्तों की तस्वीर वाली साइड अन्दर की तरफ थी। उसके दरवाजे और खिड़कियाँ पान की बेगम की कमर में कटे हुए थे।

वह बोला — “मैं इतना अच्छा गाता हूँ कि यहाँ के 16 मकड़ों को जो जबसे पैदा हुए हैं तभी से गाते हैं उनको भी अभी तक रहने के लिये ताश के पत्तों घर नहीं दिया गया। जबसे उन्होंने मेरे गाने के बारे सुना है वे दुबले होते जा रहे हैं। ”

इस तरह मक्खे और टिड्डे ने अपने अपने बारे में वहाँ बैठे लोगों को बताया और उनको लगा कि वे राजकुमारी से शादी करने के लायक क्यों नहीं हो सकते थे।

खिलौना बतख कुछ नहीं बोला। लोगों ने सोचा शायद वह इस लिये नहीं बोला क्योंकि वह बहुत ज़्यादा जानता था। घर के कुत्ते ने उसको अपनी नाक से सूँघा और उनको विश्वास दिलाया कि खिलौना बतख भी एक अच्छे कुलीन परिवार से आता था।

एक बूढ़े सलाहकार को खिलौना बतख के बारे में चुप रहने के लिये तीन बार कहा जा चुका था कि खिलौना बतख के बारे में कुछ न बोले क्योंकि खिलौना बतख तो एक धर्मदूत था।

क्योंकि कोई आदमी भी क्या मौसम का हाल लिखेगा जो उस खिलौना बतख की पीठ पर लिखा रहता था और जिसे कोई भी पढ़ सकता था कि इस साल जाड़ा हल्का होगा या ज़ोर का।

राजा बोला — “इस बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि मेरी अपनी राय है। ”

मुकाबला शुरू होने वाला था सो मक्खा बहुत ज़ोर से कूदा। वह इतनी ज़ोर से कूदा कि लोगों को यही दिखायी नहीं दिया कि वह कहाँ तक ऊँचा गया। इसलिये लोगों ने कहा कि वह तो कूदा ही नहीं। हालाँकि यह बात उसके लिये बहुत शर्मनाक थी पर वह क्या करता उसकी कूद ही इतनी ऊँची ही थी।

उसके बाद टिड्डा कूदा। वह मक्खे से केवल आधा ऊँचा ही कूद पाया पर वह जा कर राजा के मुँह पर गिरा जो राजा को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा।

खिलौना बतख बहुत देर तक खड़ा रहा और सोचता रहा। उस को खड़े खड़े और सोचते सोचते इतनी देर हो गयी कि लोगों ने सोचा कि शायद वह तो कूदेगा ही नहीं।

घर के कुत्ते ने सोचा कहीं ऐसा न हो कि यह खिलौना बतख बेचारा बीमार हो गया हो। इतने में ही वह खिलौना बतख कूदा और राजकुमारी की गोद में जा कर गिर गया जो एक सोने के स्टूल पर राजा के पास ही बैठी थी।

राजा बोला — “मेरे लिये मेरी बेटी से बढ़ कर कोई नहीं है इसलिये खिलौना बतख ने ही सबसे ऊँची कूद लगायी है। इस सबको करने के लिये अच्छा दिमाग चाहिये और खिलौना बतख ने यह साबित कर दिया है कि उसके पास अच्छा दिमाग है और वह उसका अपना है। ”

और इस तरह उसने राजकुमारी को जीत लिया।

मक्खा बोला — “मेरे लिये सब बराबर है। राजकुमारी जी वह खिलौना बतख अपने पास रख सकती हैं। मुझे मालूम है कि मैं ही सबसे ऊँचा कूदा था पर आजकल की दुनिया में लोग अच्छी सूरत ही ज़्यादा पसन्द करते हैं काम नहीं। ”

उसके बाद मक्खा वह देश छोड़ कर विदेश चला गया और बेचारा वहीं विदेश में ही मारा गया।

टिड्डा एक हरी जगह चला गया और दुनियाँ की बातों के बारे में सोचने लगा — “अच्छी सूरत ही इस दुनिया में सबसे बड़ी चीज़ है। लोग इसी को सबसे ऊँची चीज़ समझते हैं काम कोई नहीं देखता। ”

फिर उसने एक दुखी गाना गाना शुरू कर दिया जो वह आज तक गा रहा है। और यह कहानी भी उसके उसी गीत से ली गयी है।

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Chinese Lok Kathayen-7/ चीनी लोक कथाएँ-7

कहानी-छांग फिंग का युद्ध: चीनी लोक कथा

ईसा पूर्व चौथी शताब्दी यानी युद्धरत राज्य काल में चीन की भूमि पर कई राज्य अस्तित्व में आए, जो आपस में युद्ध लड़ते थे। इसी दौरान छिन राज्य ने राजनीतिक सुधार कर अपनी शक्ति अत्याधिक बढ़ा दी थी। राजा छिन चाओवांग के शासन काल में छिन प्राचीन चीन की भूमि पर स्थापित सात प्रमुख राज्यों में से सबसे शक्तिशाली और समृद्ध हो गया और उसने देश का एकीकरण करने का अभियान चलाया। इस दौरान कई मशहूर युद्ध हुए, जिनमें छांग फिंग का युद्ध काफ़ी प्रसिद्ध था।

यहां बता दें कि ये सात प्रमुख राज्य छी राज्य, छू राज्य, यान राज्य, हान राज्य, चाओ राज्य, वेइ राज्य और छीन राज्य थे।

छिन राज्य के पड़ोसी राज्य हान, वेइ, यान और चाओ ने छिन राज्य की विस्तार नीति को विफल करने के लिए गठबंधन कायम किया। चारों राज्यों में से चाओ राज्य सबसे सशक्त था और वेइ सबसे कमजोर था।

ईसा पूर्व वर्ष 268 में छिन राज्य ने वेइ राज्य पर हमले के लिए सेना भेजी और उसे अपना अधीनस्थ राज्य बनाया। इसके बाद उसने हान राज्य पर धावा बोलने सेना भेजी। हान राज्य का राजा बहुत भयभीत हो गया और उसने छिन राज्य को अपने देश का शांग तांग शहर भेंट करने का निश्चय किया। लेकिन हान राज्य के शांग तांग शहर का महापौर फ़ंग थिंग अपने शहर को छिन राज्य को भेंट नहीं करना चाहता था। उसने शहर को चाओ राज्य को भेंट कर हान और चाओ के बीच छिन राज्य के आक्रमण का मुकाबला करने का गठबंधन करवाया।

चाओ राज्य का राजा दूरदर्शी नहीं था। उसने एक शहर के लालच में अंतिम परिणाम के बारे में नहीं सोचा और शांग तांग शहर को अपनी सीमा में शामिल किया। उसकी इस हरकत से छिन राज्य बहुत क्रोधित हो उठा। ईसा पूर्व 261 में, छिन राज्य के राजा ने सेनापति वांग ह को सेना के साथ शांग तांग शहर पर चढ़ाई करने भेजा।

शांग तांग में तैनात चाओ राज्य की सेना हार कर छांग फिंग नामक स्थान तक हट गई। छिन राज्य की सेना को रोकने के लिए चाओ राजा ने अपने वृद्ध सेनापति ल्यान फो को छांग फिंग में चाओ सेना का नेतृत्व करने भेजा।

चाओ सेना की मुख्य टुकड़ी ने छांग फिंग पर छिन राज्य की सेना के साथ कई बार युद्ध किये, लेकिन वह विजयी नहीं हुई और काफ़ी नुकसान भी हुआ। वस्तुगत स्थिति पर गौर कर चाओ सेना के सेनापति ल्यान फो ने अपनी अच्छी भू स्थिति के सहारे मजबूत मोर्चा बनाकर छिन राज्य की सेना के हमले को रोकने की प्रतिरक्षा नीति तैयार की। यह रणनीति रंग लायी, छिन राज्य की सेना के हमलों को वहीं रोका गया और दोनों सेनाओं के बीच लम्बे समय तक बराबर की स्थिति बनी रही।

युद्ध के इस प्रकार के गतिरोध को भंग करने के लिए छिन राज्य ने चाओ राज्य के शासक वर्ग में फूट डालने की चाल चली। उसने चाओ राजा के नज़दीकी मंत्री को धन-दौलत से खरीद लिया, जिसने चाओ राजा और सेनापति ल्यान फो के संबंधों को बिगाड़ने की कोशिश में यह अफ़वाह फैलाई कि ल्यान फो छिन राज्य की सेना को आत्मसमर्पण के लिए उस पर हमला नहीं करना चाहता। छिन राज्य की सेना सबसे ज्यादा चाओ राज्य के सेनापति चाओ खुओ से डरती है।

युद्ध की स्थिति से अज्ञात चाओ राजा को लगा कि ल्यान फो डर के मारे दुश्मन पर हमला नहीं करता है, इसलिए उसने उसे पद से हटा कर चाओ खुओ को सेनापति नियुक्त किया ।

वास्तव में चाओ खुओ ने कभी युद्ध में भाग नहीं लिया था। उसे असली युद्ध के बारे में कोई अनुभव भी नहीं था, पर वह युद्ध कला पर खोखली बातें बहुत पसंद करता था। छांग फिंग नाम के स्थल तक पहुंच कर उसने ल्यान फो की प्रतिरक्षा की रणनीति छोड़ कर दुश्मन पर दल बल से धावा बोलने और अंतिम जीत हार तय करने की रणनीति अपनायी।

इस तरह छिन राज्य चाओ राज्य की सेना में फूट का बीज डालने में सफल हुआ। उसने वांग ह की जगह अपने अनुभवी और वीर जनरल पाई छी को सेनापति नियुक्त किया और इस बदलाव को चाओ राज्य की सेना के प्रति गोपनीय भी रखा, ताकि चाओ राज्य की सेना चेत न जाए।

चाओ सेना के सेनापति चाओ खुओ की युद्ध का अनुभव न होने और खुद पर घमंड होने की कमजोरी से लाभ उठाकर छिन राज्य के सेनापति पाई छी ने दुश्मन को भ्रम में डालकर उसे घेरने की नीति लागू की।

ईसा पूर्व वर्ष 260 में चाओ खुओ ने अपनी सेना को छिन राज्य की सेना पर बड़ा हमला बोलने का आदेश दिया। दोनों सेनाओं में कुछ समय युद्ध चलने के बाद छिन सेना हार का बहाना कर पीछे हटने लगी। चाओ खुओ ने स्थिति की असलियत का जायजा न कर तुरंत छिन राज्य की सेना का पीछा करने का निश्चय किया। इस तरह चाओ राज्य की सेना छिन राज्य की सेना द्वारा पूर्व योजना के अनुसार बिछाए गए जाल में फंस गयी। उसे छिन राज्य की सेना की मुख्य टुकड़ी का जमकर मुकाबले का सामना करना पड़ा। इसी बीच बगल में घात लगाकर बैठी छिन राज्य की सेना की टुकड़ियों ने दोनों तरफ़ से चाओ सेना को टुकड़ों में विभाजित कर दिया और एक-एक को घेर लिया।

कड़ी घेराबंदी में फंसे चाओ खुओ ने खुद चाओ राज्य की सेना की मजबूत टुकड़ी का नेतृत्व कर घेराबंदी तोड़ने की अंतिम कोशिश की, किन्तु छिन राज्य की सेना के तीरों की अंधाधुंध वर्षा में वह खुद मारा गया। सेनापति के मरने पर चाओ राज्य की सेना का हौसला पस्त हो गया और सभी ने आत्मसमर्पण किया। इस तरह छिन राज्य की सेना ने छांग फिंग पर हुए घमासान युद्ध में अंतिम विजय पायी।

छांग फिंग का युद्ध चीन के युद्ध इतिहास में दुश्मन को घेराबंदी में डाल कर खत्म करने की एक शानदार प्राचीन मिसाल है।

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Chinese Lok Kathayen-4/ चीनी लोक कथाएँ-4

कहानी-सफेद नागिन: चीनी लोक कथा

पूर्वी चीन के हानचाओ शहर में स्थित पश्चिमी झील अपने असाधारण प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्वविख्यात है। देश विदेश के अनेक कवियों ने इस पर कविताएँ लिखी हैं और अनेक लोककथाओं में इसका वर्णन है। ऐसी ही लोक कथाओं में से एक है सफेद नागिन की कहानी। कहानी इस प्रकार है-

एक सफेद नागिन ने हजार साल तक कड़ी तपस्या कर अंत में मानव का रूप धारण किया| वह एक सुन्दर युवती में बदल गई और उसका नाम हुआ पाईल्यांगची। एक नीली नागिन ने पाँच सौ साल तपस्या की और एक छोटी लड़की के रूप में बदल गयी, नाम पड़ा श्योछिंग। पाईल्यांगची और श्योछिंग दोनों सहेलियों के रूप में पश्चिमी झील की सैर पर आईं, जब दोनों टूटे पुल के पास पहुँचीं तो श्योछिंग ने अलोकिक शक्ति से वर्षा बुलाई, वर्षा में श्युस्यान नाम का एक सुन्दर युवा छाता उठाए झील के किनारे पर आया। वर्षा के समय पाईल्यांगची और श्योछिंग के पास छाता नहीं था, वे काफी बुरी तरह पानी से भीग रही थीं, उन की मदद के लिए श्युस्यान ने अपना छाता उन दोनों को दे दिया और  स्वयं पानी में भीगता खड़ा रहा। ऐसे अच्छे चरित्र वाला युवा पाईल्यांगची को बहुत पसंद आया और श्युस्यान को भी सुंदर युवती पाईल्यांगची के प्रति प्रेम का अनुभव हुआ। श्योछिंग की मदद से दोनों की शादी हुई और उन्होंने झील के किनारे दवा की एक दुकान खोली। श्युस्यान बीमारियों की चिकित्सा जानता था, दोनों पति पत्नी निस्वार्थ रूप से मरीजों का इलाज करते थे और स्थानीय लोगों में वे बहुत लोकप्रिय हो गए।

शहर के पास स्थित चिनशान मठ के धर्माचार्य फाहाई को पाईल्यांगची के पिछले जन्मों का रहस्य मालूम था। उसने गुप्त रूप से श्य़ुस्यान को उसकी पत्नी का रहस्य बताया कि पिछले जन्म में वह सफेद नागिन थी। उसने श्युस्यान को यह भी बताया कि वह पाईल्यांगची का असली रूप कैसे देख सकता है। श्युस्यान को फाहाई की बातों से आशंका हुई।

इसी बीच त्वानवू पर्व आ गया। चीन का यह पर्व प्राचीन काल से ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस उत्सव पर लोग चावल से बनायी गई मदिरा पीते हैं, वे मानते हैं कि इससे सब विपत्तियों से रक्षा होती है। इस उत्सव के दिन श्युस्यान ने फाहाई द्वारा बताए तरीके से अपनी पत्नी पाईल्यांगची को मदिरा पिलाई। पाईल्यांगची गर्भवर्ती थी, मदिरा उस के लिए हानिकारक थी, लेकिन पति के बार-बार कहने पर उसने मदिरा पी ली। मदिरा पीने के बाद वह सफेद नागिन के रूप में वापस बदल गई, जिससे भय खा कर श्य़ुस्यान की मौत हो गई।

अपने पति को जीवित करने के लिए गर्भवती पाईल्यांगची हजारों मील दूर तीर्थ खुनलुन पर्वत में रामबाण औषधि गलोदर्म की चोरी करने गयी। गलोदर्म की चोरी के समय उस ने जान हथेली पर रख कर वहाँ के रक्षकों से घमासान युद्ध लड़ा, पाईल्यांगची के सच्चे प्रेम से प्रभावित हो कर रक्षकों ने उसे रामबाण औषधि भेंट की। पाईल्य़ांगची ने अपने पति को फिर से जीवित कर दिया, श्युस्यान भी अपनी पत्नी के सच्चे प्यार के वशीभूत हो गया, दोनों में प्रेम पहले से भी ज्यादा गाढ़ा हो गया।

धर्माचार्य फाहाई का मन दुष्टता से फिर भी न भरा। उसने श्युस्यान को धोखा दे कर चिनशान मठ में बंद कर दिया और उसे भिक्षु बनने पर मजबूर किया। इस पर पाईल्यांगची और श्योछिंग को अत्यन्त क्रोध आया, दोनों ने जल जगत के सिपाहियों को ले कर चिनशान मठ पर हमला बोला और श्युस्यान को बचाना चाहा। उन्होंने बाढ़ बुला कर मठ पर धावा करने की कोशिश की लेकिन धर्माचार्य फाहाई ने भी दिव्य शक्ति दिखा कर हमले का मुकाबला किया। क्योंकि पाईल्यांगची गर्भवती थी और बच्चे को जन्म देने वाली थी, इसलिए वह फाहाई से हार गयी और श्योछिंग की सहायता से पीछे हट कर चली गई। वो दोनों फिर पश्चिमी झील के टूटे पुल के पास आईं, इसी वक्त मठ में नजरबंद श्युश्यान मठ के बाहर चली युद्ध की गड़बड़ी से मौका पाकर भाग निकला, वह भी टूटे पुल के पास आ पहुँचा। संकट से बच कर दोनों पति-पत्नी ने चैन की साँस ली। इसी बीच पाईल्यांगची ने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन बेरहम फाहाई ने पीछा करके पाईल्यांगची को पकड़ा और उसे पश्चिमी झील के किनारे पर खड़े लेफङ पगोडे के तले दबा दिया और यह शाप दिया कि जब तक पश्चिमी झील का पानी नहीं सूख जाता और लेफङ पगोड़ा नहीं गिरता, तब तक पाईल्यांगची बाहर निकल कर जग में नहीं लौट सकती।

वर्षों की कड़ी तपस्या के बाद श्योछिंग को भी सिद्धि प्राप्त हुई, उसकी शक्ति असाधारण बढ़ी, उसने पश्चिमी झील लौट कर धर्माचार्य फाहाई को परास्त कर दिया, पश्चिमी झील का पानी सोख लिया और लेफङ पगोडा गिरा दिया एवं सफेद नागिन, पाईल्यांगची को बचाया। यह लोककथा पश्चिमी झील के कारण सदियों से चीनियों में अमर रही और पश्चिमी झील का सौंदर्य इस सुन्दर कहानी के कारण और प्रसिद्ध हो गया।

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Chinese Lok Kathayen-3/ चीनी लोक कथाएँ-3

कहानी-आग के बीज: चीन की लोक कथा

पुराने ज़माने में इंसान आग से अनभिज्ञ था, वो नहीं जानता था कि आग क्या चीज है| वह अपने जीवन में आग का उपयोग नहीं जानता था। उस जमाने में जब रात होती, तो हर तरफ अंधेरा छाया रहता था। जंगली जानवरों की आवाजें सुनाई देती थी। लोग सिमटकर ठिठुरते हुए सोते थे। रोशनी न होने से रात बहुत ठंडी और डरावनी होती थी। उस समय आग नहीं होने के कारण मानव कच्चा खाना खाता था। वह अधिक बीमार पड़ता था और उसकी औसत आयु भी बहुत कम होती थी।

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स्वर्ग लोक में फुशि नाम का देवता रहता था। जब उसने धरती पर रहने वाले मानव का दूभर जीवन देखा, तो उसे बड़ा दुख हुआ और दया आई। उसने सोचा कि मानव को आग से परिचित करवाया जाए। उसे एक उपाय सुझा। उसने अपनी दिव्य शक्ति से जंगल में भारी वर्षा के साथ बिजली गिरायी। एक भारी गर्जन के साथ जंगल के पेड़ों पर बिजली गिरी और पेड़ आग से जल उठे। देखते ही देखते आग की लपटें चारों तरफ तेज़ी से फैल गईं। लोग बिजली की भंयकर गर्जन और धधकती हुई आग से भयभित हो कर दूर भाग गए। कुछ समय के बाद वर्षा थम गई और बिजली का गर्जन शांत हुआ। रात हुई तो वर्षा के पानी से ज़मीन बहुत नम और ठंडी हो गई। दूर भाग चुके लोग फिर इकट्ठे हुए, वे डरते-डरते पेड़ों पर जल रही आग देखने लगे। तभी एक नौजवान ने पाया कि पहले जब रात होती थी तो जंगली जानवर हुंकार करते सुनाई देते थे लेकिन अब ऐसा नहीं हुआ। क्या जंगली जानवर पेड़ों पर जलती हुई इस सुनहरी चमकीली चीज़ से डरते हैं? नौजवान मन ही मन इस पर विचार करता रहा। वह हिम्मत बटोरकर आग के निकट गया तो उसे महसूस हुआ कि उसका शरीर गर्म हो उठा है। आश्चर्यचकित होकर उसने लोगों को आवाज दी – “आओ, देखो, यह जलती हुई चीज खतरनाक नहीं है, यह हमें रोशनी और गर्मी देती है। इसके पश्चात मानव ने यह भी पाया कि उनके आसपास जो जानवर आग से जल कर मरे, उनका मांस बहुत महकदार था। चखा, तो स्वाद बहुत अच्छा लगा। सभी लोग आग के पास जम आए, आग से जले जानवरों का मांस खाया। उन्होंने इससे पहले कभी पके हुए मांस का स्वाद नहीं लिया था। मानव को समझ आ गई कि आग सचमुच उपयोगी है। अब तो वे पेड़ों की टहनियाँ और शाखाएं एकत्रित करके जलाने लगे और आग को सुरक्षित कर रखने लगे। लोग रोज बारी बारी से आग के पास रहते हुए उसे बुझने से बचाते रहे। एक रात आग की रक्षा करने वाले व्यक्ति को नींद आ गई और वह सो गया। लकड़ियां पूरी तरह जल जाने के कारण आग बुझ गई। इस एक व्यक्ति की नींद के कारण मानव जाति पुनः अंधेरे और ठंड से जूझने लगी। जीवन दुबारा बहुत दूभर हो गया।

देवता फुशी ने ऊपर में यह जाना, तो उस ने उस नौजवान मानव को सपना दिखाया, जिस में उस ने युवा को बताया कि दूर दराज पश्चिम में स्वी मिन नाम का एक राज्य है , वहां आज के बीज मिलते है , तुम वहां जा कर आग के बीज वापल लाओ । सपने से जाग कर नौजवान ने सोचा , सपने में देवता ने जो बात कही थी, मैं उस का पालन करूंगा, तब वह आग के बीज तलाशने हेतु रवाना हो गया।

ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों, गहरी नदियों और घने जंगलों को पार कर, लाखों कठिनाइयों को सहते हुए वह अंत में स्वी मिन राज्य पहुंचा। लेकिन यहां भी न कोई रोशनी, न आग मिलती थी, हर जगह अंधेरा ही अंधेरा थी। नौजवान को बड़ी निराश हुई, तो स्वी मु नाम के एक किस्म के पेड़ के पास बैठा और विश्राम करने लगा। सहसा, नौजवान की आंखों के सामने चमक चौंधी, फिर चली, फिर एक चमक चौंधी, फिर चली गई, जिस से चारों ओर हल्की हल्की रोशनी से जगमगा उठा। नौजवान तुरंत उठ खड़ा हुआ और चारों ओर नजर दौड़ते हुए रोशनी की जगह ढूंढ़ने लगा। उसे पता चला था कि ‘स्वी मू’ नाम के पेड़ पर कई पक्षी अपने कड़े चोंच को पेड़ पर मार मार कर उस में पड़े कीट निकाल रही हैं, जब एक बार वे पेड़ पर चोंच मारती, तो पेड़ में से तेज चिंगारी चौंध उठी। यह देख कर नौजवान के दिमाग में यह विचार आया कि कहीं आग के बीज इस पकार के पेड़ में छिपे हुए तो नहीं? उस ने तुरंत ‘स्वी मू’ के पेड़ पर से एक टहनी तोड़ी और उसे पेड़ पर रगड़ने की कोशिश की, सचमुछ पेड़ की शाखा से चिंगारी निकली, पर आग नहीं जल पायी। नौजवान ने हार नहीं मानी, उस ने विभिन्न रूपों के पेड़ की शाखाएं ढूंढ़ कर धीरज के साथ पेड़ पर रगड़ते हुए आजमाइश की, अंत में उसकी कोशिश रंग लायी। पेड़ की शाखा से धुआँ निकला, फिर आग जल उठी, इस सफलता की खुशी में नौजवान की आंखों में आंसू भर आए।

नौजवान अपने गाँव वापस लौटा। वह लोगों के लिए आग के ऐसी बीज लाया था, जो कभी खत्म नहीं होने वाले थे। आग के बीज थे – लकड़ी को रगड़ने से आग निकालने का तरीका। तभी से संसार के मानव को आग का लाभ प्राप्त हुआ। अब उन्हें सर्दी से कोई भय न था। इस एक नौजवान की बुद्धिमता और बहादुरी का सम्मान करते हुए लोगों ने उसे अपना मुखिया चुना और उसे ‘स्वी रन’ यानी आग लाने वाला पुरूष कहते हुए सम्मानित किया।

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Korea ki Lok Kathayen-3(कोरिया की लोक कथाएँ-3)

कहानी-चमत्कारी कुम्हड़े: कोरिया की लोक कथा

एक समय की बात है। एक बूढ़े के तीन बेटे थे। उसके बड़े बेटे कुरूप और आलसी थे। पर सबसे छोटा बेटा बड़ा रूपवान, भला और मेहनती था। उसका नाम जुवांग था। असल में जुवांग मेहनत करने से सूखकर काँटा हो गया था। बूढ़ा बाप अपने तीनों बेटों में से जुवांग को ही सबसे ज्यादा प्यार करता था। इससे जुवांग के बड़े भाई उससे चिढ़ते और ईर्ष्या करते थे।

अचानक एक दिन बूढ़े की मृत्यु हो गई। अब जुवांग अपने दोनों दुष्ट भाइयों के आश्रय पर रह गया। पिता की मृत्यु से बेचारे जुवांग को इतना धक्का लगा कि वह फूट-फूटकर रोने लगा। इस पर उसके सबसे बड़े भाई टोंग ने चिढ़कर कहा, ‘‘अब यह झूठ-मूठ का रोना-धोना बंद कर!’’

जुवांग के दूसरे भाई सालमारी ने भी बड़े भाई की हाँ-में-हाँ मिलाते हुए कहा, ‘‘हाँ-हाँ, झूठ-मूठ का रोना-धोना बंद कर…।’’

सालमारी बेहद ही मूर्ख था । उसके दिमाग में भूसा भरा था। इसलिए हमेशा अपने बड़े भाई की हाँ-में-हाँ मिलाता था।

टोंग ने फिर अधीर होकर जुवांग से कहा, ‘‘मैं अब और ज्यादा तेरी रोनी सूरत नहीं देख सकता ! समझे…!’’

‘‘मैं अब और ज्यादा…’’ सालमारी ने भी टोंग की हाँ-में-हाँ मिलाते हुए कहा। पर पूरी बात वह कह भी नहीं पाया था कि टोंग ने जुवांग को गर्दन से पकड़ा और घर से निकाल बाहर किया। फिर सूखी रोटी का एक टुकड़ा निकालकर उसके मुँह पर मारा और कहा, ‘‘ले जा यह रोटी का टुकड़ा और दफा हो जा! बाप की जायदाद में से, बस यही तेरा हिस्सा है।’’ फिर दोनों बड़े भाइयों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और घर के भीतर चले गए और अपने छोटे भाई जुवांग की दुर्दशा पर बैठे खीसें निपोरते रहे।

जुवांग भली-भांति जानता था कि उसके दोनों भाई दुष्ट और द्वेषी हैं। इसलिए उनसे दया की भीख माँगना व्यर्थ था। बस  जुवांग वहाँ से उठा और निकट के एक जंगल में चला गया। समझदार तो था ही, जंगल से वह कुछ लकड़ियाँ और थोड़ा घास-फूस बटोर लाया । इस तरह उसने सिर छिपाने के लिए एक कुटिया बना ली और जल्दी ही उसकी चारदीवारी और छत मज़बूत कर ली।

जुवांग असल में हमेशा खुश रहता था और विपदा में भी मुस्कुराना जानता था। इसलिए कुछ समय तक वह जिस किसी तरह निर्वाह करता रहा। जंगल से कंद-मूल बटोरकर उन्हीं से पेट भरता। परंतु जाड़ा निकट आ रहा था और वह जानता था कि जंगल में इस छोटी-सी कुटिया में जाड़ा बिताना बड़ा कठिन होगा।

एक दिन उसे बड़ी भूख लगी। बेर बटोरते हुए वह जंगल में भटक रहा था। तीसरा पहर चढ़ आया। तब तक वह मुट्ठी-भर बेर ही जुटा पाया था जो उसकी भूख मिटाने के लिए पर्याप्त नहीं थे। हाथ में बेर लिये वह बड़ा उदास-उदास अपनी कुटिया की ओर चल पड़ा।

अचानक रास्ते में उसे एक घायल चिड़िया पड़ी मिली।

जुवांग ने झुककर चिड़िया की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि चिड़िया छटपटाते हुए पंख फड़फड़ाने लग गई, जैसे एकदम डर गई हो कि लड़का उसका अनिष्ट करने आया है। परंतु जुवांग दयापूर्वक धीरे-धीरे उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पुचकारने लगा। जब उसने ध्यान से देखा तो पाया कि चिड़िया का एक डैना टूटा हुआ था।

जुवांग तुरंत घायल चिड़िया को उठाकर अपनी कुटिया में ले आया। वहाँ एक कोने पर उसने घास-फूस से कोमल गुदगुदा-सा बिस्तर बनाया और उस पर चिड़िया को रख दिया। अपने सारे बेर भी उसने चिड़िया को खिला दिए। इसके बाद जुवांग ने घायल चिड़िया की इतनी सेवा की कि वह जल्दी ठीक होने लग गई और एक दिन सुबह-सवेरे ही उड़ गई। यह देखकर जुवांग उदास हो गया, क्योंकि सारे जंगल में केवल यही चिड़िया उसकी साथी थी और जुवांग को उससे बड़ा स्नेह हो गया था।

परंतु अगले दिन सुबह-सवेरे ही जुवांग को किसी पक्षी की चहचहाहट सुनाई पड़ी। स्वर जाना-पहचाना था। वह लपककर बाहर आया तो क्या देखता है कि वही चिड़िया आकर बैठी है। चिड़िया की चोंच में एक नन्हा-सा बीज था। चिड़िया ने बीज जुवांग के पैरों पर गिराते हुए कहा, ‘‘तुमने दया करके इतने दिनों तक मेरी सेवा की। तुम्हें धन्यवाद देने आई हूँ। लो, यह छोटा-सा बीज, इसे कहीं बो दो। तुम्हारा भाग्य चमक उठेगा।’’ जुवांग कुछ कहे कि इससे पहले ही चिड़िया फुर्र से उड़ गई। उसने वह बीज उठाया और अपनी कुटिया के बाहर बो दिया।

अगले दिन जब जुवांग की नींद खुली, तो क्या देखता है कि कुटिया में अंधेरा-अंधेरा-सा है पहले तो उसे भ्रम हुआ कि शायद आज बहुत जल्दी नींद खुल गई । फिर बिस्तर छोड़कर वह खड़ा हो गया – यह देखने के लिए कि सूरज निकला है या नहीं। जब कुटिया के दरवाजे में से झाँकने के लिए उसने बाहर सिर निकालना चाहा, तो एक बहुत ही कोमल पत्ता उसके मुख पर सरसराया। उसे हटाकर वह बाहर निकला, तो क्या देखता है कि चारों ओर अनगिनत हरे पत्ते फैले हुए हैं। उसने दोनों हाथों से पत्तों को हटाया, पर पत्ते इतने घने थे कि उसके मुँह-सिर पर गुदगुदी करते प्रतीत होते थे। जुवांग एकाएक विस्मित होकर चिल्लाया, ‘‘अरे, यह तो कुम्हड़े (पेठे) की बेल है।’’

इतनी बड़ी बेल उसने पहले कभी नहीं देखी थी। सारी कुटिया के ऊपर और उसके आस-पास यह बेल फैल गई थी। जहाँ तक दृष्टि जाती थी, बेल के पत्ते ही दिखाई पड़ते थे। पत्तों के बीच न जाने कितने रसीले कुम्हड़े चमक रहे थे।

जुवांग खुशी में नहीं समाया, खुशी तो उसे इस बात की थी कि अब पेट भरने के लिए उसे जंगल-जंगल भटकना नहीं पड़ेगा। उसने एक कुम्हड़ा तोड़ा और उठाकर कुटिया के भीतर ले आया।

ज्योंही जुवांग ने कुम्हड़े को काटा, कुम्हड़े के भीतर से जैसे प्रकाश फूट पड़ता था। फिर जब उसने कुम्हड़े को काटकर उसके दो हिस्से किए तो उसमें से झनझन करती सोने की मुहरें बिखर गई। जुवांग अचरज से आँखें फाड़े देखता रह गया। कुम्हड़े में सोने की मुहरें। और बाहर ढेरों कुम्हडे़ बेल में लगे थे। क्या सबमें ऐसी ही मुहरें हैं?

जुवांग का मन बल्लियों उछलने लगा। फिर उसने दो बड़े-बड़े कुम्हडे़ तोड़े और भागा-भागा अपने भाइयों के घर पहुँचा। हालांकि दोनों भाइयों ने उसके साथ बड़ी नीचता और निर्दयता का व्यवहार किया था, फिर भी वह यह खुशी अपने भाइयों में ही बाँटना चाहता था।

पर जब जुवांग हाथों में कुम्हड़े उठाए अपने भाइयों के द्वार पर पहुँचा, तो टोंग और साल-सारी लंबी ताने खर्राटे भर रहे थे। दोनों कुम्हड़े उसने एक चौकी पर रख दिए। फिर जैसे चहकते हुए बोला, ‘‘उठो देखो, मैं तुम्हारे लिए क्या उपहार लाया हूँ।’’

टोंग ने जरा आँख खोलकर देखा। कुम्हड़ों पर नजर पड़ते ही उसकी भवें तन गई। अपने छोटे भाई को डाँटकर बोला, ‘‘नालायक! यह कुम्हड़े…।’’

टोंग ने जुवांग से कहा, ‘‘ले जाओ अपने कुम्हड़े। हमें नहीं चाहिए। हमारे खेतों मे ढेरों कुम्हड़े लगते हैं…।’’

इस पर घोंघा बसंत साल-सारी ने भी अपने बड़े भाई की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ‘‘ले जा अपने कुम्हड़े….’’ वह बिल्कुल वही बात बोलना चाहता था जो टोंग ने कही थी। पर बोलते-बोलते गड़बड़ा गया। इतनी अकल जो नहीं थी उसमें।

जुवांग ने अपने बड़े भाई टोंग से कहा, ‘‘भइया! ये कोई मामूली कुम्हड़े नहीं है। उठकर देखो तो सही…’’ और यह कहने के साथ ही उसने एक कुम्हड़े को काटा और खनखनाती हुई सोने की मुहरें लुढ़कने लगीं।

टोंग और सालमारी ने सोने की मुहरें देखीं, तो इकट्ठा करने के लिए एकदम ऐसी फुरती दिखाई जैसी जीवन भर देखने में नहीं आयी थी। देखते ही देखते उन्होंने दूसरा कुम्हड़ा भी काट डाला। सोने की मुहरों का ढेर लग गया। इतनी मुहरें देखकर वे खुशी से नाच उठे और उछल-उछलकर कहने लगे, ‘‘अब काम करने की क्या जरूरत है। मजे से बैठकर खाएँगे, नाचेंगे कूदेंगे…।’’

तब जुवांग ने उन्हें जंगल में पड़ी एक घायल चिड़िया की सारी बात बताई। सारी बात सुनकर दोनों भाई ईर्ष्या से जल उठे। टोंग सिर खुजलाते हुए कुछ सोच रहा था। जुवांग चुपचाप खड़ा था। इस पर टोंग ने एकदम उसे धक्का मारा और डपटकर कहा, ‘‘चल भाग यहाँ से। दफा हो जा। हमारे घर में तेरी कोई जगह नहीं।’’

बेचारा जुवांग अपना-सा मुँह लेकर लौट पड़ा। वह इस आस से अपने भाइयों के पास गया था कि वे उसे गले लगाएँगे। पर दोनों भाइयों ने उसे दुत्कार कर निकाल दिया था।

टोंग ने सालमारी को पुकारा, ‘‘सालमारी ।’’

परंतु उत्तर न पाकर टोंग गुस्से से चिल्ला पड़ा, ‘‘सालमारी! कहाँ मर गया रे।’’ तभी नीचे जमीन पर उसे धीमी घुरघुराहट-सी सुनाई पड़ी। टोंग ने देखा तो उसका आलसी भाई सोने की मोहरों में सर छिपाए ऊँघ रहा था। बस, टोंग ने गुस्से में भरकर उसे लात मारी। सालमारी छटपटाकर उठ खड़ा हुआ।

टोंग ने कहा, ‘‘अरे, घोंघा बसंत ! मेरी बात ज़रा ध्यान से सुन।’’

सालमारी जैसे घुरघुराकर बोला- ‘‘बोल!’’

टोंग ने आदेश भरे स्वर में कहा, ‘‘थोड़ा नीचे झुककर मेरी बात सुन।’’

टोंग मोटा और ठिंगना था। सालमारी लंबा और दुबला-पतला। वह अकसर कहता था कि टोंग जो बात करता है, वह उसके पल्ले ही नहीं पड़ती, क्योंकि वह इतनी दूर से बोलता था। जब टोंग ने उससे झुककर सुनने को कहा तो सालमारी जैसे हाथ बाँधे गुलाम की तरह झुक गया। पर ज्योंही वह झुका कि टोंग ने उसकी नाक पर चुटकी ली। इस पर भी सालमारी ने चूँ तक नहीं की, क्योंकि टोंग अकसर ऐसा किया करता था। और सालमारी भी इसका आदी हो गया था। अब असली बात यह थी कि टोंग और सालमारी में से टोंग में ही थोड़ी-बहुत अक्ल थी। सालमारी को दिमाग लगाने में बड़ी तकलीफ होती थी, इसलिए वह अपने दिमाग से कोई काम नहीं लेता था और हमेशा टोंग की हाँ-में-हाँ मिलाता था। पर टोंग अकसर उसकी नाक पर घूँसा जड़ देता था। इस सबके बावजूद, दोनों भाइयों में खूब पटती थी।

अब टोंग ने अपने मूर्ख भाई को आदेश दिया, ‘‘जा, जंगल में कोई घायल चिड़िया पकड़कर ला।’’ फिर धमकाते हुए बोला, ‘‘और ध्यान से सुन। यदि तू खाली हाथ लौटा तो तेरी वह दुर्गति करूँगा कि…’’

सालमारी अपने भाई का आदेश पालन करने निकल पड़ा। पीछे टोंग बैठकर सोने की मुहरें गिनने लगा ।

तलाश करते-करते साँझ घिर आई पर सालमारी को टूटे पंख वाली कोई चिड़िया नहीं मिली। यह सोच-सोचकर वह घबराया कि यदि खाली हाथ लौटता है तो भाई घूँसे मार-मारकर उसकी नाक तोड़ देगा। बस, इसी डर से उसकी आँखों से पानी बह निकला और नाक भी दर्द करने लगी।

आखिर, उसे एक उपाय सूझा। झपटकर उसने एक चिड़िया को पकड़ा और उसका पंख तोड़कर वह घर की ओर ऐसे दौड़ा जैसे कोई मैदान मार लाया हो। घर आकर उसने अपने भाई को सारी बात बताई कि यह चिड़िया उसने किस तरह पकड़ी। और किस तरह अपने हाथ से पंख तोड़ा। यह सब बताकर वह खीसें निपोरते हुए बोला, ‘‘भइया, अब ऐसा करते हैं कि इसका दूसरा पंख भी तोड़ देते हैं…।’’

यह बात उसके मुँह में ही थी कि टोंग ने खींचकर एक घूँसा उसकी नाक पर जमाया। घूँसा मारने के लिए उसे ऊपर तक उछलना पड़ा और जब वह उछला तो जानते हो क्या हुआ! उसका पेट देर तक हिचकोले खाता रहा। खैर! दोनों भाइयों ने घायल चिड़िया का इलाज शुरू किया। उन्होंने उसे जड़ी-बूटी और बेर तो खिलाए, पर वे उसे कोसते और फटकारते रहे कि वह ठीक होने में इतनी देर क्यों लगा रही है। आखिर, चिड़िया उड़ने लायक हुई और एक दिन अपने आप पंख फैलाकर उड़ भी गई। यह देखकर दोनों भाइयों की खुशी का ठिकाना न रहा। अगले ही दिन चिड़िया चोंच में एक बीज लेकर आई और टोंग के पैरों पर डालकर उड़ गई ।

दोनों भाइयों ने बड़ी होशियारी से बीज बोया। बीज बोकर वे लेट गए। पर सारी रात उनकी आँखें में नींद नहीं थी। यही सोच-सोचकर करवटें बदलते रहे कि कैसी बेल निकलती है और फिर कितनी मुहरें मिलती हैं।

अगले दिन उठकर उन्होंने देखा तो उछल पड़े। घर के बाहर सचमुच, बहुत बड़ी बेल उग आई थी। इतनी बड़ी बेल उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी।

बस, जल्दी-जल्दी वे कुम्हड़े एकत्र करने लगे। जब सारा घर कुम्हड़ों से भर गया तो एक बड़ा-सा छुरा लेकर उन्होंने एक कुम्हड़ा काटा। जानते हो क्या हुआ!

कुम्हड़े के कटने की देर थी कि उसके भीतर से सोने की चमचमाती मुहरों की जगह चिपचिपे साँप, छिपकलियाँ और मेंढ़क निकल पड़े। यह भयानक, दृश्य देखकर दोनों भाई थर-थर काँपने लगे। किसी तरह उस कुम्हड़े को उठाकर उन्होंने बाहर फेंका और दूसरा कुम्हड़ा काटा। पर उसमें से भी वैसे ही साँप, छिपकलियाँ और मेंढ़क निकले। इसके बाद उन्होंने जो भी कुम्हड़ा काटा, सबमें से वही साँप, छिपकलियाँ और मेंढ़क निकले। सारे घर में साँप रेंग रहे थे। जब वे उनकी टाँगों से लिपटने लगे तो दोनों भाई चीखते हुए भागे और जंगल में पहूँचे । पर साँपों ने वहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ा ।

वहाँ से भागते हुए दोनों भाई शायद उस देश से भी भाग गए, क्योंकि उसके बाद किसी ने उनकी शक्ल नहीं देखी।

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Korea ki Lok Kathayen-2(कोरिया की लोक कथाएँ-2)

कहानी-होशियार छोटा चरवाहा: कोरिया की लोक-कथा

एक चरवाहे का बेटा शामो हर रोज अपनी भेड़ें चराने के लिए मैदान में जाया करता था । वह रोज सुबह भेड़ों को लेकर हरे-भरे मैदानों की ओर चल पड़ता था । सूरज डूबने से पहले ही वह घर को वापस चल देता था ।

एक दिन वह मैदान में बैठा कुछ सोच रहा था कि अचानक जोर से उछल पड़ा । उसने अपनी फर की टोपी जोर से हवा में उछाल दी ।

टोपी हवा में उछल कर उधर से गुजर रहे घोड़े के मुंह पर जा गिरी । अचानक टोपी गिरने से घोड़ा बिदक गया और अपनी पिछली टांगों पर खड़ा हो गया । घोड़े के अगले पैर ऊपर उठ जाने से घुड़सवार खेत में जा गिरा ।

इस घोड़े पर सवार युवक शहर के बड़े व्यापारी का बेटा था । वह सज-धज कर पिता के काम से कहीं जा रहा था ।

युवक को बहुत जोर का क्रोध आ गया । वह कपड़े झाड़कर खड़ा हो गया और चिल्लाकर चरवाहे के लड़के से बोला – “ऐ लड़के, तुम्हें जरा भी अक्ल नहीं । तुमने मेरे घोड़े को डरा दिया और मुझे गिरा दिया ।”

शामो बोला – “मैंने तो खुशी में टोपी उछाली थी मुझे क्या पता था कि यह घोड़े के पास गिरेगी और घोड़ा डर जाएगा ।”

“ऐसी क्या खुशी मिल गई तुम्हें । जरा हमें भी तो बताओ और अगर मुझे चोट लग जाती तो तुम्हारी खैर नहीं थी ।” युवक बोला ।

शामो बोला – “मेरे पिता ने मुझसे एक सवाल पूछा था मैंने उसका उत्तर ढूंढ़ लिया है ।”

“ऐसा क्या सवाल था ?”

“सवाल यह था कि वह क्या चीज है जो आदमी से ऊंची है, लेकिन मुर्गी से छोटी ।”

“भला ऐसी क्या चीज हो सकती है?”

“तो क्या इसका उत्तर आपको भी नहीं मालूम ।”

“मालूम तो है पर तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं ।” युवक ने चतुराई से कहा ।

शामो बोला – “वह चीज टोपी है । यह मनुष्य के सिर पर रहकर मनुष्य से ऊंची रहती है, परंतु जमीन पर रख दो तो मुर्गी से भी छोटी बन जाती है ।”

युवक शामो की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ । वह बोला – “काफी होशियार जान पड़ते हो । यदि तुमने मेरा एक काम कर दिया तो में तुम्हें ढेर-सा इनाम दूंगा । कल मैं लौटते वक्त तुम्हारे पास आऊंगा । तुम मेरे लिए एक ऐसी भेड़ का इंतजाम करके रखना, जो न काली हो, न भूरी हो, न सफेद हो और न ही चितकबरी हो ।”

यह कहकर वह युवक वहां से चला गया । शामो उसके जाने के बाद सोचता रहा ।

अगले दिन शामो अपनी भेड़ चरा रहा था । तभी कल वाला युवक अपने घोड़े पर सवार आया और बोला – “लड़के क्या तुमने मेरे लिए मेरी मनपसन्द भेड़ लाकर रखी है ।”

शामो बोला – “आपकी मनपसन्द भेड़ मेरे घर पर है । आप उसे किसी को भेज कर मंगवा सकते हैं । परंतु ध्यान रखिएगा कि जो व्यक्ति लेने आए वह न रविवार को आए, न सोमवार या मंगल को न बुद्ध या बृहस्पति को, न शुक्र या शनिवार को दिन में आए न रात्रि में ।”

शामो की बात सुनकर युवक जोर से हंसा और बोला – “मैं तुम्हारी बुद्धिमत्ता से खुश हुआ । यह सोने की पांच अशर्फियां तुम्हारा इनाम है । यदि तुम कभी कोई नौकरी करना चाहो तो मेरे पास चले आना ।”

यह कर कर युवक ने अपना पता शामो को दे दिया और घोड़े पर सवार होकर घोड़ा दौड़ाता हुआ चला गया ।

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Indonesia ki Lok Kathayen-2(इंडोनेशिया की लोक कथाएँ-2)

कहानी- चतुर ठग: इंडोनेशिया की लोक-कथा

एक बार वोहारिया नाम का आदमी यात्रा कर रहा था। रास्ते में उसे ज़ोर की भूख और प्यास लगी इसलिए एक टूटे-फूटे कुएं के पास रुककर पहले तो उसने खाना खाया, फिर लोटा लेकर पानी निकालने कुएं के पास चला गया। जैसे ही  वह कुएं के पास पहुंचा उसे अंदर से बकरे के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी। वोहारिया ने कुएं में झांककर देखा तो वहां उसे एक बकरा दिखाई दिया। कुएं में पानी बिलकुल कम था और एक ओर के सूखे हिस्से पर खड़ा होकर बकरा चिल्ला रहा था। वोहारिया अपने साथ  रस्सी लेकर कुएं में उतर गया और बकरे को रस्सी से बांधकर बाहर आकर उसे खींचने लगा।

उसी समय कुनामा नामक एक सौदागर वहां से गुजर रहा था। उसके साथ सामान से लदे हुए बहुत सारे ऊंट भी थे। उसने वोहारिया से पूछा-“क्यों भाई , यहां नज़दीक कहीं पीने के लिए पानी मिलेगा क्या?”

वोहारिया ने जवाब दिया-“इस कुएं में पानी तो है पर बहुत ही कम , क्योंकि यह कुआं बकरों का है।

“बकरों का कुआं?  मतलब ?”

“वाह जी, वाह! इतनी-सी बात भी आपकी समझ में न आयी? बकरों के कुएं का मतलब  हैं, जिस कुएं से बकरे निकलते हैं ऐसा कुआं।” चतुराई से बात बनाकर वोहारिया ने रस्सी खींच ली और बकरे को बाहर निकाल लिया। सौदागर ने जब कुएं से बकरा निकला हुआ देखा तो अचम्भे में पड़ गया और कहा-“यह भी खूब है भई! मैंने तो कभी ऐसा कुआं नहीं देखा और यह बकरा भी खूब मोटा-ताज़ा दिखाई दे रहा है।”

“हां, पर यह बात सही है! इस प्रकार के कुएं बहुत कम पाए जाते हैं।”

“पर आप किस प्रकार बकरे निकालते हैं और यहां बकरे बन कैसे जाते हैं?”

“सीधी सी बात है, रात को एक बकरे की सींग कुएं में डालो और दूसरे दिन पूरा बकरा तैयार हो जाता है। फिर मैं रस्सी से खींचकर उसे बाहर निकाल लेता हूं। जैसा की आप ने अभी थोड़ी देर पहले देखा |

“बड़े, अचम्भे की बात है! काश! मेरे पास भी ऐसा कोई कुआं होता।”

“सभी लोग ऐसा ही सोचते हैं, पर बहुत कम लोग ही ऐसा कुआं खरीद सकते हैं ।’

सौदागर थोड़ी देर तक सोचते हुए चुपचाप खड़ा रहा। फिर उसने वोहारिया से कहा-“देखो भाई , मैं कोई बहुत बड़ा अमीर तो हूं नहीं, फिर भी यदि तुम अपना यह कुआं मुझे दे दो तो मैं तुम्हें अनाज की चार बोरियां दूंगा।”

वोहारिया ने मुंह बनाकर कहा-“चार बोरियां? इतने में तो मैं दो बकरे भी न खरीद सकूंगा।”

“तो फिर मैं सामान से भरे चार ऊंट तुम्हें देता हूँ!”

“ऊंह!” वोहारिया ने गर्दन हिलाकर कहा । वह अपने आप से इस प्रकार बात करने लगा कि सौदागर को भी सुनाई दे और कहने लगा–“हर रोज़ एक बकरा यानी एक हफ्ते में सात बकरे,एक महीने में तीस और एक साल में तीन सौ पैंसठ बकरे मिलेंगे?”

सौदागर ने जब वोहारिया का हिसाब सुना तो सोचा कि कुआं खरीदने में ही फायदा है। वोहारिया ने कहा-“अजी, मेरे ऊंट तो देखिये। ऐसे मजबूत ऊंट बहुत कम पाए जाते हैं। फिर भी अब आखिरी बात कहता हूं कि मैं छः ऊंट तुम्हें दूंगा। मेरे पास इतने ही ऊंट हैं। यदि देना चाहो तो कुआं दे दो, नहीं तो मैं चला ।”

वोहारिया ने कुछ सोचकर जवाब दिया-”अच्छा भई, छः ही सही । तुम्हें यह कुआं बहुत ही पसंद आ गया है तो मैं अपना नुकसान करके दे देता हूं।’”

कुनामा सौदागर ने खुश होकर कहा-“भगवान तुम्हारा भला करे ।”

ऊंटों की तरफ देखकर वोहारिया ने मन-ही-मन कहा-“भला तो हो ही गया है और ऊंट लेकर जाने लगा। तब उसे रोककर सौदागर ने पूछा-“अजी, अपना नाम तो आपने बतलाया ही नहीं।”

“मेरा नाम है “मैंक हांनाचूं” वोहारिया ने उत्तर दिया और दक्षिण दिशा की ओर जल्दी-जल्दी चला गया। सौदागर ने वोहारिया का वही नाम सच मान लिया। असल में वोहारिया ने अपना नाम न बतलाकर कहा था–‘मैं कहां नाचूं?

शाम होते ही सौदागर ने बकरों के सींग कुएं में डाल दिए और वहीं नजदीक ही सो गया। सुबह तड़के उठकर उसने कुएं में झांककर देखा पर सींग के बकरे नहीं बने थे। सौदागर को बड़ी फिक्र हुई, पर उसने सोचा कि सींग डालने में कुछ गलती हो गई हो शायद!

दूसरे दिन शाम को उसने और दो बकरों के सींग कुएं में डाल दिए पर उनके भी बकरे नही बने। तीसरे दिन गांव में जितने भी बकरों के सींग मिले सब-के-सब लाकर कुएं में डाल दिए और रात-भर कुएं में झांककर पूछता रहा-““बकरो, तैयार हो गए क्या तुम?” पर बकरे बने ही नही थे तो उनकी आवाज़ कहां से आती!”

दिन निकलते ही सौदागर ने कुएं में सींग वैसे के वैसे ही पड़े हुए देखे तो समझ गया कि उस आदमी ने उसे ठगा है, पर अब उसे किस तरह पकड़ा जाए? वह तो कभी का चला गया था। आख़िर जिस ओर वोहारिया गया था उधर की ओर जाने से शायद उसका पता लग जाए, यह सोचकर वह दक्षिण दिशा की ओर चला।

दिन-भर वह चलता रहा। आखिर शाम के समय वह एक गांव में पहुंचा । वहां चौराहे पर उसे बहुत से लोग दिखाई दिए। इन लोगों को शायद उस ठग का पता मालूम होगा, ऐसा सोचकर सौदागर ने उनसे पूछा-“’क्या, आप लोगों को ‘मैंक हांनाचूं’ के बारे में कुछ मालूम है?”

सभी लोग अचम्भे से सौदागर की ओर देखने लगे। आखिर उनमें से एक ने कहा-“हां-हां, मालूम क्यों नहीं? आप यहीं पर नाच कीजिए।” और कुछ लोग ढोलक बजाने लगे।

“यह क्या कह रहे हैं आप? मैंने पूछा कि ‘मैंक हांनाचूं” के बारे में आप कुछ जानते हैं क्या?”

“जानते क्यों नहीं? हम सभी लोग जानते हैं। आप यहीं पर नाच कीजिए। हम बाजे बजाते हैं।” वे सब बाजे बजाने लगे।

सौदागर को बड़ा गुस्सा आया। उसने सोचा-“कैसे वाहियात लोग हैं! मैं ‘मैंक हांनाचूं’ के बारे में पूछ रहा हूं तो ये मुझसे नाचने को कह रहे हैं। पाजी कहीं के!” गुस्से में सौदागर तुरंत वहां से चला गया।

रात को रास्ते में एक पेड़ के नीचे वह सो गया और दिन निकलने के पहले तड़के ही वह फिर चलने लगा। सुबह होते ही वह दूसरे गांव में पहुंचा। वहां बाज़ार में पहुंचकर उसने चिल्लाकर पूछा-“मैंक हांनाचूं के बारे में किसी को मालूम है क्या?”

वहां के सभी लोग सौदागर के पास एकत्र  हो गए और बोले-“हां-हां, मालूम क्यों नहीं? आप यहीं नाच कीजिए। गांव के सभी लोग यहीं पर नाचते हैं।” और उन सबने तालियां बजाना शुरू कर दिया।

शर्मिंदा होकर सौदागर वहां से भी भागा । और भी दो-तीन गांवों में वह गया और “मैंक हांनाचूं’ के बारे में उनसे पूछा, पर हर जगह लोगों ने उसे नाचने के लिए ही कहा । बेचारा सौदागर! उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि लोग उसे नाचने को क्यों  कहते हैं! उसने सोचा कि गाँव के लोग इसी तरह बदमाश होते हैं शायद । वह शहर जा पहुंचा। शहरों में भी उसे वही जवाब मिला इसलिए निराश होकर जब वह वहां से जाने लगा, तभी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और न्यायाधीश के सामने उसे ले जाकर कहा-“यह मनुष्य लोगों को ‘मैंक हांनाचूं? पूछता है और जब लोग नाचने की जगह बतलाते हैं तो न नाचकर भाग जाता है।”

न्यायाधीश के पूछने पर जब सौदागर ने पूरा किस्सा सुनाया, तो न्यायाधीश ने पूछताछ करवाई और उसे मालूम हो गया कि वोहारिया नाम का एक आदमी छः ऊंट लेकर गांव में आया है। न्यायाधीश ने समझ लिया कि यही वह ठग है। तब  एक सिपाही को उसके यहां भेजकर न्यायधीश ने कहलाया कि ‘’मैं क्या करूँ’’ नाम का एक आदमी तुमसे मिलना चाहता है, जल्दी चलो।

वोहारिया उसी वक्त न्यायाधीश के पास दौड़ता हुआ आया। न्यायाधीश ने जान-बूझकर उससे पूछा-“क्या नाम है आपका?”

वोहारिया ने कहा-“आपको “मैं क्या करूँ’’ के बारे में मालूम है?”

“हां-हां, अच्छी तरह मालूम है। तुम अब चुपचाप इनके सभी ऊंट लौटा दो नहीं तो जेल की हवा खानी पड़ेगी।”

वोहारिया ने देखा कि न्यायाधीश सभी बातें समझ गया है। ज्यादा गड़बड़ी न करते हुए उसने सौदागर के ऊंट उसे वापस दे दिए और उससे माफी मांग ली। सौदागर ने न्यायाधीश को अनेक धन्यवाद दिए और अपने ऊंट लेकर वहां से जाने लगा। बाज़ार में पहुंचते ही सभी लोग “यहीं नाचो, यहीं नाचो” कहकर उसके पीछे पड़ गए। मगर इस समय सौदागर को गुस्सा नहीं आया बल्कि ऊंट मिल जाने की खुशी में वह सचमुच  वहां नाचने लगा और लोग तालियां बजाने लगे।

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Dakshin Africa ki Lok Kathayen -7(ज़ुलु लोक कथाएं-7)

कहानी-चतुर सियार(Clever Jackal)-दक्षिण अफ्रीका की लोक कथा

“कैसे हो प्यारे बच्चों?” बूढ़ी दादी ने शाम बच्चों को पास बुला कर पूछा| वह आगे बोली, “क्या तुम्हे पता है, कभी- कभी चतुर होना भी ज़रूरी होता है, देखो अपनी चतुराई से कैसे नोजवागा कितनी ही बार खाने के बर्तन से बहार निकल पाया है|

“सियार भी तो बहुत चतुर जानवर होता है…सच है न दादी!” छोटा शिपोह बोला| सिपोह किसी और जानवर का भी नाम ले सकता था पर उसने जानबूझ कर सियार का ही नाम लिया क्योंकि सब प्यार से उसे म्पू-न्गु-शे बुलाते थे, जिसका मतलब होता है सियार| जब वह बहुत छोटा था तो रोते हुए वह सियार की ही तरह आवाजें निकाला करता था इसलिए उसकी दादी गोगो ने उसको यह नाम दिया था| जबकि सिपोह को लगता था कि उसका नाम म्पू-न्गु-शे अर्थात सियार इसलिए रखा गया क्योंकि वह बहुत चुस्त और फुर्तीला है|

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बूढ़ी दादी हंसी और शिपोह को देखते हुए बोली, “सही बात है मेरे बच्चे, सियार बहुत ही चतुर होता है, इतना चतुर कि चतुराई से अपनी जान भी बचा लेता है|”

“हाँ दादी, मुझे याद है कैसे सियार ने चतुराई से चरवाहे जाबु की जान बुबेशी शेर से बचाई थी| दादी सियार की कोई और कहानी सुनाओ ना”, सिपोह प्यार से बोला|

“हाँ दादी” सभी बच्चे एक साथ बोले “सुनाओ ना दादी”

“ठीक है बच्चों, सुनाती हूँ..ध्यान से सुनो और सीखो|” इतना बोलकर बूढ़ी दादी पेड़ के तने से टिक कर आराम से बैठ गई, और बोली “बहुत समय पहले…..”

एक जंगल में सियार एक पतले संकरे चट्टानी रास्ते से गुजर रहा था| हमेशा की ही तरह उसने अपनी नाक जमीन की तरफ कर रखी थी ताकि कोई भी अनजानी गंध को आसानी से पकड़ सके| “क्या पता कब मुझे कुछ खाने को मिलेगा|” वह अपने आप से बोला| हालाँकि दोपहर की तेज़ गरमी में एक चूहा भी मिलना मुश्किल था| यह ज़रूर था की उसे एक दो छिपकली ज़रूर मिल जाए|

तभी उसे उस रास्ते में जानी पहचानी सी हलचल महसूस हुई, “अरे नहीं!” सियार मन ही मन भुनभुनाया और अपनी जगह पर ही ठिठक गया| जब उसने देखा की शेर उसकी ओर ही आ रहा है और भागने का और कोई रास्ता भी नहीं है तो डर के मारे उसका बुरा हाल हो गया| वह पहले भी कई बार बुबेशी शेर को मूर्ख बना चुका था, उसे लगा इस बार ज़रूर महान बुबेशी अपना बदला ले लेगा| तभी अचानक ही उसे एक चाल सूझी|

“बचाओ! बचाओ!” ऊपर की ओर देखते हुए वह चट्टानी संकरे रास्ते पर घुटनों के बल सरकने लगा|

यह देख शेर आश्चर्य से रुक गया|

“बचाओ!” सियार डर का भाव लाकर रोते हुए बोला|

सियार ने शेर को देखा और बोला, “ओ महाराज बुबेशी, बचाइए, हमारे पास समय बिलकुल नहीं है, ऊपर देखिये वो बड़ी –बड़ी चट्टानें गिरने वाली हैं| हम दोनों दब कर मर जाएंगे| ओ ताकतवर महान राजा कुछ कीजिए, हमें बचाइए|” सियार अपना सर हाथ से ढक कर झुक गया|

शेर ने सावधानी से ऊपर देखा लेकिन इससे पहले कि वह कुछ सोच पाता सियार गिड़गिड़ाते हुए बोला, “महाराज अपनी ताकत का प्रयोग कीजिए और इन लटकती हुई चट्टानों को रोकिए|”

शेर ने अपने ताकतवर कंधे चट्टानों से टिकाए और उन्हें ऊपर की ओर धकेलने लगा|

“ओ महाराज, धन्यवाद!” सियार फ़ौरन बोला| “मैं फ़ौरन ही एक बांस ढूँढ कर लाता हूँ और इस पत्थर से टिका देता हूँ, इससे हम दोनों को जान बच जाएगी|” यह बोल कर सियार वहां से रफूचक्कर हो गया|

अब शेर वहां अकेला खड़ा चट्टान को ऊपर की ओर धकेलने की कोशिश करता रहा| न जाने कितने दिनों तक शेर उस चट्टान को पकड़े खड़ा रहा और न जाने कब उसे यह अहसास हुआ कि सियार उसे फिर एक बार अपनी चतुराई से मूर्ख बना अपनी जान बचा गया था|

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Italy ki Lok Kathayen-6(इटली की लोक कथाएँ-6)

कहानी- तीन फायदेमंद बातें: इटली की लोक कथा

बहुत दिन पहले रोम में डोमीटियन नामक एक सम्राट्‌ हुआ था। वह बहुत बुद्धिमान तथा न्यायप्रिय सम्राट था। उसके राज्य में कोई भी अपराधी व दुष्ट पनपने न पाता था। सजा के डर से सब कोई अपराध करने से घबराते थे।

एक दिन जब वह अपने कमरे में बैठा था तो एक सौदागर ने आकर उसके द्वार को खटखटाया। द्वारपाल ने द्वार खोला और उससे द्वार पर दस्तक देने का कारण पूछा, तो वह सौदागर बोला, “मैं कुछ ऐसी चीजें बेचने आया हूं जो फायदेमंद हैं।”

उसकी बात सुनकर द्वारपाल उसे अन्दर ले गया और सम्राट्‌ के सामने हाज़िर किया। सौदागर ने सम्राट्‌ के सामने बड़ी नम्रता से झुककर अभिवादन किया तो सम्राट्‌ ने पूछा, “कहो, तुम्हारे पास बेचने के लिए क्या सौगात है?”

सौदागर बोला, “राजन्! मैं ऐसी तीन बातें बेचना चाहता हूं जो तर्क तथा ज्ञान से भरी हुई हैं।”

“अच्छा, यह बात है। बताओ, उनका मूल्य क्या लोगे?”

“केवल एक हजार मुद्राएँ।”

इस पर सम्राट्‌ बोला, “और यदि वे बातें किसी काम की न हुईं तो क्या मेरा धन मुफ्त में जायेगा?”