Categories
Bed time Stories France-ki-lok-kathayen Lok Kathayen Story

France ki Lok Kathayen-1/ फ्रांस की लोक कथाएँ-1

करामाती दाना: फ्रांस की लोक-कथा

बहुत पहले की बात है । एक भिखारी सड़क के किनारे रहा करता था । उसका न तो कोई रहने का ठिकाना था और न ही कमाई का कोई निश्चित जरिया ।

वह कंधे पर एक झोला लटकाए सुबह से शाम तक भीख मांगा करता था । कहीं से उसे रोटी मिल जाती तो दूसरी जगह से सब्जी मांग कर पेट भर लेता था । लोग उस वैगी कह कर पुकारते थे ।

एक दिन वैगी को सुबह से शाम तक कुछ भी खाने को नहीं मिला । उसका भूख के मारे बुरा हाल था । वह परेशान होकर इधर-उधर घूम रहा था । तभी एक बूढ़ी स्त्री ने उसे अपने पास बुलाया और उसकी परेशानी का कारण पूछा ।

स्त्री ने वैगी को एक गेहूं का दाना देते हुए कहा – “यह गेहूं का दाना करामाती है, इसे अपने पास संभाल कर रखना । जब तक यह दाना तुम्हारे पास रहेगा तुम्हें भोजन की कोई कमी नहीं होगी ।”

वैगी दाने को उलट-पलट कर देखने लगा, फिर उसने सिर उठाकर स्त्री से कुछ पूछना चाहा, परंतु तब तक स्त्री गायब हो चुकी थी ।

वैगी दाने को अपने थैले में डालकर भोजन की तलाश में पास के एक होटल की तरफ से गुजर रहा था । तभी एक व्यक्ति ने उसे रोककर कहा – “तुम यहां आकर पेट भर कर भोजन खा सकते हो । यहां आज हमारे सेठ जी का जन्मदिन मनाया जा रहा है ।”

वैगी मन ही मन बहुत खुश हुआ और होटल से पेट भर खाना खाकर बाहर निकला । वह सोचने लगा कि यह गेहूं के दाने की करामात है या केवल एक संयोग कि उसे मुफ्त में पेट भर भोजन मिल गया ।

अगले दिन वह घूमते-घूमते थक गया तो भोजन के लिए एक घर पर पहुंच गया । वहां उसने दरवाजे पर दस्तक दी । एक सभ्य व पढ़ी-लिखी स्त्री ने उसे आदरपूर्वक भीतर बुलाया और कहा – “आप यहां रात्रि को विश्राम कर सकते हैं । पहले आप भोजन कर लीजिए ।”

वैगी को अब यकीन हो गया कि गेहूं का दाना वाकई करामाती है । उसने पेट भर भोजन किया और फिर सोने जाने लगा । तभी उसे शिष्टाचार की बात याद आई तो उसने अपने थैले से अपना चाकू व प्लेट निकालकर मेजबान स्त्री को दे दी । फिर उसने गेहूं का दाना स्त्री को देते हुए कहा – “मेडम, यह दाना मेरे लिए बहुत कीमती है, इसे संभाल कर रख लीजिए । सुबह को जाते वक्त यह दाना मैं आपसे वापस ले लूंगा ।”

मेजबान स्त्री ने गेहूं का दाना संभाल कर मेज पर रखी प्लेट में रख दिया और सोने चली गई ।

प्रतिदिन की भांति स्त्री सुबह को जल्दी उठ गई और अपनी मुर्गियों को बाड़े में दाना खिलाने लगी । फिर अपनी रसोई में काम करने चली गई ।

तभी एक मुर्गी खुले दरवाजे से कमरे के भीतर आकर जमीन से बचा-खुचा खाना उठा कर खाने लगी । इसी बीच वैगी की आंख खुली । उसने देखा कि एक मुर्गी कमरे में घूम रही है ।

वैगी मुर्गी के पीछे दौड़ा । मुर्गी बचने के लिए मेज पर चढ़ कर बैठ गई । उसने प्लेट में गेहूं का दाना देखा तो झट से खा गई । जब तक वैगी मुर्गी को पकड़ता, मुर्गी दाना खा चुकी थी ।

वैगी ने शोर मचाना शुरू कर दिया । घर के सभी लोग जाग गए । घर का मालिक बहुत ही ईमानदार व शरीफ इंसान था । वह पूछने लगा – “आप हमारे मेहमान हैं, क्या बात हो गई, जिससे आप इतने नाराज हैं ?”

वैगी बोला – “मैंने मैडम को कह दिया था कि मेरा गेहूं का दाना संभाल कर रखिएगा, पर उन्होंने मेज पर रख दिया, उसे आपकी मुर्गी खा गई, मुझे वही गेहूं का दाना चाहिए ।”

मेजबान लोग यह तो जानते नहीं थे कि उस दाने में क्या खासियत थी । वे खुशामद करने लगे कि आप जितने गेहूं चाहें ले जा सकते हैं । वह स्त्री एक कटोरी भर गेहूं ले आई, परंतु वैगी रोने लगा कि उसे वही दाना चाहिए । मेजबान ने कहा – “वह दाना तो मुर्गी के पेट में जा चुका है । आप चाहें तो उस मुर्गी को ले जा सकते हैं ।”

वैगी को बात जंच गई । उसने वह मुर्गी लेकर अपने थैले में डाल ली और वहां से चल दिया । सारा दिन इधर-उधर घूमने के बाद वह शाम को एक घर के सामने पहुंचा । वहां भी उसको आदरपूर्वक भीतर बुलाया गया और स्वादिष्ट पकवान खिलाए गए ।

वैगी ने मकान की मालिकिन को मुर्गी और थैला संभाल कर रखने को दे दिया और सो गया । सुबह उठ कर वैगी ने मालिकिन से अपनी मुर्गी मांगी । मालिकिन मुर्गी लेने गई तो देखा कि वैगी की मुर्गी के पंख बिखरे पड़े हैं ।

मालिकिन के नौकर ने बताया कि नई मुर्गी देखकर मालिकिन की मुर्गियों ने बाड़े में उस पर आक्रमण कर दिया और अपनी चोंचें मार-मार कर लहूलुहान कर दिया था । इससे वैगी की मुर्गी जान बचाने के लिए बाहर भागी थी । बरामदे में ही मालिकिन का कुत्ता बैठा था जो मुर्गी को मार कर खा गया । वैगी रोने-चिल्लाने लगा कि उसे अपनी वही मुर्गी चाहिए ।

मालिकिन की समझ में नहीं आ रहा था कि वैगी को कैसे शांत कराए । उसने विनती करते हुए कहा कि आप उसके बदले में कोई-सी मुर्गी ले सकते हैं परंतु वैगी नहीं माना । तब मालिकिन ने हार कर अपना पालतू कुत्ता वैगी को दे दिया ।

वैगी ने उस कुत्ते को अपने थैले में डाल लिया और आगे चल दिया । आगे जाकर वह एक शानदार बंगले के आगे रुका । बंगले में राजकुमारी अपने परिवार के साथ रहती थी । बंगले की मालिकिन ने वैगी को भीतर बुलाया । नहला-धुला कर कपड़े दिए, फिर पेट भर भोजन खाने को दिया ।

बंगले में रहने वाली राजकुमारी को देखकर वैगी के दिल में लालच आ गया । वह सोचने लगा कि एक गेहूं के दाने की करामात के कारण उसे मुर्गी और फिर मालिकिन का प्यारा कुत्ता मिल गया । यदि किसी तरह यह कुत्ता मर जाए तो बदले में मैं राजकुमारी को मांग लूं और उससे विवाह कर लूं, फिर मेरा जीवन सुखमय हो जाएगा ।

वैगी ने जानबूझकर कुत्ते को राजकुमारी के पीछे लगा दिया । जब राजकुमारी अपनी सखियों के साथ बगीचे में खेल रही थी, तभी कुत्ता जोर से राजकुमारी पर झपट पड़ा । राजकुमारी ने अपने बचाव में एक बड़ा पत्थर कुत्ते को दे मारा । कुत्ते को चोट लगी, पर कुत्ता फिर उठकर राजकुमारी के पीछे भागा । इस बार राजकुमारी ने क्रोध में आकर कुत्ते पर डंडे से वार कर दिया । कुत्ता वहीं मर कर ढेर हो गया ।

वैगी जब बंगले से बाहर जाने लगा तो उसने बंगले की मालिकिन से अपना कुत्ता मांगा । परंतु मालिकिन ने सकुचाते हुए कुत्ते के मरने का सारा किस्सा बयान कर दिया ।

वैगी जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगा कि उसे अपना ही कुत्ता चाहिए । बगंले की मालिकिन ने बहुत समझाया कि वह दूसरा कुत्ते ले लो, परंतु वह नहीं माना । तब बंगले की मालिकिन ने असमर्थता प्रकट कर दी । वैगी बोला – “जिसने मेरे कुत्ते को मारा है, मुझे वही दे दीजिए, मैं उसी से संतुष्ट हो जाऊंगा ।”

मालिकिन को वैगी की बात सुनकर बहुत क्रोध आया कि एक आदमी कुत्ते के बदले उनकी बेटी मांग रहा था ।

मालिकिन ने कहा – “तुम्हें मैं एक हजार मोहरें देती हूं । यदि तुममें कोई हुनर है या किसी कला में निपुण हो तो इन्हें एक महीने में अपनी कमाई से दोगुना कर लाओ । यदि तुम यह कर सके तो अपनी बेटी का हाथ तुम्हें दे दूंगी ।”

वैगी को धन का लालच आ गया और मोहरें लेने को तैयार हो गया । उसने मोहरें लेकर अपने थैले में डाल लीं और चल दिया ।

रास्ते में वैगी ऊंचे-ऊंचे सपने देखने लगा । परंतु वह यह नहीं समझ पा रहा था कि वह किस तरह का व्यापार करके इन मोहरों को दुगुना करे । वैगी को भीख मांगने के सिवा कुछ काम नहीं आता था । भीख मांग कर एक महीने में तो क्या एक वर्ष में भी इतनी मोहरें कमाना संभव नहीं होगा ।

तभी वैगी ने सोचा कि वह पहले कुछ मोहरें खर्च करके आराम से जीवन बिताएगा । फिर बाद में कमाई के बारे में सोचेगा ।

रास्ते में एक जगह रुक कर वैगी ने मोहर निकालने के लिए थैले में हाथ डाला तो उसे यूं लगा कि हाथ में कुछ चुभ गया हो । उसने तुरंत हाथ बाहर निकाल लिया । उसने थैला खोल कर देखना चाहा तो सैकड़ों कीड़े-मकौड़े उड़कर उसे काटने लगे ।

वैगी ने थैला उठा कर दूर नदी में फेंक दिया । वैगी खाली हाथ रह गया । अब उसके सामने भीख मांगने के सिवा कोई चारा नहीं था । उसे लालच का फल मिल गया था ।

Categories
Bed time Stories Lok Kathayen Norway ki Lok Kathayen Story

Norway ki Lok Kathayen-1/ नॉर्वे की लोक कथाएँ-1

केटी वुडिनक्लोक: नॉर्वे की लोक-कथा

एक बार नौर्वे देश में एक राजा था जिसकी रानी मर गयी थी। उसकी इस रानी से एक बेटी थी। उसकी यह बेटी इतनी चतुर और प्यारी थी कि उसके जैसा चतुर और प्यारा दुनिया में और कोई नहीं था।

राजा अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था। वह उसके मरने का काफी दिन तक उसका गम मनाता रहा पर फिर अकेले रहते रहते थक गया और उसने दूसरी शादी कर ली।

उसकी यह नयी रानी एक विधवा थी और इसके भी एक बेटी थी पर इसकी यह बेटी उतनी ही बुरी और बदसूरत थी जितनी राजा की बेटी प्यारी, दयावान और चतुर थी।

सौतेली माँ और उसकी बेटी दोनों राजा की बेटी से बहुत जलती थीं क्योंकि वह बहुत ही प्यारी थी। जब तक राजा घर में रहता था वे दोनों राजा की बेटी को कुछ भी नहीं कह सकती थीं क्योंकि राजा उसको बहुत प्यार करता था।

कुछ समय बाद उस राजा को किसी दूसरे राजा के साथ लड़ाई के लिये जाना पड़ा तो राजकुमारी की सौतेली माँ ने सोचा कि यह मौका अच्छा है अब वह उस लड़की के साथ जैसा चाहे वैसा बरताव कर सकती है।

सो उन दोनों माँ बेटी ने उस लड़की को भूखा रखना और पीटना शुरू कर दिया। वे दोनों जहाँ भी वह जाती सारे घर में उसके पीछे पड़ी रहतीं।

आखिर उसकी सौतेली माँ ने सोचा कि यह सब तो उसके लिये कुछ जरा ज़्यादा ही अच्छा है सो उसने उसे जानवर चराने के लिये भेजना शुरू दिया।

अब वह बेचारी जानवर चराने के लिये जंगल और घास के मैदानों में चली जाती। जहाँ तक खाने का सवाल था कभी उसको कुछ थोड़ा सा खाना मिल जाता और कभी बिल्कुल नहीं। इससे वह बहुत ही दुबली होती चली गयी और हमेशा दुखी रहती और रोती रहती।

उसके जानवरों में कत्थई रंग का एक बैल था जो हमेशा अपने आपको बहुत साफ और सुन्दर रखता था। वह अक्सर ही राजकुमारी के पास आ जाता था और जब राजकुमारी उसको थपथपाती तो वह उसको थपथपाने देता।

एक दिन वह दुखी बैठी हुई थी और सुबक रही थी कि वह बैल उसके पास आया और सीधे सीधे उससे पूछा कि वह इतनी दुखी क्यों थी। लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया और बस रोती ही रही।

बैल एक लम्बी सी साँस ले कर बोला — “आह, हालाँकि तुम मुझे बताओगी नहीं पर मैं सब जानता हूँ। तुम इसी लिये रोती रहती हो न क्योंकि रानी तुमको ठीक से नहीं रखती। वह तुमको भूखा मारना चाहती है।

पर देखो खाने के लिये तुमको कोई चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि मेरे बाँये कान में एक कपड़ा है। जब तुमको खाना खाने की इच्छा हो तो उस कपड़े को मेरे कान में से निकाल लो और घास पर फैला दो। बस तुमको जो खाना चाहिये वही मिल जायेगा। ”

राजकुमारी को उस समय बहुत भूख लगी थी सो उसने उस बैल के बाँये कान में रखा कपड़ा निकाल लिया और उसे घास पर बिछा दिया। उसको उस कपड़े से खाने के लिये फिर बहुत सारी चीज़ें मिल गयीं। उस खाने में शराब भी थी, माँस भी था और केक भी थी।

अब जब भी उसको भूख लगती तो वह बैल के कान में से कपड़ा निकालती उसको घास पर बिछाती और जो उसको खाने की इच्छा होती वह खाती। कुछ ही दिनों में उसके शरीर का माँस और रंगत दोनों वापस आने लगीं।

जल्दी ही वह थोड़ी मोटी और गोरी गुलाबी हो गयी यह देख कर उसकी सौतेली माँ और उसकी बेटी गुस्से से लाल पीली होने लगीं। उस सौतेली माँ की समझ में यही नहीं आया कि उसकी वह सौतेली बेटी जो इतनी बुरी हालत में थी अब ऐसी तन्दुरुस्त कैसे हो गयी।

उसने अपनी एक नौकरानी को बुलाया और उसको राजकुमारी के पीछे पीछे जंगल जाने के लिये कहा और कहा कि वह जा कर वहाँ देखे कि वहाँ सब ठीक चल रहा है या नहीं क्योंकि उसका खयाल था कि घर का कोई नौकर राजकुमारी को खाना दे रहा होगा।

वह नौकरानी राजकुमारी के पीछे पीछे जंगल तक गयी। वहाँ जा कर उसने देखा कि किस तरह से उस सौतेली बेटी ने बैल के कान में से एक कपड़ा निकाला, उसे घास पर बिछाया और फिर किस तरह से उस कपड़े ने उस राजकुमारी को खाना दिया। सौतेली बेटी ने उसे खाया और वह खाना खा कर वह बहुत खुश हुई।

जो कुछ भी उस नौकरानी ने जंगल में देखा वह सब उसने जा कर रानी को बताया।

उधर राजा भी लड़ाई से वापस आ गया था। क्योंकि वह दूसरे राजा को जीत कर आया था इसलिये सारे राज्य में खूब खुशियाँ मनायी जा रही थीं। पर सबसे ज़्यादा खुश थी राजा की अपनी बेटी।

राजा के आते ही रानी ने बीमार पड़ने का बहाना किया और बिस्तर पर जा कर लेट गयी। उसने डाक्टर को यह कहने के लिये बहुत पैसे दिये कि “रानी तब तक ठीक नहीं हो सकती जब तक उसको कत्थई रंग के बैल का माँस खाने को न मिल जाये। ”

राजा और महल के नौकर आदि सबने डाक्टर से पूछा कि रानी की बीमारी की क्या कोई और दवा नहीं थी पर डाक्टर ने कहा “नहीं।” सबने उस कत्थई रंग के बैल की ज़िन्दगी के लिये प्रार्थना की क्योंकि वह बैल सभी को बहुत प्यारा था।

लोगों ने कोई दूसरा कत्थई बैल ढूँढने की कोशिश भी की पर सबने यह भी कहा कि उस बैल के जैसा और कोई बैल नहीं था। उसी बैल को मारा जाना चाहिये और किसी बैल के माँस के बिना रानी ठीक नहीं हो सकती।

जब राजकुमारी ने यह सुना तो वह बहुत दुखी हुई और जानवरों के बाड़े में बैल के पास गयी। वहाँ भी वह बैल अपना सिर लटकाये हुए नीची नजर किये इस तरह दुखी खड़ा था कि राजकुमारी उसके ऊपर अपना सिर रख कर रोने लगी।

बैल ने पूछा — “तुम क्यों रो रही हो राजकुमारी?”

तब राजकुमारी ने उसे बताया कि राजा लड़ाई पर से वापस आ गया था और रानी बहाना बना कर बीमार पड़ गयी है। उसने डाक्टर को यह कहने पर मजबूर कर दिया है कि रानी तब तक ठीक नहीं हो सकती जब तक उसको कत्थई रंग के बैल का माँस खाने को नहीं मिलता। और अब उसको मारा जायेगा।

बैल बोला — “अगर वे लोग पहले मुझे मारेंगे तो जल्दी ही वे तुमको भी मार देंगे। तो अगर तुम मेरी बात मानो तो हम दोनों यहाँ से आज रात को ही भाग चलते हैं। ”

राजकुमारी को यह अच्छा नहीं लगा कि वह अपने पिता को यहाँ अकेली छोड़ कर चली जाये पर रानी के साथ उसी घर में रहना तो उससे भी ज़्यादा खराब था। इसलिये उसने बैल से वायदा किया कि वह वहाँ से भाग जाने के लिये रात को उसके पास आयेगी।

रात को जब सब सोने चले गये तो राजकुमारी जानवरों के बाड़े में आयी। बैल ने उसको अपनी पीठ पर बिठाया और वहाँ से उसको ले कर बहुत तेज़ी से भाग चला।

अगले दिन सुबह सवेरे जब लोग उस बैल को मारने के लिये उठे तो उन्होंने देखा कि बैल तो जा चुका है। जब राजा उठा और उसने अपनी बेटी को बुलाया तो वह भी उसको कहीं नहीं मिली। वह भी जा चुकी थी।

राजा ने चारों तरफ अपने आदमी उन दोनों को ढूँढने के लिये भेजे। उनको उसने चर्च में भी भेजा पर दोनों का कहीं पता नहीं था। किसी ने भी उनको कहीं भी नहीं देखा था।

इस बीच वह बैल राजकुमारी को अपनी पीठ पर बिठाये बहुत सी जगहें पार कर एक ऐसे जंगल में आ पहुँचा था जहाँ हर चीज़ ताँबे की थी – पेड़, शाखाएँ, पत्ते, फूल, हर चीज़।

पर इससे पहले कि वे इस जंगल में घुसते बैल ने राजकुमारी से कहा — “जब हम इस जंगल में घुस जायेंगे तो ध्यान रखना कि तुम इस जंगल की एक पत्ती भी नहीं तोड़ना। नहीं तो यह सब मेरे और तुम्हारे ऊपर भी आ जायेगा।

क्योंकि यहाँ एक ट्रौल रहता है जिसके तीन सिर हैं और वही इस जंगल का मालिक भी है। ”

“नहीं नहीं। भगवान मेरी रक्षा करे। ” उसने कहा कि वह वहाँ से कुछ भी नहीं तोड़ेगी।

वे दोनों उस जँगल में घुसे। राजकुमारी किसी भी चीज़ को छूने तक के लिये बहुत सावधान थी। वह जान गयी थी कि किसी भी शाख को छूने से कैसे बचना था। पर वह बहुत घना जंगल था और उसमें से हो कर जाना बहुत मुश्किल था।

बचते बचते भी उससे उस जंगल के एक पेड़ की एक पत्ती टूट ही गयी और वह उसने अपने हाथ में पकड़ ली।

बैल बोला — “अरे यह तुमने क्या किया। अब तो ज़िन्दगी और मौत के लिये लड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं है। पर ध्यान रखना वह पत्ती तुम्हारे हाथ में सुरक्षित रहे उसे फेंकना नहीं। ”

जल्दी ही वे जंगल के आखीर तक पहुँच गये और जैसे ही वे वहाँ पहुँचे कि एक तीन सिर वाला ट्रौल वहाँ आ गया।

उसने पूछा — “किसने मेरा जंगल छुआ?”

बैल बोला — “यह जंगल तो जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है। ”

ट्रौल चीखा — “वह तो हम लड़ाई से तय करेंगे। ”

बैल बोला — “जैसा तुम चाहो। ”

सो दोनों एक दूसरे की तरफ दौड़ पड़े और एक दूसरे से गुँथ गये। ट्रौल बैल को खूब मार रहा था पर बैल भी अपनी पूरी ताकत से ट्रौल को मार रहा था।

यह लड़ाई सारा दिन चली। आखीर में बैल जीत गया। पर उसके शरीर पर बहुत सारे घाव थे और वह इतना थक गया था कि उससे तो उसकी एक टाँग भी नहीं उठ पा रही थी सो उन दोनों को वहाँ एक दिन के लिये आराम करने के लिये रुकना पड़ा।

बैल ने राजकुमारी से कहा कि वह ट्रौल की कमर की पेटी से लटका हुआ मरहम का एक सींग ले ले और वह मरहम उसके शरीर पर मल दे। राजकुमारी ने ऐसा ही किया तब कहीं जा कर बैल कुछ ठीक हुआ। तीसरे दिन वे फिर अपनी यात्रा पर चल दिये।

वे फिर कई दिनों तक चलते रहे। कई दिनों की यात्रा के बाद वे एक चाँदी के जंगल में आये। यहाँ हर चीज़ चाँदी की थी – पेड़, शाखाएँ, पत्ते, फूल, हर चीज़।

पर इससे पहले कि वे इस जंगल में घुसते पहले की तरह से बैल ने इस बार भी राजकुमारी से कहा — “जब हम इस जंगल में घुस जायेंगे तो ध्यान रखना कि तुम इस जंगल की एक पत्ती भी नहीं नहीं तोड़ोगी नहीं तो यह सब मेरे और तुम्हारे ऊपर भी आ जायेगा।

क्योंकि यहाँ एक छह सिर वाला ट्रौल रहता है जो इस जंगल का मालिक है और मुझे नहीं लगता कि मैं उसको किसी भी तरह जीत पाऊँगा। ”

राजकुमारी बोली — “नहीं नहीं। मैं ख्याल रखूँगी कि मैं यहाँ से कुछ न तोड़ूँ और तुम भी मेरे लिये यह दुआ करते रहना कि यहाँ से मुझसे कुछ टूट न जाये। ”

पर जब वे उस जंगल में घुसे तो वह इतना ज़्यादा घना था कि वे दोनों उसमें से बड़ी मुश्किल से जा पा रहे थे। राजकुमारी बहुत सावधान थी कि वह वहाँ की कोई भी चीज़ छूने से पहले ही दूसरी तरफ को झुक जाती थी पर हर मिनट पर शाखें उसकी आँखों के सामने आ जातीं।

बचते बचते भी ऐसा हुआ कि उससे एक पेड़ की एक पत्ती टूट ही गयी।

बैल फिर चिल्लाया — “उफ। यह तुमने क्या किया राजकुमारी? अब हम अपनी ज़िन्दगी और मौत के लिये लड़ने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते। पर ध्यान रहे इस पत्ती को भी खोना नहीं। सँभाल कर रखना। ”

जैसे ही वह यह कह कर चुका कि वह छह सिर वाला ट्रौल वहाँ आ गया और उसने पूछा — “वह कौन है जिसने मेरा यह जंगल छुआ?”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “यह जंगल जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है। ”

ट्रौल बोला — “यह तो हम लड़ कर देखेंगे। ”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “जैसे तुम्हारी मरजी। ”

कह कर वे दोनों एक दूसरे की तरफ दौड़ पड़े। बैल ने ट्रौल की आँखें निकाल लीं और उसकेे सींग उसके शरीर में घुसा दिये। इससे उसके शरीर में से उसकी आँतें निकल कर बाहर आ गयीं।

पर वह ट्रौल क्योंकि उस बैल के मुकाबले का था सो बैल को उस ट्रौल को मारने में तीन दिन लग गये सो वे तीन दिन तक लड़ते ही रहे।

पर इस ट्रौल को मारने के बाद बैल भी इतना कमजोर हो गया और थक गया कि वह हिल भी नहीं सका। उसके घाव भी ऐसे थे कि उनसे खून की धार बह रही थी।

इस ट्रौल की कमर की पेटी से भी एक मरहम वाला सींग लटक रहा था सो बैल ने राजकुमारी से कहा कि वह उस ट्रौल की कमर से वह सींग निकाल ले और उसका मरहम उसके घावों पर लगा दे।

राजकुमारी ने वैसा ही किया तब जा कर वह कुछ ठीक हुआ। इस बार बैल को ठीक होने में एक हफ्ता लग गया तभी वे आगे बढ़ सके।

आखिर वे आगे चले पर बैल अभी भी बिल्कुल ठीक नहीं था सो वह बहुत धीरे चल रहा था।

राजकुमारी को लगा कि बैल को चलने में समय ज़्यादा लग रहा था सो समय बचाने के लिये उसने बैल से कहा कि क्योंकि वह छोटी थी और उसके अन्दर ज़्यादा ताकत थी वह जल्दी चल सकती थी वह उसको पैदल चलने की इजाज़त दे दे पर बैल ने उसको इस बात की इजाज़त नहीं दी। उसने कहा कि उसको अभी उसकी पीठ पर बैठ कर ही चलना चाहिये।

इस तरह से वे काफी दिनों तक चलते हुए बहुत जगह होते हुए फिर एक जंगल में आ पहुँचे। यह जंगल सारा सोने का था। उस जंगल के हर पेड़, शाख, डंडी, फूल, पत्ते सभी कुछ सोने के थे। इस जंगल में भी वही हुआ जो ताँबे और चाँदी के जंगलों में हुआ था।

बैल ने राजकुमारी से कहा कि वह उस जंगल में से भी कुछ न तोड़े क्योंकि इस जंगल का राजा एक नौ सिर वाला ट्रौल था और यह ट्रौल पिछले दोनों ट्रौल को मिला कर उनसे भी ज़्यादा बड़ा और ताकतवर था। बैल तो इसको जीत ही नहीं सकता था।

बैल जानता था कि राजकुमारी इस बात का पूरा ध्यान रखेगी कि वह उस जंगल की कोई चीज़ न तोड़े पर फिर भी वही हुआ। जब वे जंगल में घुसे तो यह जंगल ताँबे और चाँदी के जंगलों से भी कहीं ज़्यादा घना था।

इसके अलावा वे लोग जितना उस जंगल के अन्दर चलते जाते थे वह जंगल और ज़्यादा घना होता जाता था। आखिर वह इतना ज़्यादा घना हो गया कि राजकुमारी को लगा कि अब वह उस जंगल में से बिना किसी चीज़ को छुए निकल ही नहीं सकती।

उसको पल पल पर यही लग रहा था कि किसी भी समय पर उससे वहाँ कोई भी चीज़ टूट जायेगी।

इस डर से वह कभी बैठ जाती, कभी अपने आपको किसी तरफ झुका लेती, कभी मुड़ जाती पर फिर भी उन पेड़ों की शाखाएँ हर पल उसकी आँखों के सामने आ रही थीं।

इसका नतीजा यह हुआ कि उसको पता ही नहीं चला कि वह उन सोने की शाखाओं, फूलों, पत्तों से बचने के लिये कर क्या रही है। और इससे पहले कि उसको यह पता चलता कि क्या हुआ उसके हाथ में एक सोने का सेब आ गया।

उसको देख कर तो उसको इस बात का इतना ज़्यादा दुख हुआ कि वह बहुत ज़ोर से रो पड़ी और उसको फेंकना चाहती थी कि बैल बीच में ही बोल पड़ा — “अरे इसको फेंकना नहीं। इसे सँभाल कर रख लो और इसका ध्यान रखना। ” पर राजकुमारी का तो रोना ही नहीं रुक रहा था।

बैल ने उसको जितनी भी तसल्ली वह दे सकता था दी पर उसको लग रहा था कि अबकी बार उस बैल को केवल उसकी वजह से बहुत भारी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा और उसको यह भी शक था कि यह सब कैसे होगा क्योंकि इस जंगल का मालिक ट्रौल बहुत बड़ा और ताकतवर था।

तभी उस जंगल का मालिक वह नौ सिर वाला ट्रौल वहाँ आ गया। वह इतना बदसूरत था कि राजकुमारी तो उसकी तरफ देखने की भी हिम्मत नहीं कर सकी।

वहाँ आ कर वह गरजा — “यह किसने मेरा जंगल छुआ?”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “यह जंगल जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है। ”

ट्रौल बोला — “यह तो हम लड़ कर देखेंगे। ”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “जैसे तुम्हारी मरजी। ”

कह कर वे दोनों एक दूसरे की तरफ दौड़ पड़े। बहुत ही भयानक दृश्य था। राजकुमारी तो उसको देख कर ही बेहोश होते होते बची।

इस बार भी बैल ने ट्रौल की आँखें निकाल लीं और उसके सींग उसके पेट में घुसा दिये जिससे उसकी आँतें उसके पेट से बाहर निकल आयीं। फिर भी ट्रौल बहुत बहादुरी से लड़ता रहा।

जब बैल ने ट्रौल का एक सिर मार दिया तो उसके दूसरे सिरों से उस मरे हुए सिर को ज़िन्दगी मिलने लगी। इस तरह वह लड़ाई एक हफ्ता चली क्योंकि जब भी बैल उस ट्रौल के एक सिर को मारता तो उसके दूसरे सिर उसके मरे हुए सिर को जिला देते थे।

उसके सारे सिरों को मारने में उस बैल को पूरा एक हफ्ता लग गया तभी वह उस ट्रौल को मार सका।

अबकी बार तो बैल इतना घायल हो गया था और इतना थक गया था कि वह अपना पैर भी नहीं हिला सका। वह तो राजकुमारी से इतना भी नहीं कह सका कि वह ट्रौल की कमर की पेटी में लगे मरहम के सींग में से मरहम निकाल कर उसके घावों पर लगा दे।

पर राजकुमारी को तो यह मालूम था सो उसने ट्रौल की कमर की पेटी से मरहम का सींग निकाला और उसमें से मरहम निकाल कर बैल के घावों पर लगा दिया। इससे बैल के घावों को काफी आराम मिला और वह धीरे धीरे ठीक होने लगा।

इस बार बैल को आगे जाने के लिये तीन हफ्ते तक आराम करना पड़ा। इतने आराम के बाद भी बैल घोंघे की चाल से ही चल पा रहा था।

बैल ने राजकुमारी को बताया कि इस बार उनको काफी दूर जाना है। उन्होंने कई ऊँची ऊँची पहाड़ियाँ पार कीं, कई घने जंगल पार किये और फिर एक मैदान में आ निकले।

बैल ने राजकुमारी से पूछा — “क्या तुमको यहाँ कुछ दिखायी दे रहा है?”

राजकुमारी ने जवाब दिया — “नहीं, मुझे तो यहाँ कुछ दिखायी नहीं दे रहा सिवाय आसमान के और जंगली मैदान के। ”

वे कुछ और आगे बढ़े तो वह मैदान कुछ और एकसार हो गया और वे कुछ और आगे का देख पाने के लायक हो गये।

बैल ने फिर पूछा — “क्या तुमको अब कुछ दिखायी दे रहा है?”

राजकुमारी बोली — “हाँ अब मुझे दूर एक छोटा सा किला दिखायी दे रहा है। ”

बैल बोला — “अब वह छोटा किला इतना छोटा भी नहीं है राजकुमारी जी। ”

काफी देर तक चलने के बाद वे एक पत्थरों के ढेर के पास आये जहाँ लोहे का एक खम्भा सड़क के आर पार पड़ा हुआ था।

बैल ने फिर पूछा — “क्या तुमको अब कुछ दिखायी दे रहा है?”

राजकुमारी बोली — “हाँ अब मुझे किला साफ साफ दिखायी दे रहा है और अब वह बहुत बड़ा भी है। ”

बैल बोला — “तुमको वहाँ जाना है और तुमको वहीं रहना है। किले के ठीक नीचे एक जगह है जहाँ सूअर रहते हैं तुम वहाँ चली जाना।

वहाँ पहुँचने पर तुमको लकड़ी का एक क्लोक मिलेगा जो लकड़ी के पतले तख्तों से बना हुआ होगा। तुम उसको पहन लेना।

उस क्लोक को पहन कर तुम उस किले में जाना और अपना नाम केटी वुडिनक्लोक बताना और उनसे अपने रहने के लिये जगह माँगना।

पर इससे पहले कि तुम वहाँ जाओ तुम अपना छोटा वाला चाकू लो और मेरा गला काट दो। फिर मेरी खाल निकाल कर लपेट कर पास की एक चट्टान के नीचे छिपा दो।

उस खाल के नीचे वह ताँबे और चाँदी की दोनों पत्तियाँ और सोने का सेब रख देना। और फिर उस चट्टान के सहारे एक डंडी खड़ी कर देना।

उसके बाद जब भी तुम कोई चीज़ चाहो तो उस चट्टान की दीवार पर वह डंडी मार देना। तुमको वह चीज़ मिल जायेगी। ”

पहले तो राजकुमारी ऐसा कुछ भी करने को तैयार नहीं हुई पर जब बैल ने उससे कहा कि उसने जो कुछ भी राजकुमारी के लिये किया उस सबको करने के लिये धन्यवाद देने का यही एक तरीका था तो राजकुमारी के पास यह करने के अलावा और कोई चारा न रहा।

उसने अपना छोटा वाला चाकू निकाला और उससे उस बैल का गला काट दिया। फिर उसने बैल की खाल निकाल कर लपेट कर पास में पड़ी एक चट्टान के नीचे रख दी।

खाल के नीचे उसने वे ताँबे और चाँदी की दोनों पत्तियाँ और सोने का सेब रख दिया। और उसके बाद में उसने उस चट्टान के सहारे एक डंडी खड़ी कर दी।

वहाँ से वह किले के नीचे सूअरों के रहने की जगह गयी जहाँ उसको वह लकड़ी के पतले तख्तों से बना हुआ क्लोक मिल गया। उसने उस क्लोक को पहना और ऊपर किले में आयी। यह सब करते हुए वह बैल को याद कर करके रोती और सुबकती रही।

फिर वह सीधी शाही रसोईघर में गयी और वहाँ जा कर उसने अपना नाम केटी वुडिनक्लोक बताया और रहने के लिये जगह माँगी।

रसोइया बोला कि हाँ उसको वहाँ रहने की जगह मिल सकती थी। रसोईघर के पीछे वाले छोटे कमरे में वह रह सकती थी और उसके बरतन धो सकती थी क्योंकि उसकी बरतन धोने वाली अभी अभी काम छोड़ कर चली गयी थी।

रसोइया बोला — “पर जैसे ही तुम यहाँ रहते रहते थक जाओगी तो तुम यहाँ से चली जाओगी। ”

राजकुमारी बोली — “नहीं, मैं ऐसा नहीं करूँगी। ”

और वह वहाँ रहने लगी। वह बहुत अच्छे से रहती और बरतन भी बहुत ही आसानी से साफ करती रहती।

रविवार के बाद वहाँ कुछ अजीब से मेहमान आये तो केटी ने रसोइये से पूछा कि क्या वह राजकुमार के नहाने का पानी ऊपर ले जा सकती थी।

यह सुन कर वहाँ खड़े सब लोग हँस पड़े और बोले — “पर तुम वहाँ क्या करोगी? तुम्हें क्या लगता है कि क्या राजकुमार तुम्हारी तरफ देखेगा भी? तुम तो बहुत ही डरावनी दिखायी देती हो। ”

पर उसने अपनी कोशिश नहीं छोड़ी और उनसे पा्रर्थना करती रही और बार बार राजकुमार के लिये नहाने का पानी ले जाने के लिये कहती रही। आखिर उसको वहाँ उसके नहाने का पानी ले जाने की इजाज़त मिल ही गयी।

जब वह ऊपर गयी तो उसके लकड़ी के क्लोक ने आवाज की तो राजकुमार अन्दर से निकल कर आया और उससे पूछा — “तुम कौन हो?”

राजकुमारी बोली — “मैं राजकुमार के लिये नहाने का पानी ले कर आ रही थी। ”

“तुम क्या समझती हो कि इस समय तुम्हारे लाये पानी से मैं कुछ करूँगा?” और यह कर उसने वह पानी राजकुमारी के ऊपर ही फेंक दिया।

वह वहाँ से चली आयी और फिर उसने रसोइये से चर्च जाने की इजाज़त माँगी। चर्च पास में ही था सो उसको वह इजाज़त भी मिल गयी।

पर सबसे पहले वह उस चट्टान के पास गयी और जैसा कि बैल ने उससे कहा था उसने डंडी से चट्टान को मारा। तुरन्त ही उसमें से एक आदमी निकला और उसने पूछा — “तुम्हारी क्या इच्छा है?”

राजकुमारी बोली कि उसने चर्च जाने की और पादरी का भाषण सुनने के लिये छुट्टी ले रखी है पर उसके पास चर्च जाने लायक कपड़े नहीं हैं।

उस आदमी ने एक गाउन निकाला जो ताँबे जैसा चमकदार था। उसने उसको वह दिया और उसके साथ ही उसको एक घोड़ा भी दिया जिस पर उस घोड़े का साज भी सजा था। वह साज भी ताँबे के रंग का था और खूब चमक रहा था।

उसने तुरन्त अपना वह गाउन पहना और घोड़े पर चढ़ कर चर्च चल दी। जब वह चर्च पहुँची तो वह बहुत ही प्यारी और शानदार लग रही थी।

सब लोग उसको देख कर सोच रहे थे कि यह कौन है। उन सबमें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने उस दिन पादरी का भाषण सुना होगा क्योंकि वे सब उसी को देखते रहे।

वहाँ राजकुमार भी आया था। वह तो उसके प्यार में बिल्कुल पागल सा ही हो गया था। उसकी तो उस लड़की के ऊपर से आँख ही नहीं हट रही थी।

जैसे ही राजकुमारी चर्च से बाहर निकली तो राजकुमार उसके पीछे भागा। राजकुमारी तो दरवाजे से बाहर चली गयी पर उसका एक दस्ताना दरवाजे में अटक गया। राजकुमार ने उसका वह दस्ताना वहाँ से निकाल लिया।

जब वह घोड़े पर चढ़ गयी तो राजकुमार फिर उसके पास गया और उससे पूछा कि वह कहाँ से आयी थी तो केटी बोली — “मैं बैथ से आयी हूँ। ”

और जब राजकुमार ने उसको देने के लिये उसका दस्ताना निकाला तो वह बोली —

रोशनी आगे और अँधेरा पीछे, बादल आओ हवा पर

ताकि यह राजकुमार कभी न देख सके जहाँ मेरा यह अच्छा घोड़ा मेरे साथ जाये

राजकुमार ने वैसा दस्ताना पहले कभी नहीं देखा था। वह उस शानदार लड़की को ढूँढने के लिये चारों तरफ घूमा जो बिना दस्ताने पहने ही वहाँ से घोड़े पर चढ़ कर चली गयी थी। उसने उसे बताया भी था कि वह बैथ से आयी थी पर वहाँ यह कोई नहीं बता सका कि बैथ कहाँ है।

अगले रविवार को किसी को राजकुमार के लिये उसका तौलिया ले कर जाना था। तो केटी ने फिर कहा — “क्या मैं राजकुमार का तौलिया ले कर जा सकती हूँ?”

दूसरे लोग बोले — “तुम्हारे जाने से क्या होगा। तुमको तो पता ही है कि पिछली बार तुम्हारे साथ क्या हुआ था। ”

फिर भी केटी ने अपनी कोशिश नहीं छोड़ी और उसको राजकुमार का तौलिया ले जाने की इजाज़त मिल गयी। बस वह तौलिया ले कर सीढ़ियों से ऊपर भाग गयी।

इस भागने से उसके लकड़ी के पतले तख्ते का बने क्लोक ने फिर से आवाज की तो राजकुमार फिर से अन्दर से निकल कर आया और जब उसने देखा कि वह तो केटी थी तो उसने उसके हाथ से उस तौलिये को ले कर फाड़ दिया और उसके मुँह पर फेंक दिया।

वह बोला — “तुम यहाँ से चली जाओ ओ बदसूरत ट्रौल। तुम क्या सोचती हो कि मैं वह तौलिया इस्तेमाल करूँगा जिसको तुम्हारी गन्दी उँगलियों ने छू लिया हो?” और उसके बाद वह चर्च चला गया।

जब राजकुमार चर्च चला गया तो केटी ने भी चर्च जाने की छुट्टी माँगी। पर सबने उससे पूछा कि वह चर्च में क्या करने जाना चाहती थी।

उसके पास तो चर्च में पहनने के लिये उस लकड़ी के क्लोक के अलावा और कुछ था ही नहीं। और वह क्लोक भी बहुत ही भद्दा और काला था।

पर केटी बोली कि चर्च का पादरी बहुत ही अच्छा भाषण देता है। और जो कुछ भी उसने पिछले हफ्ते कहा था उसने केटी का काफी भला किया था। इस बात पर उसको चर्च जाने की छुट्टी मिल गयी।

वह फिर से दौड़ी हुई उसी चट्टान के पास गयी और जा कर उसके पास रखी डंडी से उसे मारा। उस चट्टान में से फिर वही आदमी निकला और अबकी बार उसने उसको पिछले गाउन से भी कहीं ज़्यादा अच्छा गाउन दिया।

वह सारा गाउन चाँदी के काम से ढका हुआ था और चाँदी की तरह से ही चमक रहा था। साथ में एक बहुत बढ़िया घोड़ा भी दिया जिसके साज पर चाँदी का काम था। और उसको चाँदी का एक टुकड़ा भी दिया।

उस सबको पहन कर जब वह राजकुमारी चर्च पहुँची तो बहुत सारे लोग चर्च के आँगन में ही खड़े हुए थे। उसको आते देख कर सब फिर सोचने लगे कि यह लड़की कौन हो सकती है।

राजकुमार तो तुरन्त ही वहाँ आ गया कि जब वह उस घोड़े पर से उतरेगी तो वह उसका घोड़ा पकड़ेगा। पर वह तो उस पर से कूद गयी और बोली कि उसका घोड़ा पकड़ने की उसको कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उसका घोड़ा बहुत सधा हुआ था।

वह घोड़ा वहीं खड़ा रहा जहाँ वह उसको छोड़ कर गयी थी। जब वह वहाँ वापस आयी और जब उसने उसे बुलाया तो वह उसके पास आ गया।

सब लोग चर्च के अन्दर चले गये पर पिछली बार की तरह से शायद ही कोई आदमी होगा जिसने उस दिन भी उस पादरी का भाषण सुना होगा क्योंकि उस दिन भी वे सब उसी की तरफ देखते रहे।

और राजकुमार तो उससे पहले से भी ज़्यादा प्यार करने लगा था।

जब पादरी का भाषण खत्म हो गया तो वह चर्च से बाहर चली गयी। वह अपने घोड़े पर बैठने ही वाली थी कि राजकुमार फिर वहाँ आया और उससे पूछा कि वह कहाँ से आयी है।

इस बार उसने जवाब दिया — “मैं टौविललैंड से आयी हूँ। ” यह कह कर उसने अपना कोड़ा गिरा दिया। यह देख कर राजकुमार उसको उठाने के लिये झुका तो इस बीच राजकुमारी ने कहा —

रोशनी आगे और अँधेरा पीछे, बादल आओ हवा पर

ताकि यह राजकुमार कभी न देख सके जहाँ मेरा यह अच्छा घोड़ा मेरे साथ जाये

और वह वहाँ से भाग गयी। राजकुमार यह भी न बता सका कि उसका हुआ क्या। वह फिर से यह जानने के लिये चारों तरफ घूमा फिरा कि टौविललैंड कहाँ है पर कोई उसको यह नहीं बता सका कि वह जगह कहाँ है। इसलिये अब राजकुमार को केवल उसी से काम चलाना था जो उसके पास था।

अगले रविवार को किसी को राजकुमार को कंघा देने के लिये जाना था। केटी ने फिर कहा कि क्या वह राजकुमार को कंघा देने जा सकती है। पर दूसरे लोगों ने फिर से उसका मजाक बनाया और कहा कि उसको पिछले दो रविवारों की घटनाएँ तो याद होंगी ही।

और साथ में उसको डाँटा कि वह किस तरह अपने उस भद्दे काले लकड़ी के क्लोक में राजकुमार के सामने जाने की हिम्मत करती है। पर वह फिर उन लोगों के पीछे पड़ी रही जब तक कि उन लोगों ने उसको हाँ नहीं कर दी।

वह फिर से कंघा ले कर ऊपर दौड़ी गयी। उसके लकड़ी के क्लोक की आवाज सुन कर राजकुमार फिर बाहर निकल कर आया और केटी को फिर से वहाँ देख कर उसने उससे कंघा छीन कर उसके मुँह पर मारा और बिना कुछ कहे सुने वहाँ से चर्च चला गया।

जब राजकुमार चर्च चला गया तो केटी ने भी चर्च जाने की इजाज़त माँगी। उन लोगों ने उससे फिर पूछा कि वहाँ उसका काम ही क्या था – उसमें से बदबू आती थी, वह काली थी, उसके पास वहाँ पहनने के लिये ठीक से कपड़े भी नहीं थे। हो सकता है कि राजकुमार या कोई और उसको वहाँ देख ले तो उसकी वहाँ बदनामी होगी।

पर केटी बोली कि लोगों के पास उसकी तरफ देखने की फुरसत ही कहाँ थी उनके पास तो और बहुत सारे काम थे। और वह उनसे चर्च जाने की इजाज़त माँगती ही रही। आखिर उन्होंने उसको वहाँ जाने की इजाज़त फिर से दे दी।

इस बार भी वही हुआ जो दो बार पहले हो चुका था। वह फिर से दौड़ी हुई उसी चट्टान के पास गयी और जा कर उसके पास रखी डंडी से उसे मारा। उस चट्टान में से फिर वही आदमी निकला और अबकी बार उसने उसको पिछले दोनों गाउन से भी ज़्यादा अच्छा गाउन दिया।

इस बार वह सारा गाउन सुनहरी था और उसमें हीरे जड़े हुए थे। साथ में एक बहुत बढ़िया घोड़ा भी दिया जिसके साज पर सोने का काम था। उसने उसको एक सोने का टुकड़ा भी दिया।

जब राजकुमारी चर्च पहुँची तो वहाँ के आँगन में पादरी और चर्च में आये सारे लोग उसके इन्तजार में खड़े थे।

राजकुमार वहाँ भागता हुआ आया और उसने उसका घोड़ा पकड़ना चाहा पर राजकुमारी पहले की तरह ही उस पर से कूद कर उतर गयी और बोली — “मेरे घोड़े को पकड़ने की जरूरत नहीं है। वह बहुत सधा हुआ है जहाँ मैं इसको खड़े होने को कहती हूँ यह वहीं खड़ा रहता है। ”

फिर सब चर्च के अन्दर चले गये। पादरी भी अपनी जगह चला गया। उस दिन भी किसी ने उसके भाषण का एक शब्द भी नहीं सुना क्योंकि पहले की तरह से सभी लोग केवल उसी लड़की को देखते रहे और सोचते रहे कि वह कहाँ से आती है और कहाँ चली जाती है।

और राजकुमार तो उसको पहले से भी ज़्यादा प्यार करने लगा। उसकी तो कोई इन्द्रिय काम ही नहीं कर रही थी वह तो बस उसको घूरे ही जा रहा था।

जब पादरी का भाषण खत्म हुआ तो राजकुमारी चर्च से बाहर निकली। अबकी बार राजकुमार ने चर्च के बाहर कुछ चिपकने वाली चीज़ डाल दी ताकि वह उसको वहाँ से जाने से रोक सके।

पर राजकुमारी ने उसकी कोई चिन्ता नहीं की और उसने अपना पैर उस चिपकने वाली चीज़ के ठीक बीच में रख दिया और उसके उस पार कूद गयी। पर इस कूदने में उसका एक सुनहरी जूता उस जगह पर चिपक गया।

जैसे ही वह अपने घोड़े पर चढ़ी राजकुमार चर्च में से बाहर आ कर उसके पास आया और उससे पूछा कि वह कहाँ से आयी है। इस बार वह बोली मैं कौम्बलैंड से आयी हूँ।

इस पर राजकुमार उसको उसका सुनहरा जूता देना चाहता था कि राजकुमारी बोली —

रोशनी आगे और अँधेरा पीछे, बादल आओ हवा पर

ताकि यह राजकुमार कभी न देख सके जहाँ मेरा यह अच्छा घोड़ा मेरे साथ जाये

और वह तो राजकुमार की आँखों के सामने सामने गायब हो गयी और राजकुमार उसे ढूँढता रहा पर कोई उसको कोई यह न बता सका कि कौम्बलैंड कहाँ है।

फिर उसने दूसरी तरकीब इस्तेमाल की। उसके पास उसका एक सुनहरी जूता रह गया था सो उसने सब जगह यह घोषणा करवा दी कि वह उसी लड़की से शादी करेगा जिसके पैर में यह सुनहरी जूता आ जायेगा।

बहुत सारी लड़कियाँ बहुत सारी जगहों से उस जूते को पहनने के लिये वहाँ आयीं पर किसी का पैर इतना छोटा नहीं था जिसके पैर में वह जूता आ जाता।

काफी दिनों बाद सोचो ज़रा कौन आया? केटी की सौतेली बहिन और सौतेली माँ। आश्चर्य उस लड़की के पैर में वह जूता आ गया। पर वह तो बहुत ही बदसूरत थी।

पर राजकुमार ने अपनी इच्छा के खिलाफ अपनी जबान रखी। उसने शादी की दावत रखी और वह सौतेली बहिन दुलहिन की तरह सज कर चर्च चली तो चर्च के पास वाले एक पेड़ पर बैठी एक चिड़िया ने गाया —

उसकी एड़ी एक टुकड़ा और उसकी उँगलियों का एक टुकड़ा

केटी वुडिनक्लोक का छोटा जूता खून से भरा है, मैं बस इतना जानती हूँ

यह सुन कर उस लड़की का जूता देखा गया तो उनको पता चला कि वह चिड़िया तो सच ही बोल ही रही थी। जूता निकालते ही उसमें से खून की धार निकल पड़ी।

फिर महल में जितनी भी नौकरानियाँ और लड़कियाँ थीं सभी वहाँ जूता पहन कर देखने के लिये आयीं पर वह जूता किसी के पैर में भी नहीं आया।

जब उस जूते को सबने पहन कर देख लिया तो राजकुमार ने पूछा — “पर वह केटी वुडिनक्लोक कहाँ है?” क्योंकि राजकुमार ने चिड़िया के गाने को ठीक से समझ लिया था कि वह क्या गा रही थी।

वहाँ खड़े लोगों ने कहा — “अरे वह? उसका यहाँ आना ठीक नहीं है। ”

“क्यों?”

“उसकी टाँगें तो घोड़े की टाँगों के जैसी हैं। ”

राजकुमार बोला — “आप लोग सच कहते हैं। मुझे मालूम है पर जब सबने यहाँ इस जूते को पहन कर देखा है तो उसको भी इसे पहन कर देखना चाहिये। ”

उसने दरवाजे के बाहर झाँक कर आवाज लगायी — “केटी। ” और केटी धम धम करती हुई ऊपर आयी। उसका लकड़ी का क्लोक ऐसे शोर मचा रहा था जैसे किसी फौज के घुड़सवार चले आ रहे हों।

वहाँ खड़ी दूसरी नौकरानियों ने उससे हँस कर उसका मजाक बनाते हुए कहा — “जाओ जाओ। तुम भी वह जूता पहन कर देखो और तुम भी राजकुमारी बन जाओ। ”

केटी वहाँ गयी और उसने वह जूता ऐसे पहन लिया जैसे कोई खास बात ही न हो और अपना लकड़ी का क्लोक उतार कर फेंक दिया।

लकड़ी का क्लोक उतारते ही वह वहाँ अपने सुनहरे गाउन में खड़ी थी। उसमें से सुनहरी रोशनी ऐसे निकल रही थी जैसे सूरज की किरनें फूट रही हों। और लो, उसके दूसरे पैर में भी वैसा ही सुनहरा जूता आ गया।

अब राजकुमार उसको पहचान गया कि यह तो वही चर्च वाली लड़की थी। वह तो इतना खुश हुआ कि वह उसकी तरफ दौड़ गया और उसके गले में बाँहें डाल दीं।

तब राजकुमारी ने उसको बताया कि वह भी एक राजा की बेटी थी। दोनों की शादी हो गयी और फिर एक बहुत बड़ी शादी की दावत का इन्तजाम हुआ।

Categories
Bed time Stories Germany ki Lok Kathayen Lok Kathayen Story

Germany ki Lok Kathayen-1/ जर्मनी की लोक कथाएँ-1

ग्रिम ब्रदर्स कहानी-स्नो व्हाइट और सात बौने: जर्मनी की लोक-कथा

ishhoo story

सुदूर प्रदेश में एक राजा और रानी राज्य करते थे। रानी बहुत ही दयालु और प्यारी थी और राज्य के सभी लोग उसका आदर करते थे । लेकिन रानी के जीवन में केवल एक दुविधा थी कि उसको संतान की इच्छा थी लेकिन उसके कोई संतान नहीं थी। एक बार रानी सर्दियों के समय खिड़की के पास बैठकर स्वेटर बुन रही थी और उसी समय एक स्नो व्हाइट चिड़िया खिड़की के पास आकर बैठ गई जिससे रानी का ध्यान भटक गया और उसकी उंगली में सुई चुभ गई।

तभी रानी ने एक इच्छा मांगी कि उसको एक बहुत ही खूबसूरत बेटी हो और उसका चेहरा स्नो जैसा हो । वह बहुत सुंदर और परी की तरह खूबसूरत हो।

काफी समय गुजर जाने के बाद रानी को एक बेटी पैदा हुई वह बहुत खूबसूरत थी जैसा उसने इच्छा मांगी थी । वह बहुत सुंदर थी । रानी ने उसका नाम स्नो व्हाइट रखा। राज्य के सभी लोग बहुत खुश थे।

स्नो व्हाइट की एक सौतेली मां थी। उसकी सौतेली मां स्नो व्हाइट को पसंद नहीं करती थी और उसे अपनी खूबसूरती पर भी घमंड था।

स्नो व्हाइट की सौतेली मां के पास एक जादुई आईना था । जादुई आईने से वह रोज पूछती थी कि इस दुनिया में सबसे ज्यादा खूबसूरत कौन है । इस पर आईना जवाब देता -आपके अलावा भला कौन हो सकता है । इससे रानी बहुत खुश हो जाती। दूसरी तरफ रानी राज्य के निर्णय भी लेने लगी थी जिससे राज्य को बहुत नुकसान होने लगा। राज्य के नुकसान की भरपाई के लिए राजा को राज्य से बाहर जाना पड़ा और वह राजा के बाहर जाने पर अपनी मनमानी करने लगी।

समय बहुत तेजी से बीत रहा था और अब स्नो व्हाइट एक खूबसूरत युवती हो गई थी। जब एक बार स्नो व्हाइट बाग में बने तालाब के किनारे पानी पी रही थी तभी एक राजकुमार को स्नो व्हाइट की छाया दिखाई दी । वह राजकुमार देखता ही रह गया लेकिन उसे पक्षियों के सिवा उधर कुछ नहीं दिखा।

उधर रोज की तरह रानी आज भी आईने के पास पहुंची और उसने आईने से पूछा कि सबसे खूबसूरत कौन है । थोड़ी देर तो आईना हिचकिचाया लेकिन उसने कहा कि स्नो व्हाइट। अब रानी बहुत परेशान हो गई।

स्नो व्हाइट की सौतेली मां ने उसे अपने पास बुलाया और उससे कहा कि मुझे लगता है कि तुम महल में पड़ी-पड़ी बोर हो रही हो इसलिए तुम्हें जंगल की सैर पर जाना चाहिए इससे तुम्हारा मन बहल जाएगा । और मैं तुम्हारे साथ अपने सबसे जांबाज सुरक्षाकर्मी को भेज रही हूं। रानी ने अपने सुरक्षाकर्मी को जंगल में भेजा और उससे बोला कि स्नो व्हाइट को मारकर सबूत के तौर पर उसका दिल लेकर आना।

रानी का सुरक्षाकर्मी जब स्नो व्हाइट को मारने लगा तो उसे दया आ गई और उसने स्नो व्हाइट को वहां से जाने के लिए बोला । तब स्नो व्हाइट ने उसे कहा कि वह अपना फर्ज पूरा करे। लेकिन सुरक्षाकर्मी ने उसे वहां से जाने दिया। और सबूत के तौर पर वह किसी जानवर का दिल निकाल कर ले गया । उसने वह दिल रानी के सामने पेश किया जिससे रानी बहुत खुश हो गई।

दूसरी तरफ स्नो व्हाइट जंगल मैं इधर उधर भटक रही थी । उसे बहुत डर लग रहा था उसे लगा जैसे कोई पीछे बात कर रहा है जिससे वह डर गई और वहां तेजी से आगे बढ़ने लगी। थोड़ा दूर चलने पर तितलियां उसके चारों ओर मंडराने लगी। तितलियां स्नो व्हाइट का स्कार्फ खींचने लगी और स्नो व्हाइट को लगा जैसे वह तितलियां कहीं जाने के लिए इशारा कर रही हैं। स्नो व्हाइट उन तितलियों के साथ साथ चलने लगी ।

वहां स्नो व्हाइट को एक घर दिखाई दिया । वह उस घर में चली गई । वहां उसने देखा कि एक मेज बिछी हुई है और उस पर 7 प्लेट लगी हुई हैं । और उन में स्वादिष्ट खाना लगा हुआ है ।और वहीं बगल वाले कमरे में सात बिस्तर लगे हुए हैं। स्नो व्हाइट ने जी भर के उन प्लेटो में से खाना खाया । स्नो व्हाइट बहुत थक गई थी इसलिए वह एक बिस्तर पर वहीं सो गई।

वह घर 7 बौनों का था। वो बौने सोने की खुदाई करते थे । जब शाम को बौने घर लौटे तो बौनों ने देखा कि मेज पर प्लेटो में से किसी ने खाना खाया है । जब सातवें बौने ने अपने बिस्तर की तरफ गौर से देखा तो वहां पर एक लड़की एक बिस्तर पर सोए हुई थी। सभी बौने उसके बिस्तर की तरफ बड़े । तब उन्होंने देखा कि वहां एक सुंदर लड़की सोए हुए हैं । बौनों ने उस लड़की को नहीं जगाया और वह वहीं उस लड़की को घेरते हुए सो गए। जब सुबह स्नो व्हाइट नींद से जगी तो बौनों को देखकर वह डर गई।

बौने बोले- हे लड़की तुम्हें हम से डरने की जरूरत नहीं है। बौने स्नो व्हाइट के बारे में पूछा तब स्नो व्हाइट ने अपनी पूरी व्यथा कह सुनाई। बौने बोले कि तुम यहां रह सकती हो तुम्हें हमारे लिए खाना बनाना होगा, घर की साफ सफाई करनी होगी और हमारे बिस्तर लगाने होंगे। स्नो व्हाइट मान गई।

बौने जब भी शाम को घर वापस आते तो घर को देखकर और अपने लिए खाना बना देखकर खुश हो जाते ।

दूसरी तरफ स्नो व्हाइट की सौतेली माँ ने जब आईने से पूछा कि सबसे सुंदर कौन है तब आईने ने जवाब दिया रानी माफ करें सबसे सुंदर तुम हो लेकिन तुम से भी सुंदर सात बोनो के साथ पहाड़ों पर रहने वाली स्नो व्हाइट है। तब रानी को महसूस हुआ कि स्नो व्हाइट अभी जिंदा है उसने अब स्नो व्हाइट को जान से मारने का प्लान बनाया ।

उसने जादू से बूढ़ी औरत का रूप धारण कर लिया और ताजे सेव में विष डालकर वह पहाड़ों पर स्थित स्नो व्हाइट के पास पहुंची। बौने उस समय सोने की खोज में जा चुके थे।

स्नो व्हाइट घर पर अकेली थी। जब रानी बूढ़ी औरत के वेश में वहां पहुंची और उसने सेब लेने के लिए उस स्नो व्हाइट को बोला । तब स्नो व्हाइट बोली कि मां जी माफ करें मैं दरवाजा नहीं खोल सकती। तब बूढ़ी औरत बोली कि तुम दरवाजा मत खोलो। तुम मुझे एक रोटी का टुकड़ा दे दो । स्नो व्हाइट ने ऐसा ही किया और सेव ले लिए । जैसे ही उसने सेव खाए वह गिर गई और मर गई ।

जब बौने घर पर लेटे तब उन्होंने वहां स्नो् व्हाइट को जमीन पर गिरे देखा। उन्होंने स्नो व्हाइट को उठाया और उसे जगाने की कोशिश की। लेकिन स्नो व्हाइट अब मर चुकी थी तब बौने ने उसके मरने का मातम मनाया और उसे दफनाने के लिए ले जाने लगे। लेकिन तब उन्होंने महसूस किया कि स्नो व्हाइट का चेहरा अभी भी उतना फ्रेश है उसके गाल अभी भी लाल हैं ।वह मरी हुई नहीं लग रही थी। तब उन्होंने सोचा के स्नो व्हाइट को एक शीशे के बॉक्स में बंद किया जाए जिससे उसका शरीर मरने के बाद भी बेदाग बना रहे। उन्होंने ऐसा ही किया और स्नो् व्हाइट को एक शीशे के बॉक्स में बंद कर दिया।

तभी किसी राज्य का राजकुमार शिकार करते हुए वहां पहुंचा तब उन्होंने देखा कि कुछ बौने एक लड़की को घेरे हुए मातम मना रहे हैं। वह राजकुमार स्नो व्हाइट को देखते ही रह गया और उन बौने से स्नो व्हाइट को अपने साथ ले जाने की इच्छा जाहिर की। लेकिन बौने बोले कि यह तो मर चुकी है तुम इसका क्या करोगे । तब राजकुमार बोला कि मैं इसे अपने राज्य में ले जाकर इसके लिए एक सुंदर सा स्मारक बनाऊंगा। क्योंकि मैं इससे प्रेम करने लगा हूं ।यह बहुत सुंदर है ।

जब राजकुमार के सैनिक उसे डोली में उठा कर ले जा रहे थे तभी एक सैनिक को ठोकर लगी और वह गिरने ही वाला था, जिससे स्नो व्हाइट को झटका लगा और उसके मुंह में फंसा हुआ जहरीले सेब का टुकड़ा निकल गया। जिससे स्नो व्हाइट की जान वापस आ गई। स्नो व्हाइट अब जिंदा थी। राजकुमार ने स्नो व्हाइट से शादी करने की इच्छा जाहिर की। लेकिन स्नो व्हाइट बोली कि वह अपने पिता जी का आशीर्वाद पाना चाहती है।

राजकुमार को पता लगा कि रानी जादूगर है और बहुत क्रूर है । तब राजकुमार ने रानी के किले पर हमला करके उसे परास्त कर दिया और रानी राज्य छोड़ कर भाग गई। तब राजकुमार ने स्नो व्हाइट के पिता को गिरफ्त में से बाहर निकाला। राजकुमार और स्नो व्हाइट ने अपने पिताजी का आशीर्वाद लिया और शादी कर ली।

(ग्रिम ब्रदरज़)

Categories
Bed time Stories Germany ki Lok Kathayen Lok Kathayen Story

Germany ki Lok Kathayen-3/ जर्मनी की लोक कथाएँ-3

ग्रिम ब्रदर्स की कहानी- सुनहरा हंस: जर्मनी की लोक-कथा

एक आदमी के तीन बेटे थे। सबसे छोटे को वे डमलिंग पुकारते थे। पूरा परिवार हर वक्ती उससे चिढ़ता था और उसके साथ दुर्व्यवहार करता था। एक दिन बड़े बेटे के दिमाग में आया कि वह जंगल जाकर ईंधन के लिए लकड़ी काट लाये। उसकी माँ ने उसके लिए बढ़िया ख़ाना और शराब की एक बोतल साथ में दी जिससे वह काम के बीच ताजा हो सके। जब वह जंगल पहुँचा तो एक बूढ़े आदमी ने उसे सुप्रभात कहा, फिर बोला, “मुझे बहुत भूख और प्यास लगी है, क्या तुम अपने खाने में से थोड़ा-सा मुझे दोगे?” उस होशियार युवक ने कहा, “तुम्हें अपना खाना और शराब दूँ? जी नहीं, यह मेरे लिए भी पूरा नहीं होगा ।” और चला गया। उसने पेड़ काटना शुरू किया पर अभी ज्यादा देर काम किया भी नहीं था कि उसका वार चूक गया और उसने खुद को घायल कर लिया। उसे घर लौटना पड़ा ताकि घाव की मरहम-पट्टी करवा सके। ये गड़बड़ी उस बूढ़े आदमी की शैतानी से हुई थी।

अगली बार दूसरा बेटा- काम के लिए निकला, माँ ने उसके साथ भी खाना पानी दिया; उसे भी वह बूढ़ा मिला । फिर उसने खाने-पीने को माँगा । यह लड़का भी अपने को समझदार मानता था, इसलिए बोला, “जो तुम्हें दूँगा वह कम नहीं हो जाएगा? तुम अपने रास्ते जाओ।” छोटे आदमी ने यह ध्यान रखा कि उसे उसका इनाम मिले। लड़के ने अगला वार जो पेड़ पर किया वह उसकी टाँग पर लगा, उसे भी घर लौटना पड़ा।

अब डमलिंग ने पिता से कहा, “पिताजी, मैं भी लकड़ी काटने जाना चाहता हूँ।” उन्होंने जवाब दिया “तुम्हारे भाई तो लँगड़े होकर आ गए, बेहतर होगा कि तुम घर पर रहो क्योंकि तुम इस बारे में कुछ भी नहीं जानते ।” पर वह जिद करता रहा तो पिता ने कहा, “जाओ, चोट खाओगे तो अक्ल आ जाएगी ।” उसकी माँ ने उसे सूखी डबलरोटी और एक खट्टी बीयर दी। तब वह जंगल में गया तो उसे भी बूढ़ा आदमी मिला जिसने इससे खाना-पानी माँगा। डमलिंग बोला, “मेरे पास तो सिर्फ सूखी डबलरोटी और खट्टी बीयर है। अगर यह तुम्हें ठीक लगे तो हम मिलकर खा लेंगे। वे बैठे, जब लड़के ने खाना निकाला तो सूखी डबलरोटी की जगह बढ़िया खाना और खट्टी बीयर की जगह बढ़िया शराब थी। उन्होंने पेट-भर कर खाया। जब ये निकट गए तो बूढ़े ने कहा, “तुम बड़े दयालु हो। तुमने मेरे साथ सब कुछ बाँटा, मैं तुम्हें वरदान देता हूँ। वहाँ एक पुराना पेड़ है। उसे काटो, उसकी जड़ में तुम्हें कुछ मिलेगा ।” फिर उसने लड़के से विदा ली और चला गया।

डमलिंग काम में लग गया। उसने पेड़ काटा, जब पेड़ गिरा तो जड़ के नीचे की खोखली जगह में शुद्ध सोने के पंखों वाला एक हंस मिला। लड़के ने उसे उठा लिया। वह रात बिताने के लिए एक सराय में ठहर गया। सराय के मालिक की तीन बेटियाँ थीं। उन्होंने जब हंस को देखा तो उसे अच्छी तरह देखने जाने को बेचैन हो उठीं। वे उसका एक पंख उखाड़ना चाहती थीं। सबसे बड़ी बोली, “मैं उखाड़ती हूँ।” वह उसके घूमने का इन्तजार करती रही, फिर हंस को उसके पंखों से पकड़ लिया, पर जब हाथ हटाने की कोशिश करने लगी तो ताज्जुब में पड़ गई क्योंकि वह तो जैसे पंखों से चिपक ही गई। तभी दूसरी बहिन आई, वह भी एक पंख लेना चाहती थी, पर जैसे ही उसने अपनी बहिन को छुआ वह उससे चिपक गई। तीसरी आई वह भी पंख लेना चाहती थी, पर दोनों बहनें चिल्लाई, “दूर रहो, भगवान के लिए दूर रहो।” उसकी समझ में ही नहीं आया कि वे दोनों क्या कहना चाह रही हैं। उसने सोचा, “अगर ये दोनों यहाँ हैं तो मैं भी यहीं जाती हूँ और वह उधर ही चली गई, पर बहिनों को छूने की देर थी कि वह भी हंस के साथ वैसे ही चिपक गई जैसे उसकी बहिनें चिपकी थीं। वे सारी रात हंस के साथ रहीं।

अगली सुबह डमलिंग ने हंस को बगल में दबाया और चल दिया। वे तीनों बहिनें हंस के साथ चिपकी थीं पर उसने ध्यान ही नहीं दिया, वह जहाँ जाता, जितनी तेज जाता, उन्हें भी जाना पड़ता था चाहे वे चाहें या नहीं क्योंकि वे चिपकी थीं।

जाते-जाते उन्हें खेत के बीच एक पादरी मिला। उसने जब यह कतार जाती देखी तो लड़कियों से बोला, “तुम्हें मैदान के बीच से एक युवक के पीछे इस तरह भागते हुए शरम नहीं आती? क्या यह ठीक है?” और उसने सबसे छोटी लड़की का हाथ पकड़ा ताकि उसे खींचकर रोक ले, पर वह तो खुद भी चिपक गया। अब कतार में लड़कियों के बाद पादरी भी जुड़ गया। उधर से पादरी का मुंशी निकल रहा था। उसने जब अपने मालिक को तीन लड़कियों के पीछे भागते देखा तो वह ताज्जुब में पड़ गया और चिल्लाकर पूछने लगा, “मालिक, इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हैं? आज तो किसी के घर नामकरण करने जाना है।” जवाब न मिलने पर उसने दौड़कर पादरी का चोगा पकड़ लिया जिससे उसे रोक ले, पर वह भी चिपक गया। अब ये पाँचों एक-दूसरे से चिपके हुए भागे जा रहे थे। तभी इन्हें काम से लौटते हुए दो मजदूर दिखे जो फावड़े लिये हुए थे। पादरी चिल्लाया, “मुझे छुड़ा दो ।” पर छूने की देर थी कि वे दोनों भी चिपक गए। अब ये सातों डमलिंग और उसके हंस के पीछे दौड़ रहे थे।

आखिर वे एक ऐसे शहर में पहुँचे जहाँ के राजा की केवल एक बेटी थी और वह भी बिल्कुल उदास हो गई थी। कोई उसे हँसा नहीं पा रहा था। यहाँ तक कि राजा ने सब तरफ यह एलान करवा दिया कि जो उसे हँसा पाएगा, उससे उसकी शादी कर दी जाएगी। यह बात सुनकर वह युवक अपने हंस और उसकी कतार के साथ उसके सामने गया। जैसे ही राजकुमारी ने सातों को एक दूसरे से चिपके हुए और एक-दूसरे के पीछे भागते हुए देखा तो वह ऊँची आवाज में हँस पड़ी और देर तक हँसती रही। राजा के वचन के अनुसार डमलिंग और राजकुमारी की शादी हो गई, वह राजा का वारिस बना और बहुत साल तक अपनी पत्नी के साथ खुशी की जिन्दगी जीया।

(ग्रिम ब्रदरज़)

Categories
Bed time Stories Germany ki Lok Kathayen Lok Kathayen Story

Germany ki Lok Kathayen-4/ जर्मनी की लोक कथाएँ-4

ग्रिम ब्रदर्स की कहानी-बौने और मोची: जर्मनी की लोक कथा

ishhoo story

एक शहर में एक मोची अपने परिवार के साथ रहता था। उसके घर के पास ही उसकी एक छोटी सी दुकान थी, जहाँ वह जूते बनाने और बेचने का काम किया करता था। जूते बेचकर उसे जो पैसे मिलते, उससे उसका और उसके परिवार का गुजारा चलता था।

वह अपने काम में निपुण था और मेहनती भी। इसके बावजूद भी एक समय ऐसा आया कि जब उसके बनाये जूते बिकने कम हो गए। जो बिकते, वे भी बहुत कम दाम पर।

उचित दाम न मिल पाने के कारण उसका धंधा मंदा चलने लगा। उसकी दुकान पर आने वाले ग्राहकों की संख्या कम हो गई। नतीजतन उसकी जमा-पूंजी समाप्त होने लगी। स्थिति ये आ गई कि घर चलाने के लिए उसे पत्नी के गहनें गिरवी रखने पड़े, घर का सामान बेचना पड़ा।

यह बुरा दौर उसकी चिंता का कारण बन गया। वह हर समय चिंता में डूबा रहता। उसे चिंतित देख उसकी पत्नी हमेशा ढाढस बंधाती, “देखिये, ऊपर वाला सब देख रहा है। उस पर भरोसा रखिये। यकीन मानिये सब ठीक हो जायेगा।” पत्नी की बात पर वह मुस्कुरा देता। लेकिन अंदर ही अंदर चिंता में घुलता रहता।

उसकी दुकान में जूते बनाने का सामान भी ख़त्म हो चला था। तैयार जूतों में बस एक जोड़ी जूते बचे थे, जिसे ख़रीदने दुकान पर कोई ग्राहक नहीं आ रहा था। एक दिन वह अपने बनाये आखिरी जूते बेचने बाजार चला गया। जूते बिक गए। जो पैसे मिले, उससे उसने घर की ज़रूरत का कुछ सामान ख़रीदा और घर वापस आने लगा। रास्ते में उसे एक गरीब बूढ़ी औरत दिखाई दी। उसने कुछ पैसे देकर उसकी मदद की और घर चला आया।

शाम को जब वह अपनी दुकान में गया, तो देखा कि वहाँ चमड़े का बस एक छोटा टुकड़ा बचा हुआ है। उस टुकड़े से सिर्फ़ एक जूता बन सकता था। उसने जूते बनाने के लिए चमड़ा तो काट लिया, लेकिन रात हो जाने के कारण जूते नहीं बना पाया। अगले दिन जूते बनाने का सोच वह घर आकर सो गया।

अगली सुबह वह जब अपनी दुकान पर गया, तो चकित रह गया। जहाँ वह चमड़ा काटकर रख गया था, वहाँ बहुत ही सुंदर जूते रखे हुए थे। इतने सुंदर जूते उसने कभी देखे ही नहीं थे। उन्हें बेचने जब वह बाज़ार गया, तो उसे उसके बहुत अच्छे दाम मिले।

वापसी में घर के लिए कुछ सामान के साथ ही उसने जूते बनाने का सामान भी खरीदा। कुछ पैसे उसने ज़रूरतमंदों को दान में भी दिए।

उस रात उसने दो जूते बनाने के लिए चमड़ा काटकर रखा। अगली सुबह दुकान में उसे दो जोड़ी सुंदर जूते मिले। वह हैरान था। जब उसने यह बात अपनी पत्नी को बताई, तो पत्नी बोली, “देखा मैंने कहा था न कि ऊपरवाला सब देख रहा है। उसका ही आशीर्वाद है कि कोई नेकदिल इंसान हमारी मदद कर रहा है।”

मोची के चमड़े काटकर छोड़ने और फिर अगले दिन बने-बनाए जूते मिलने का सिलसिला जारी रहा। एक से दो, दो से तीन और फिर रोज़ उसे कई जोड़ी जूते मिलने लगे। वे जूते ग्राहकों को बहुत पसंद आने लगे। बाज़ार में उसका नाम हो गया और उसकी दुकान में ग्राहकों की भीड़ लगने लगी। अच्छे दाम में जूते बिकने से मोची ने अच्छा-ख़ासा पैसा कमा लिया। उसकी आर्थिक स्थिति सुधर गई।

वह और उसकी पत्नी सदा मन ही मन उन नेकदिल लोगों का धन्यवाद करते थे, जो रोज़ रात उनकी दुकान पर आकर जूते बना जाते थे। एक दिन मोची की पत्नी बोली, “इतने समय से कोई हमारी इतनी मदद कर रहा है और हमें उनके बारे में कुछ भी पता नहीं। क्यों ना आज रात जागकर हम दुकान की रखवाली करें और देंखे कि कौन रोज़ हमारी मदद के लिए आता है?”

मोची को पत्नी की बात जंच गई। उस रात दोनों सोये नहीं, बल्कि दुकान में जाकर छुप गए। कुछ घंटे इंतज़ार करने के बाद उन्होंने देखा कि खिड़की के रास्ते तीन बौने दुकान के भीतर आये और गीत गुनगुनाते हुए कटे हुए चमड़ों से जूते बनाने लगे। मोची और उसकी पत्नी उन्हें छुपकर देखते रहे। रात भर मेहनत कर जूते बनाने के बाद तीनों बौने खिड़की के रास्ते ही वापस चले गए।

उनके जाने के बाद मोची और उसकी पत्नी आपस में बात करने लगे। मोची की पत्नी बोली, “उन तीन बौनों ने हमारी बहुत मदद की है। हमें उन्हें उपहार देकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।”

“तुम ही बताओ, हमें उन्हें उपहार में क्या देना चाहिए? मोची ने पूछा।

“तुमने ध्यान दिया, उनके कपड़े और जूते पुराने हो चुके थे। मैं उनके लिए नए कपड़े सिल देती हूँ और तुम उनके लिए नए जूते बना देना।”

मोची मान गया। बाज़ार से सामान लाकर वे बौनों के लिए कपड़े और जूते बनाने लगे। कुछ दिनों में कपड़े और जूते तैयार हो गये। कपड़े बहुत ही सुंदर बने थे और जूते शानदार थे। उस रात चमड़े के स्थान पर उन्होंने बौनों के लिए तैयार किये कपड़े और जूते रख दिए।

रात जब तीनों बौने दुकान के भीतर आये, तो चमड़े के स्थान पर अपने नाप के कपड़े और जूते देखकर बड़े ख़ुश हुए। कपड़े और जूते पहनकर वे नाचने-गाने लगे। उन्हें नाचता-गाता देख मोची और उसकी पत्नी बहुत ख़ुश हुए। वे समझ गए कि बौनों को उनका उपहार पसंद आ गया है।

उस रात के बाद कुछ रोज़ तक मोची ने देखा कि उसके काटे गए चमड़े दुकान में जस-के-तस पड़े हुए हैं। बौनों ने वहाँ आना बंद कर दिया था। मोची समझ गया कि बौने अब कभी नहीं आयेंगे।

बौनों को मोची की जितनी मदद करनी थी, वे कर चुके थे। अब मोची ने अपनी मेहनत से जूते बनाने का निश्चय किया। इतने दिनों में उसे ग्राहकों की पसंद-नापसंद का अंदाज़ा लग चुका था और हुनर की उसमें कोई कमी नहीं थी। मेहनत से वह जूते बनाने की अपनी कला को और निखारने लगा। अब उसके बनाये जूते भी बौनों द्वारा बनाये गए जूतों जैसे सुंदर थे। ग्राहकों को उसके बनाये जूते भी पसंद आने लगे। वे उसकी दुकान में आते रहे और उसकी दुकान ‘सबसे सुंदर जूतों वाली दुकान’ के रूप में शहर भर में मशहूर हो गई।

Categories
Bed time Stories Germany ki Lok Kathayen Lok Kathayen Story

Germany ki Lok Kathayen-5/ जर्मनी की लोक कथाएँ-5

कहानी-सिंड्रेला: जर्मनी की लोक कथा

एक छोटे से शहर में एक अमीर आदमी रहता था। उसकी पत्नी प्रायः बीमार रहती थी। एक बार वह बहुत बीमार पड़ी तो उसे लगा कि वह अब नहीं बचेगी। उसने अपनी इकलौती बेटी सिंड्रेला को अपने पास बुलाया और प्यार से समझाया, ‘मेरी प्यारी बच्ची, तू सदा ईमानदारी और अच्छे बने रहना। अच्छे और सच्चे आदमी की मदद भगवान् भी करता है। इसलिए ईश्वर सदा तेरे साथ रहेगा। मैं भी स्वर्ग से तेरा ध्यान रखूँगी और जब तुझे जरूरत होगी, मैं तेरे आस-पास ही रहूँगी।’ इतना कहकर उस महिला ने सदा के लिए आँखें मूँद लीं। सिंड्रेला अपनी माँ की मृत्यु पर बहुत रोई, क्योंकि अब रोने के अलावा और कोई चारा उसके पास नहीं था। वह रोज अपनी माँ की कब्र पर जाती, उसपर फूल चढ़ाती और जी भरकर रोती।

ऐसे ही दिन गुजरते गए। सर्दियों में जब उसकी माँ की कब्र बर्फ से ढक गई तब भी वह बच्ची उस जगह पर रोज जाती, कब्र के ऊपर की बर्फ साफ करती, उसपर फूल चढ़ाती और अपनी माँ के लिए आँसू बहाती।

एक साल भी नहीं बीत पाया था कि उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली। उसकी सौतेली माँ की भी दो बेटियाँ थीं। वे दोनों देखने में तो सफेद थीं, पर दिल से बहुत काली थीं। वे दोनों बहनें अपनी सौतेली बहन सिंड्रेला से बहुत चिढ़ती थीं। जब कभी भी मौका मिलता तो सिंड्रेला को खरी-खोटी सुनाने से बाज नहीं आतीं थीं। इस प्रकार घर में सौतेली माँ और सौतेली बहनों के आने से सिंड्रेला का खराब समय शुरू हो गया। दोनों बहनें घर का कुछ भी काम नहीं करती थीं, पर सिंड्रेला को कभी आराम से नहीं बैठने देती थीं। कभी उसे मूर्ख और गँवार कहकर उसका अपमान करतीं, तो कभी कहतीं, ‘जो रोटी खाना चाहेगा तो उसे इसके लिए काम भी करना पड़ेगा।

तू तो रसोई में ही ठीक रह सकती है। जा रसोई में, यहाँ क्यों बैठी है ?’ उन दोनों बहनों ने सिंड्रेला के सारे खिलौने और सुंदर-सुंदर कपड़े भी उससे छीन लिये तथा अपने पुराने तथा भद्दे से कपड़े उसे पहनने के लिए दे दिए और उसके सुंदर से जूतों की जगह उसे लकड़ी के जूते बनवाकर दिए, ताकि जल्दी-जल्दी वह जूते न तोड़े। उसे भद्दे और मैले कपड़ें पहनाकर दोनों सौतेली बहन जी भरकर उसका मजाक बनातीं। अपने पिता से भी अपना दुःख कह नहीं सकती थी, क्योंकि एक तो वह सारा दिन व्यापार में व्यस्त रहता और दूसरे, वह अपनी दूसरी पत्नी के मामले में दखल देना नहीं चाहता था। इसलिए जैसा उसकी सौतेली माँ और बहनें करतीं या कहतीं, वह भी चुपचाप सहन करती रहती। अब रसोई के सारे काम उसे ही करने पड़ते। उसे सुबह-सुबह जल्दी उठा दिया जाता, क्योंकि उसके सोने का स्थान अब उसका रसोईघर ही था। रोज सुबह-सुबह वह पानी भरकर लाती, घर के सभी लोगों के लिए नाश्ता-खाना बनाती, उनके कपड़े धोती और पूरे घर की सफाई करती। इन सब कामों के बाद भी उसकी सौतेली माँ और दोनों बहनें खरी-खोटी सुनाती रहतीं।

जरा सा भी नुकसान होने पर उसे मार भी पड़ती। घर का सारा काम खत्म करने के बाद अगर कुछ समय बचता तो सौतेली माँ उसके आगे अनाज और दालें साफ करने को रख देती। पानी की कमी की वजह से सिंड्रेला रोज-रोज स्नान भी नहीं कर पाती थी। इसलिए गंदे कपड़ों और उलझे हुए बालों से उसकी शक्ल एक नौकरानी जैसी हो गई। उसे देककर कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वह किसी अमीर बाप की बेटी है।

एक बार उसका पिता एक मेले में जाने के लिए तैयार हुआ तो उसने पहले अपनी दोनों सौतेली बेटियों से पूछा, ‘तुम्हें मेले से क्या मँगाना है ?’ बड़ी लड़की ने कहा, ‘मुझे सुंदर-सुंदर कपड़े चाहिए।’ दूसरी लड़की ने कहा, ‘मुझे मोतियों और बहुमूल्य पत्थरों की मालाएँ चाहिए।’ आखिर में उसने सिंड्रेला से पूछा, ‘तुम मेले से अपने लिए क्या मँगाना चाहती हो ?’ सिंड्रेला बोली,‘पिताजी, मेरे लिए आप चिलगोजे का एक छोटा सा पौधा लाइएगा। जब आप वापस घर आएँगे तो रास्ते में जरूर मिल जाएगा।’

मेले में अमीर आदमी ने अपनी पत्नी और दोनों सौतेली बेटियों के लिए वह सबकुछ खरीदा जो उन्होंने मँगाया था, पर अपनी सिंड्रेला के लिए पौधा उसे मेले में कहीं नहीं मिला। जब वह अपने घर जाने लगा तो रास्ते में उसे चिलगोजे का एक छोटा सा पौधा लगा दिखाई दिया, उसने उसे उखाड़ लिया। वह सोचने लगा कि सिंड्रेला ने कोई भी कीमती चीज न माँगकर चिलगोजे का एक नन्हा सा पौधा ही क्यों माँगा ? पर उसकी समझ में कुछ नहीं आया। घर पहुँचकर उसने मेले से लाए उपहार तीनों बेटियों के दिए। सिंड्रेला ने वह नन्हा पौधा ले जाकर अपनी माँ की कब्र के पास लगा दिया। पौधा लगाते समय उसे इतना रोना आया कि पौधे की सारी मिट्टी उसके आँसुओं से गीली हो गई।

धीरे-धीरे वह पौधा बड़ा होने लगा। सिंड्रेला हर रोज सुबह-शाम अपनी माँ की कब्र पर जाती, उसके पास अपने सारे दुःख सुनाती और जी भरकर रो लेती। पौधा बड़ा होने लगा। चिलगोजे के उस छोटे से पेड़ पर एक सफेद चिड़िया आकर रहने लगी। जब कभी सिंड्रेला अपनी माँ की कब्र पर अपनी कोई इच्छा प्रकट करती तब वह सफेद चिड़िया उसकी हर इच्छा को पूरा कर देती।

एक बार की बात है। वहाँ के राजा ने अपने राजकुमार की पसंद की लड़की ढूँढ़ने के लिए एक उत्सव आयोजित किया। यह उत्सव तीन दिनों तक चलना था। इस उत्सव में उसने अपने राज्य की सभी सुंदर और अमीर घरों की लड़कियों को निमंत्रण भेजा। सिंड्रेला की दोनों सौतेली बहनें, जो सुंदर भी थीं और अमीर बाप की बेटी भी, इस उत्सव के लिए आमंत्रित थीं। राजमहल से निमंत्रण पाकर दोनों बहनें खुशी से फूली न समाईं। उन्होंने सिंड्रेला को बुलाकर अपनी कंधी करवाई। फिर उससे अपने जूतों पर पालिश करवाई, उसी से उन जूतों के फीते बँधवाए और फिर अच्छी तरह सज-धजकर दोनों बहनें बोलीं, ‘तू घर का सारा काम ठीक ढंग से करना। हम दोनों राजमहल के उत्सव में जा रही हैं।’

उन दोनों के जाने के बाद सिंड्रेला को बहुत रोना आया, क्योंकि वह खुद भी इस उत्सव में जाना चाहती थी, पर उसके पास न ही सुंदर कपड़े थे और न ही सुंदर जूते। उसने अपनी सौतेली माँ से महल में जाने की अनुमति माँगी, तो वह चीखकर बोली, ‘तू भाग्यहीन तो पूरी तरह से चूल्हे की राख से अटी हुई है। राजकुमार के विवाह में जाएगी ? भाग यहाँ से और चुपचाप घर का काम कर। यह उत्सव तेरे लिए नहीं है।’

सिंड्रेला फिर भी अपनी माँ से अनुनय-विनय करती रही तो सौतेली माँ ने तंग आकर दो-तीन दालें मिलाकर उसे साफ करने के लिए बोली, ‘अगर तू ये तीनों दालें दो घंटे में अलग कर देगी, तो मैं तुझे जाने की अनुमति दे सकती हूं।’ सिंड्रेला ने दालों की वह थाली चुपचाप उठाई और बाहर बाग में बैठकर अपनी माँ को याद करके रोने लगी। वह सोचने लगी कि अगर उसकी अपनी माँ आज जिंदा होती तो वह भी इस उत्सव के लिए जरूर जाती। तभी वह सफेद पक्षी उसके पास आया और थोड़ी ही देर में उसने सारी दालें अलग कर दीं। सिंड्रेला की खुशी का ठिकाना न रहा। वह एक घंटे बाद जब तीनों दालें अलग करके अपनी सौतेली माँ के सामने पहुँची, तो सौतेली माँ हैरान रह गई, क्योंकि उसने तो सोचा था कि सारा दिन लगाने पर भी यह लड़की इन दालों को अलग नहीं कर पाएगी। अब भी वह उसे उस उत्सव में जाने नहीं देना चाहती थी। वह बोली, ‘तू इस राजमहल के उत्सव में कैसे जा सकती है ? न तो तू साफ सुथरी है, न ही तेरे पास सुंदर कपड़े और जूते हैं। राजमहल के सारे लोग तेरा मजाक बनाएँगे और इससे तेरे पिता की भी बदनामी होगी।’ इतना कहकर वह अपनी दोनों बेटियों के साथ घोड़ा गाड़ी में बैठकर राजमहल की ओर चल दी। अब घर में उसके सिवाय और कोई नहीं था, वह दौड़कर अपनी माँ की कब्र पर गई और उस चिलगोजे के पेड़ के नीचे बैठकर रोते हुए बोली-

‘ओ प्यारे नन्हे पेड़,

खुद को थोड़ा हिला-डुला

और मुझपर सोना-चाँदी गिरा।’

इतना कहते ही उस नन्हे से पेड़ से उसकी गोदी में सोने-चाँदी से कढ़े कपड़े आ गिरे और साथ ही मखमल की सुंदर सी जूतियाँ भी, जिनपर चाँदी की कढ़ाई की हुई थी। सिंड्रेला उन दोनों चीजों को लेकर घर की ओर दौड़ी और जल्दी से नहा-धोकर उन कपड़ों और जूतियों को पहनकर महल की ओर चल दी। वह भी पैदलवाले छोटे रास्ते से चलकर नाच शुरू होने से पहले राजमहल में पहुँच गई। उसकी सौतेली माँ और सौतेली बहनों की नजर जब उसपर पड़ी तो वे उसे बिलकुल नहीं पहचान पाईं, क्योंकि वह इस समय सोने-चाँदी से कढ़े कपड़े और मखमली जूते पहनकर पूरी तरह राजकुमारी लग रही थी।

नाच शुरू होने के कुछ देर बाद राजकुमार सिंड्रेला के पास आया और उसके साथ नाचने की इच्छा व्यक्त की। वह खुशी से राजकुमार के साथ नाचने लगी। जब राजकुमार बहुत देर तक सिंड्रेला के साथ ही नाच करता रहा तो उस उत्सव में आई अन्य सभी लड़कियों को राजकुमार पर बहुत गुस्सा आया। जब कोई अन्य लड़की राजकुमार के साथ नाचने के लिए उसके पास जाती तो वह कहता, ‘अभी नहीं, बाद में।’ इस तरह राजकुमार सिंड्रेला के साथ नाचता रहा। धीरे-धीरे शाम होने लगी तो सिंड्रेला का दिल घबराने लगा। वह राजकुमार से अपने घर वापस जाने की आज्ञा माँगने लगी, पर राजकुमार उससे इतना प्रभावित था कि उसका साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। वह खुद भी उसके साथ घर जाना चाहता था, क्योंकि वह यह जानना चाहता था कि इतनी सुंदर बेटी किसकी है और कहाँ रहती है ? इधर सिंड्रेला को अपने घर पहुँचने की जल्दी थी, क्योंकि वह अपनी सौतेली माँ और बहनों से पहले घर पहुँचना चाहती थी। वह बहाना बनाकर राजकुमार से हाथ छुड़ाकर चुपचाप महल के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गई। अपनी सौतेली माँ और दोनों बहनों के घर पहुँचने से पहले ही वह अपने पुराने कपड़े पहनकर घर के काम में लग गई। अपने सुंदर से कपड़े उसने उसी पेड़ की नीचे रख दिए। वह सफेद पक्षी उसे वापस ले गया।

दूसरे दिन फिर उसकी सौतेली माँ अपनी दोनों बेटियों को पहले से ज्यादा सजा-धजाकर राजमहल ले गई। उन तीनों के जाने के बाद वह दौड़ी-दौड़ी अपनी माँ की कब्र पर गई और उस पेड़ को हिलाती हुई बोली-

‘ओ मेरे प्यारे नन्हे पेड़,

खुद को थोड़ा हिला-डुला

और मुझ पर सोना-चाँदी गिरा।’

उस पेड़ ने उसपर पहले की तरह सोने-चाँदी की कढ़ाई वाले कपड़े गिरा दिए। आज के कपड़े और जूते पिछले दिन के कपड़ों और जूतों से भी सुंदर थे। उन कपड़ों में वह जैसे ही राजमहल में घुसी, सबकी निगाहें उसी पर टिक गईं। राजकुमार भी उसे ढूँढ़ता हुआ उसके पास पहुँच गया। वह उसका हाथ पकड़कर नाचने वाले हॉल में ले गया और उसीके साथ नाचने लगा। आज भी वह केवल उसके साथ नाचना चाहता था। लड़कियों की भीड़ में उसे केवल यही एक लड़की पसंद आई थी। जैसे ही शाम होनी शुरू हुई, वह घबराने लगी। उसे नाचने में कोई आनंद नहीं आ रहा था। वह अपनी माँ और बहनों से पहले अपने घर पहुँचना चाहती थी। जब उसने घर जाने की इच्छा व्यक्त की तो राजकुमार भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। राजकुमार की नजर बचाकर वह पीछे के दरवाजे से झाड़ियों में गुम हो गई। बेचारा राजकुमार अँधेरे में देख नहीं पाया। राजकुमार महल के पीछेवाले बाग में उस सुंदर लड़की को ढूँढ़ता रह गया और इधर सिंड्रेला ने झट से अपने सुंदर कपड़े उतारकर अपनी माँ की कब्र के पासवाले पेड़ के नीचे रखे और वही मैले-कुचैले कपड़े पहनकर अपने दोनों हाथ और मुँह चूल्हे की राख से ऐसे रँग लिये जैसे लगे कि वह सारा दिन रसोई से बाहर ही नहीं निकली है। उसकी सौतेली माँ जब अपनी दोनों बेटियों के साथ घर पहुँची तो उसे बहुत तसल्ली हुई कि वह सुंदर लड़की सिंड्रेला नहीं थी, जबकि उस लड़की की सूरत उससे बहुत मिलती-जुलती थी।

तीसरे दिन भी जब सौतेली माँ अपनी दोनों बेटियों को लेकर राजमहल के उत्सव के लिए रवाना हुई तो सिंड्रेला दौड़ी-दौड़ी अपनी माँ की कब्र के पास गई और उसने उस पेड़ के नीचे खड़े होकर अपनी पहलेवाला गाना फिर दोहराया तो फिर से उस पेड़ से चमक-धमक वाले सुंदर कपड़े उसके हाथ में आ गिरे और बाद में असली सोने की बनी हुई सैंडिल भी। जल्दी से नहा-धोकर वह सुंदर कपड़े और सोने की सैंडिल पहनकर राजमहल में पहुँची। आज फिर सब उसकी सुंदरता तथा कपड़ों की देखते रह गए। नाच अभी शुरू नहीं हुआ था, क्योंकि राजुकमार अपनी पसंद की सुंदर और सुकोमल लड़की को ढूँढ़ रहा था। जैसे ही सिंड्रेला नाचवाले बड़े हॉल में घुसी तो राजकुमार तेजी से उसके पास आया और उसे अपने साथ नाचने के लिए आमंत्रित किया। अगर कोई और लड़की उसके साथ नाचने की इच्छा व्यक्त करती तो वह यही कह देता, ‘अभी कुछ इंतजार करो। मैं बाद में तुम्हारे साथ नाचूँगा।’

इसी तरह नाच करते-करते शाम होने लगी और सिंड्रेला को घर जाने की जल्दी होने लगी। राजकुमार के सामने उसने बहाना बनाया और तेजी से राजमहल से गायब हो गई। राजकुमार काफी देर तक उस लड़की के वापस आने की प्रतीक्षा करता रहा। बाद में वह महल के पिछली ओर गया, क्योंकि पहले भी वह लड़की पीछे की ओर से निकलकर कहीं गायब हो गई थी। वहाँ पर उसे सोने की एक सैंडिल मिली। उसने झट से उस सैंडिल को उठाकर देखा कि वह खूबसूरत सैंडिल सोने से बुनी हुई थी। राजकुमार ने अपने पिता के सामने शर्त रखी कि वह उसी लड़की से विवाह करेगा, जिसके पैर में सोने की यह सैंडिल ठीक-ठीक आ जाएगी। राजा ने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि राजकुमार उसी लड़की को अपनी पत्नी बनाएगा, जिसके पैर में वह सोने की सैंडिल ठीक आएगी, जो उसे महल के पीछेवाले बाग में मिला था।

राज्य की सभी सुंदर लड़कियों और सिंड्रेला की दोनों सौतेली बहनों ने भी उस सैंडिल को पहनकर देखा, पर वह किसी के पैर में पूरी तरह ठीक नहीं आई। सिंड्रेला की बड़ी सौतेली बहन ने तो रानी बनने के लालच में अपने पैर की अंगुली भी घायल कर ली, पर सैंडिल पहनकर एक कदम भी आगे नहीं चल सकी, क्योंकि वह उसके पैर के लिए बहुत छोटी थी। फिर भी सौतेली माँ ने राजमहल में खबर भेज दी कि उसकी बड़ी बेटी को वह सैंडिल पूरी आ गई है। राजकुमार खुद आकर देख लें। राजकुमार उस अमीर आदमी के घर पहुँचा, जिसकी बेटी के पैरों में सोने की सैंडिल पूरी आई थी। उसने वहाँ जाकर देखा कि लड़की सचमुच ही वह सैंडिल पहने खड़ी है। वह उस लड़की को अपने घोड़े पर बैठाकर अपने महल की ओर चल दिया; पर जैसे ही उसका घोड़ा सिंड्रेला की माँ की कब्र के पास से गुजरा, तभी उसे पेड़ से एक पक्षी की आवाज सुनाई दी-

‘गुटर-गूँ गुटर-गूँ,

इसको लेकर जाता कहाँ तू।

सैंडिल छोटी है इसके पैर में,

तेरी रानी बैठी है घर में।’

राजकुमार ने जब यह गाना सुना तो उसने घोड़ा रोककर उस लड़की के पैर को देखा, तो पाया कि सचमुच ही वह सैंडिल उसके पैर के लिए छोटी थी और इसी वजह से उस लड़की के पैर का अँगूठा और अँगुलियाँ घायल हो गई थीं तथा सैंडिल खून से लाल हो गया था। राजकुमार को उस लड़की की धूर्तता पर बहुत गुस्सा आया। उसने झट से अपना घोड़ा सिंड्रेला के घर की ओर मोड़ दिया। वहाँ पहुँचकर बोला, ‘यह मेरी पत्नी नहीं हो सकती, क्योंकि यह सैंडिल इसके पैर में सही नहीं है। शायद इसकी कोई और बहन होगी, जिसे यह जूता पूरा आता हो।’ सौतेली माँ ने झट से अपनी दूसरी बेटी को बुलाया और उसे वह सैंडिल पहनाकर देखा, पर उसके पाँव की अँगुलियाँ कुछ बड़ी थीं, फिर भी लालची माँ ने उस लड़की को यह सैंडिल जबरदस्ती पहना दी। लड़की बड़ी मुश्किल से चार-पाँच कदम चलकर राजकुमार के पास पहुँची। राजकुमार ने उसे अपने घोड़े पर बैठाया और महल की ओर चल दिया। जैसे ही वह सिंड्रेला की माँ की कब्र के पास पहुँचा तो उसे फिर वही गाना सुनाई दिया। वह घोड़ा रोककर नीचे उतरा तो उसने देखा कि बड़ी बहन की तरह उसके पैर से भी खून निकल रहा था। वह फिर अपने घोड़े को वापस उस लड़की के घर ले गया और उसकी माँ से बोला, ‘यह लड़की भी मेरी रानी नहीं बन सकती, क्योंकि यह सैंडिल इसके पैर के लिए भी छोटी है। क्या तुम्हारी और कोई बेटी है ?’

अमीर आदमी बोला, ‘नहीं, पर मेरी पहली पत्नी की लड़की है, जो अब इस घर में नौकरानी का काम करती है। वह तुम्हारी रानी बनने के लायक नहीं है।’

राजकुमार ने जब उस लड़की से मिलने की इच्छा व्यक्त की तो सौतेली माँ बोली, ‘नहीं-नहीं, तुम उस गंदी लड़की से न ही मिलो तो अच्छा है, वह बहुत गँवार है।’ पर राजकुमार उसी क्षण उसी लड़की से मिलना चाहता था। अतः हारकर सौतेली माँ को राजकुमार के सामने सिंड्रेला को उपस्थित करने के लिए तैयार होना ही पड़ा। सिंड्रेला ने झट से अपने हाथ-पैर और मुँह धोया और साफ कपड़े पहनकर राजकुमार के सामने आकर खडी हो गई। राजकुमर को वह चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगा, फिर भी वह चुप रहा। उसने सिंड्रेला को सोने की वह सैंडिल पहनने का हुक्म दिया। सिंड्रेला ने अपनी लकड़ी की सैंडिल उतारकर जब उस सोने की सैंडिल में पैर डाला तो उसके पैर में ऐसी सही आई, जैसे यह सैंडिल उसी के लिए बनाई गई हो। अब राजकुमार को पूरा विश्वास हो गया कि यह वही सुंदर लड़की है जिसने तीन दिनों तक उसके साथ नृत्य किया था। वह उसे पाकर बहुत खुश हुआ। राजकुमार ने उस लड़की को अपने घोड़े पर बैठाया और उसके पिता से बोला, ‘मुझे मेरी पसंद की लड़की मिल गई। यही मेरी असली पत्नी है, क्योंकि तीन दिनों तक मैंने इसी लड़की के साथ नृत्य किया था।’

Categories
Bed time Stories Germany ki Lok Kathayen Lok Kathayen Story

Germany ki Lok Kathayen-6/ जर्मनी की लोक कथाएँ-6

कहानी-मेहनत का फल: जर्मनी की लोक कथा

राजकुमारी रोजी की खूबसूरती की हर जगह चर्चा थी । सुनहरी आंखें, तीखे नयन-नक्श, दूध-सी गोरी काया, कमर तक लहराते बाल सभी सुंदरता में चार चांद लगाते थे ।

एक बार की बात है । राजकुमारी रोजी को अचानक खड़े-खड़े चक्कर आ गया और वह बेहोश होकर गिर पड़ी ।

राजवैद्य ने हर प्रकार से रोजी का इलाज किया, पर राजकुमारी रोजी को होश नहीं आ रहा था । राजा अपनी इकलौती बेटी को बहुत चाहते थे ।

उस देश के रजउ नामक ग्राम में विलियम और जॉन नाम के दो भाई रहा करते थे ।

विलियम बहुत मेहनती और चुस्त था और जॉन अव्वल दर्जे का आलसी था । सारा दिन खाली पड़ा बांसुरी बजाया करता था । विलियम पिता के साथ सुबह खेत पर जाता, हल जोतता व अन्य कामों में हाथ बंटाता ।

एक दिन विलियम ने जंगल में तोतों को आदमी की भाषा में बात करते सुना । एक तोता बोला – “यहां के राजा की बेटी अपना होश खो बैठी है, क्या कोई इलाज है ?”

“क्यों नहीं, वह जो उत्तर दिशा में पहाड़ी पर सुनहरे फलों वाला पेड़ है वहां से यदि कोई फल तोड़कर उसका रस राजकुमारी को पिलाए तो राजकुमारी ठीक हो सकती है ।” तोते ने कहा, “पर ढालू पहाड़ी से ऊपर जाना तो बहुत कठिन काम है, उससे फिसलकर तो कोई बच नहीं सकता ।”

विलियम ने घर आकर सारी बात बताई तो जॉन जिद करने लगा कि वह फल मैं लाऊंगा और राजा से हीरे-जवाहरात लेकर आराम की बंसी बजाऊंगा । फिर जॉन अपने घर से चल दिया । मां ने रास्ते के लिए जॉन को खाना व पानी दे दिया ।

जॉन अपनी बांसुरी बजाता पहाड़ी की ओर चल दिया । पहाड़ी की तलहटी में उसे एक बुढ़िया मिली, वह बोली – “मैं बहुत भूखी हूँ । कुछ खाने को दे दो ।”

जॉन बोला – “हट बुढ़िया, मैं जरूरी काम से जा रहा हूं । खाना तुझे दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा ?” और जॉन आगे चल दिया ।

पर पहाड़ी के ढलान पर पहुचंते ही जॉन का पांव फिसल गया और वह गिरकर मर गया ।

कई दिन इंतजार करने के पश्चात् विलियम घर से चला । उसके लिए भी मां ने खाना व पानी दिया । उसे भी वही बुढ़िया मिली । बुढ़िया के भोजन मांगने पर विलियम ने आधा खाना बुढ़िया को दे दिया और स्वयं आगे बढ़ गया ।

विलियम जब ढलान पर पहुंचा तो उसका पांव भी थोड़ा-थोड़ा फिसल रहा था, वह घास पकड़-पकड़ कर चढ़ रहा था । पर उसे तभी वहां दो तोते दिखाई दिए और उनमें एक-एक तड़पकर उसके आगे गिर गया ।

विलियम को चढ़ते-चढ़ते प्यास भी लग रही थी और उसके पास थोड़ा ही पानी बचा था, फिर भी उसने तोते की चोंच में पानी डाल दिया ।

चोंच पर पानी पड़ते ही तोता उड़ गया और न जाने तभी विलियम का पैर फिसलना रुक गया । विलियम तेजी से ऊपर पहुंचा और सुनहरे पेड़ तक पहुंच गया ।

उसने पेड़ से एक फल तोड़ लिया । फल को तोड़ते ही उसमें जादुई शक्ति आ गई । उसने आंख मुंद ली और जब आंखें खोली तो स्वयं को पहाड़ी से नीचे पाया और उसके सामने वही बुढ़िया खड़ी मुस्करा रही थी ।

वह फल लेकर राजा के महल में पहुंचा और राजा की आज्ञा लेकर उसने फल का रस निकाल कर राजकुमारी के मुंह में डाल दिया ।

रस मुंह में पड़ते ही राजकुमारी ने आंखें खोल दीं । राजकुमारी बोली – “हे राजकुमार, तुम कौन हो ?”

विलियम बोला – “मैं कोई राजकुमार नहीं, एक गरीब किसान हूं ।” इतने में राजा व उसके सिपाही आ गए । राजा बोले – “आज से तुम राजकुमार ही हो वत्स । तुमने रोजी को नई जिन्दगी दी है । बताओ, तुम्हें क्या इनाम दिया जाए ?”

विलियम बोला – “मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, मेरे पास बहुत थोड़ी जमीन है । यदि आप मुझे पांच एकड़ जमीन दिलवा दें तो मैं ज्यादा खेती करके आराम से रह सकूंगा ।”

राजा बोला – “सचमुच तुम मेहनती और ईमानदार हो । तभी तुमने इतना छोटा इनाम मांगा है । हम तुम्हारा विवाह अपनी बेटी रोजी से करके तुम्हारा राजतिलक करना चाहते हैं ।”

विलियम बोला – “पहले मैं अपने माता-पिता की आज्ञा लेना अपना फर्ज समझता हूं ।”

राजा विलियम की मातृ-पितृ भक्ति देखकर गद्गद हो उठा और बोला – “उनसे हम स्वयं ही विवाह की आज्ञा प्राप्त करेंगे । सचमुच तुम्हारे माता-पिता धन्य हैं जो उन्होंने तुम जैसा मेहनती व होनहार पुत्र पाया है ।”

फिर राजा ने विलियम के पिता की आज्ञा से विलियम व रोजी का विवाह कर दिया और उसके पिता को रहने के लिए बड़ा मकान, खेती के लिए जमीन व काफी धन दिया ।

विलियम राजकुमारी के साथ महल में तथा उसके माता-पिता अपने बड़े वैभवशाली मकान में सुखपूर्वक रहने लगे ।

Categories
Bed time Stories Japan ki Lok Kathayen Lok Kathayen Story

Japan ki Lok Kathayen-1/ जापान की लोक कथाएँ-1

कहानी-प्यार के बदले प्यार: जापानी लोक कथा

एक गांव के किनारे बनी कुटिया में एक साधु रहता था । वह दिन भर ईश्वर का भजन-कीर्तन करके समय बिताता था । उसे न तो अपने भोजन की चिंता रहती थी और न ही धन कमाने की । गांव के लोग स्वयं ही उसे भोजन दे जाते थे । साधू उसी भोजन से पेट भर लिया करता था । उसे न तो किसी चीज की ख्वाहिश थी और न ही लालच । वह बहुत उदार और कोमल हृदय का व्यक्ति था । यदि कोई दुष्ट व्यक्ति उसे कभी कटु शब्द भी बोल देता, तो साधु उसका बुरा नहीं मानता था ।

सभी लोग साधु के व्यवहार की प्रशंसा किया करते थे । इसी कारण वे उसकी हर प्रकार से सहायता किया करते थे ।

एक बार कड़ाके की सर्दियों के दिन थे । साधु अपनी कुटिया में आग जलाकर गर्मी पाने का प्रयास कर रहा था । तभी उसे अपने दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी । साधु सोचने लगा कि सर्दी की रात में इस वक्त कौन आ सकता है ?

साधु ने दरवाजा खोला तो देखा की एक लोमड़ी बाहर खड़ी थी, जो सर्दी से कांप रही थी । लोमड़ी बोली – “मैं सामने के पहाड़ों में रहती हूं । वहां आजकल बर्फ गिर रही है, इस कारण मेरा जीना मुश्किल हो गया है । आप कृपा करके मुझे रात्रि में थोड़ी-सी जगह दे दीजिए । मैं सुबह होते ही चली जाउंगी ।”

साधु ने नम्रतापूर्वक उसे भीतर बुला लिया और कहा – “परेशान होने की कोई बात नहीं है । तुम जब तक चाहो यहां रह सकती हो ।”

कुटिया में जली आग के कारण लोमड़ी को राहत महसूस होने लगी । तब साधु ने लोमड़ी को दूध और रोटी खाने को दी । लोमड़ी ने पेट भर कर भोजन किया और एक कोने में सो गई ।

सुबह होते ही लोमड़ी ने साधु से बाहर जाने की आज्ञा मांगी । साधु ने उससे कहा कि वह इसे अपना ही घर समझकर जब चाहे आ सकती है ।

रात्रि होने पर लोमड़ी फिर आ गई । साधु ने उससे दिन भर की बातें कीं, थोड़ा भोजन दिया । फिर लोमड़ी एक कोने में सो गई ।

इसी तरह दिन बीतने लगे । लोमड़ी प्रतिदिन रात्रि होने पर आ जाती और सुबह होते ही जगंल की ओर चली जाती । साधु को लोमड़ी से एक बालक के समान प्यार हो गया ।

अब जब कभी लोमड़ी को आने में थोड़ी देर हो जाती तो साधु दरवाजे पर खड़े होकर उसकी प्रतीक्षा करता, और उससे देर से आने का कारण पूछता । लोमड़ी भी साधु से हिल-मिल गई थी और उसे बहुत प्यार करने लगी थी ।

कुछ महीने बीत जाने पर मौसम बदलने लगा । एक दिन लोमड़ी बोली – “आपने मेरी इतनी देखभाल और सेवा की है, मैं इसके बदले आपके लिए कोई कार्य करना चाहती हूं ।”

साधु ने कहा – “मैंने तुम्हारी देखभाल करके तुम पर कोई उपकार नहीं किया है । यह तो मेरा कर्तव्य था । इस तरह की बातें करके तुम मुझे शर्मिन्दा मत करो ।”

लोमड़ी बोली – “मैं किसी उपकार का बदला नहीं चुकाना चाहती । मुझे आपके साथ रहते-रहते आपसे प्यार हो गया है । इस कारण मैं आपकी सेवा करके स्वयं को गर्वान्वित महसूस करना चाहती हूं । मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं आपके काम आऊं ।”

साधु को लोमड़ी की प्यार भरी बातें सुनकर हार्दिक प्रसन्नता हुई । वह खुशी से गद्गद हो उठा और लोमड़ी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला – “मुझे न तो किसी चीज की आवश्यकता है और न ही कोई विशेष इच्छा । गांव के लोग कुटिया में ही मेरा भोजन पहुंचा जाते हैं, मेरी बीमारी में वे मेरा ध्यान रखते हैं, मुझे और क्या चाहिए ?”

लोमड़ी बोली – “यह सब तो मैं जानती हूं । इतने महीनों तक आपके साथ रहकर आपकी आत्मसंतोष की प्रवृत्ति को मैंने अच्छी तरह देखा व सीखा है । फिर भी कोई ऐसी इच्छा हो जो पूरी न हो सकती हो तो बताइए । मैं उसे पूरा करने की कोशिश करूंगी ।”

साधु कुछ देर सोचता रहा, फिर सकुचाते हुए बोला – “यूं तो जीते जी मुझे किसी चीज की आवश्यकता नहीं है । फिर भी कभी-कभी सोचता हूं कि मेरे पास एक सोने का टुकड़ा होता जिसमें से कुछ मैं भगवान को चढ़ा देता और कुछ मेरे मरने पर मेरे क्रिया-कर्म के काम आ जाता । मैं गांव वालों की कृपा का बदला अपनी मृत्यु के बोझ से नहीं देना चाहता ।”

लोमड़ी साधु की बात सुनकर बोली – “बस इतनी सी बात है बाबा, इसमें आप इतना सकुचा रहे थे । मैं कल ही आपके लिए सोने का टुकड़ा ला देती हूं ।”

साधु ने कहा – “मुझे कोई भी ऐसा सोने का टुकड़ा नहीं चाहिए जो चोरी किया हुआ हो या किसी से दान में प्राप्त किया हो ।”

लोमड़ी साधु की बात सुनकर सोच में पड़ गई, फिर बोली – “बाबा, मैं आपके लिए ऐसा ही सोना लाकर दूंगी ।”

इसके बाद लोमड़ी बाबा की कुटिया से हर दिन की भांति चली गई । शाम होने पर साधु लोमड़ी का इंतजार करने लगा । परंतु घंटों बीत गए, लोमड़ी वापस नहीं आई ।

साधु को लोमड़ी की फिक्र में ठीक प्रकार नींद नहीं आई । इस प्रकार कई दिन बीत गए । परंतु लोमड़ी नहीं लौटी । साधु के मन में पश्चाताप होने लगा कि उसने बेकार ही ऐसी वस्तु मांग ली जो उसके लिए लाना संभव न था ।

कभी साधु के मन में यह ख्याल आता कि हो सकता है कि लोमड़ी कहीं से सोना चुराने गई हो और पकड़ी गई हो । फिर लोगों के हाथों मारी गई हो या लोमड़ी किसी दुर्घटना का शिकार हो गई हो ।

साधु को लोमड़ी की बहुत याद आती थी । जैसे ही वह रात्रि का भोजन करने बैठता, उसे लोमड़ी की मीठी बातें व साथ में भोजन खाना याद आ जाता था ।

कुछ महीने बीत गए और साधु को लोमड़ी की याद कम सताने लगी । साधु अपने भजन-कीर्तन में मस्त रहने लगा ।

अब लोमड़ी को गए छह महीने बीत चुके थे और सर्दी पड़ने लगी थी । एक दिन अचानक कुटिया के द्वार पर किसी ने दस्तक दी । साधु ने द्वार खोला तो यह देख कर हैरान रह गया कि द्वार पर पतली-दुबली लोमड़ी खड़ी थी ।

साधु ने कहा – “अंदर आओ । तुम इतनी दुबली कैस्से हो गई ?”

लोमड़ी ने खुशी के आंसू बहाते हुए सोने का टुकड़ा साधु के आगे रख दिया और अपना सिर साधु के चरणों में टिका कर बैठ गई ।

साधु लोमड़ी के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोला – “तुम्हें इसके लिए इतना परेशान होने की क्या आवश्यकता थी, तुम नहीं जानती कि मैं तुम्हारे लिए कितना परेशान रहता था । तुम मेरे बालक के समान हो ।”

लोमड़ी बोली – “मैं इसके लिए बिल्कुल भी परेशान नहीं थी । मुझे तो अपना कर्तव्य पूरा करना था । आपके प्यार की मैं सदैव ऋणी रहूंगी । यह मेरी छोटी-सी भेंट आप स्वीकार कर लीजिए ।”

साधु का मन भी लोमड़ी का प्यार देखकर विचलित हो उठा । उसकी अश्रुधारा बह निकली । वह बोला – “लेकिन यह तो बताओ कि तुम इतने दिन कहां थीं, यह सोने का टुकड़ा कहां से लाईं ?”

लोमड़ी बोली – “जिन पहाड़ों पर मैं रहती हूं उसी के दूसरी तरफ सोने की खानें हैं । वहां पर खुदाई के वक्त सोने के कण गिरते जाते हैं । मैं उन्हीं कणों को इतने दिन तक इकट्ठा करती रही ।”

यह कह कर लोमड़ी साधु के पैरों में लोट लगाने लगी । साधु लोमड़ी को प्यार करते हुए बोला – “तुमने मेरे लिए इतनी मेहनत की है, इसके बारे में मैं सबको बताऊंगा ।”

लोमड़ी बोली – “मैं नहीं चाहती कि मेरी छोटी-सी सेवा के बारे में लोगों को पता चले । मैंने प्रसिद्धि के लालच में यह कार्य नहीं किया है । यह प्रेरणा मुझे आपके प्यार से ही मिली है । कल मैं जब यहां से चली जाऊं उसके बाद आपका जो जी चाहे कीजिएगा ।”

साधु बोला – “यह कैसे हो सकता है कि तुम्हारी इतनी मेहनत और सेवा को लोग न जानें ? लेकिन तुम यह नहीं चाहती तो यही सही । लेकिन अब मैं तुम्हें यहां से हरगिज जाने नहीं दूंगा । तुम्हें सदैव यहीं मेरे पास रहना होगा ।”

लोमड़ी मान गई और पहले की भांति साधु के साथ रहने लगी । अब वह हर रोज सुबह को चली जाती और शाम क आते वक्त जंगल से थोड़ी लकड़ियां बटोर लाती ताकि बाबा की ईंधन की आवश्यकता पूरी होती रहे । लोमड़ी साधु बाबा के साथ वर्षों तक बालक की भांति सुख से रही ।

Categories
Bed time Stories Japan ki Lok Kathayen Lok Kathayen Story

Japan ki Lok Kathayen-3/ जापान की लोक कथाएँ-3

कहानी-बुज़ुर्ग बोझ नहीं, अनमोल धरोहर: जापानी लोक-कथा

जापान के एक राज्य में किसी वक्त क़ानून था कि बुजुर्गों को एक निश्चित उम्र में पहुंचने के बाद जंगल में छोड़ आया जाए…जो इसका पालन नहीं करता था, उसे संतान समेत फांसी की सज़ा दी जाती थी…उसी राज्य में पिता-पुत्र की एक जोड़ी रहती थी…दोनों में आपस मे बहुत प्यार था…उस पिता को भी एक दिन जंगल में छोड़ने का वक्त आ गया…पुत्र का पिता से अलग होने का बिल्कुल मन नहीं था…लेकिन क्या करता…क़ानून तो क़ानून था…न मानों तो फांसी की तलवार पिता-पुत्र दोनों के सिर पर लटकी हुई थी… पुत्र पिता को कंधे पर लादकर जंगल की ओर चल दिया…जंगल के बीच पहुंचने के बाद पुत्र ऐसी जगह रूका जहां पेड़ों पर काफी फल लगे हुए थे और पानी का एक चश्मा भी था…पुत्र ने सोचा कि पिता की भूख-प्यास का तो यहां इतंज़ाम है…रहने के लिए एक झोंपड़ी और बना देता हूं… दो दिन तक वो वहीं लकड़ियां काट कर झोंपड़ी बनाने में लगा रहा…पिता के विश्राम के लिए एक तख्त भी बना दिया…पिता ने फिर खुद ही पुत्र से कहा…अब तुम्हे लौट जाना चाहिए…भरे मन से पुत्र ने पिता से विदाई ली तो पिता ने उसे एक खास किस्म के पत्तों की पोटली पकड़ा दी…

पुत्र ने पूछा कि ये क्या दे रहे हैं..तो पिता ने बताया…बेटा जब हम आ रहे थे तो मैं रास्ते भर इन पत्तों को गिराता आया था…इसलिए कि कहीं तुम लौटते वक्त रास्ता न भूल जाओ…ये सुना तो पुत्र ज़ोर ज़ोर से रोने लगा…अब पुत्र ने कहा कि चाहे जो कुछ भी हो जाए वो पिता को जंगल में अकेले नहीं छोड़ेगा…ये सुनकर पिता ने समझाया…बेटा ये मुमकिन नहीं है…राजा को पता चल गया तो दोनों की खाल खींचने के बाद फांसी पर चढ़ा देगा…पुत्र बोला…अब चाहे जो भी हो, मैं आपको वापस लेकर ही जाऊंगा…पुत्र की जिद देखकर पिता को उसके साथ लौटना ही पड़ा…दोनों रात के अंधेरे में घर लौटे…पुत्र ने घर में ही तहखाने में पिता के रहने का इंतज़ाम कर दिया…जिससे कि और कोई पिता को न देख सके…

पिता को सब खाने-पीने का सामान वो वही तहखाने में पहुंचा देता…ऐसे ही दिन बीतने लगे…एक दिन अचानक राजा ने राज्य भर में मुनादी करा दी कि जो भी राख़ की रस्सी लाकर देगा, उसे मालामाल कर दिया जाएगा…अब भला राख़ की रस्सी कैसे बन सकती है…उस पुत्र तक भी ये बात पहुंची…उसने पिता से भी इसका ज़िक्र किया…पिता ने ये सुनकर कहा कि इसमें कौन सी बड़ी बात है…एक तसले पर रस्सी को रखकर जला दो…पूरी जल जाने के बाद रस्सी की शक्ल बरकरार रहेगी…यही राख़ की रस्सी है, जिसे राजा को ले जाकर दिखा दो..(कहावत भी है रस्सी जल गई पर बल नहीं गए…)…बेटे ने वैसा ही किया जैसा पिता ने कहा था…राजा ने राख़ की रस्सी देखी तो खुश हो गया…वादे के मुताबिक पुत्र को अशर्फियों से लाद दिया गया…

थोड़े दिन बात राजा की फिर सनक जागी…इस बार उसने शर्त रखी कि ऐसा ढोल लाया जाए जिसे कोई आदमी बजाए भी नहीं लेकिन ढोल में से थाप की आवाज़ लगातार सुनाई देती रहे…अब भला ये कैसे संभव था…गले में ढोल लटका हो, उसे कोई हाथ से बजाए भी नहीं और उसमें से थाप सुनाई देती रहे…कोई ढोल वाला ये करने को तैयार नहीं हुआ…

ये बात भी उसी पुत्र ने पिता को बताई…पिता ने झट से कहा कि इसमें भी कौन सी बड़ी बात है…पिता ने पुत्र को समझाया कि ढोल को दोनों तरफ से खोल कर उसमें मधुमक्खियां भर दो…फिर दोनों तरफ़ से ढोल को बंद कर दो…अब मधुमक्खियां इधर से उधर टकराएंगी और ढोल से लगातार थाप की आवाज़ आती रहेगी…पुत्र ने जैसा पिता ने बताया, वैसा ही किया और ढोल गले में लटका कर राजा के पास पहुंच गया…ढोल से बिना बजाए लगातार आवाज़ आते देख राजा खुश हो गया…फिर उसे मालामाल किया…लेकिन इस बार राजा का माथा भी ठनका…

उसने लड़के से कहा कि तुझे इनाम तो मिल ही गया लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही कि क्या पूरे राज्य में अकेला तू ही समझदार है…कुछ राज़ तो है…राज़ बता तो तुझे दुगना इनाम मिलेगा…इस पर लड़के ने कहा कि ये राज़ वो किसी कीमत पर नहीं बता सकता…राजा के बहुत ज़ोर देने पर लड़के ने कहा कि पहले उसे वचन दिया जाए कि उसकी एक मांग को पूरा किया जाएगा…राजा के वचन देने पर लड़के ने सच्चाई बता दी…साथ ही मांग बताई कि उसी दिन से बुज़ुर्गों को जंगल में छोड़कर आने वाले क़ानून को खत्म कर दिया जाए और जो बुज़ुर्ग ऐसे हालत में जंगल में रह भी रहे हैं उन्हें सम्मान के साथ वापस लाया जाए…राजा ने वचन के अनुरूप फौरन ही लड़के की मांग मानते हुए उस क़ानून को निरस्त कर दिया…साथ ही जंगल से सब बुज़ुर्गों को वापस लाने का आदेश दिया…

Categories
Bed time Stories Denmark ki Lok Kathayen Lok Kathayen Story

Denmark ki Lok Kathayen-1/ डेनमार्क की लोक कथाएँ-1

कहानी-सबसे अच्छी इच्छा: डेनमार्क की लोक कथा

बहुत समय पहले की बात है, डेनमार्क देश में तीन भाई रहते थे। यह तो पता नहीं कि यह सब कैसे हुआ पर एक बार उन तीनों भाइयों को एक एक वरदान मिला। दोनों बड़े भाइयों ने तो यह वरदान माँगने में ज़रा भी देर नहीं की। उन्होंने तुरन्त ही यह इच्छा प्रगट की कि वे जब भी अपनी जेब में हाथ डालें तो उन्हें उसमें धन मिल जाये, यानी कि जब भी उनको पैसे की जरूरत हो तो उनकी जेब में हमेशा पैसे रहें।

लेकिन सबसे छोटा भाई जिसका नाम बूट्स था, उसने किसी दूसरे प्रकार की ही इच्छा प्रकट की। उसकी इच्छा थी कि जो भी स्त्री उसे देखे वही उसे प्रेम करने लगे। उन सबकी इच्छा पूरी हुई। पर कैसे इसके लिये अब आगे की कहानी सुनो –

इन इच्छाओं के पाने के बाद दोनों बडे, भाइयों ने दुनियाँ देखने का प्रोग्राम बनाया। बूट्स ने उनसे पूछा कि क्या वह भी उनके साथ दुनियाँ घूमने चल सकता था। परन्तु उन्होंने उसकी एक न सुनी और बोले — “हम तो जहाँ भी जायेंगे राजकुमार समझे जायेंगे मगर तुम एक बेवकूफ लड़के समझे जाओगे। तुम्हारे पास तो एक पेनी भी नहीं है और न कभी होगी। फिर तुम्हारी देखभाल भी कौन करेगा”

पर बूट्स ने जिद की “कुछ भी सही, मैं तुम्हारे साथ ही चलूँगा। ”

काफी प्रार्थना के बाद वे दोनों बड़े भाई उसको अपने साथ ले चलने के लिये मान गये पर साथ में उन्होंने एक शर्त लगा दी कि वह उनका नौकर बन कर उनके साथ चलेगा। बूट्स मान गया सो वे तीनों चल पड़े।

एक दो दिन का सफर करने के बाद वे लोग एक सराय में आये।

दोनों बड़े भाइयों के पास तो खूब पैसा था सो उन्होंने बड़े शानदार खाने का आर्डर दिया, जैसे मुर्गा, मछली, गोश्त, ब्रान्डी आदि, मगर बूट्स को किसी ने अन्दर भी नहीं जाने दिया। उसे गाड़ी घोड़े और सामान की देखभाल के लिये सराय के बाहर ही छोड़ दिया गया।

उसने घोड़ों को अस्तबल में बाँधा, गाड़ी को धोया और फिर घोड़ों के खाने के लिये घास ले कर गया। जब वह यह सब कर रहा था तो सराय के मालिक की पत्नी उसे खिड़की से देख रही थी।

उसकी आँखें उस सुन्दर लड़के के चेहरे से ही नहीं हट पा रही थीं हालाँकि वह तो मेहमानों का केवल नौकर ही था। जितनी अधिक देर तक वह उसे देखती रही उसे वह उतना ही अधिक सुन्दर दिखायी दे रहा था।

सराय का मालिक बोला — “अरे, तुम वहाँ खिड़की पर खड़ी खड़ी क्या कर रही हो, ज़रा जा कर देखो कि रसोई में खाना ठीक से बन रहा है कि नहीं। हमारे शाही मेहमान खाने का इन्तजार कर रहे हैं। ”

पत्नी उधर से अपनी आँख हटाये बिना ही बोली — “ओह, अगर उनको खाना पसन्द नहीं भी आया तो न सही, मैं क्या करूँ। मैंने अभी तक इतना सुन्दर लड़का पहले कभी नहीं देखा। क्यों न हम उसको रसोई में बुला कर कुछ अच्छा सा खाना उसको खाने के लिये दे दें। ऐसा लगता है कि बेचारा काफी मेहनत करता है। ”

“क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? रसोई में जाओ और अपना काम देखो। ”

पत्नी ने पति से लड़ना ठीक नहीं समझा पर उसे एक विचार आया और वह एक कीमती चीज़ अपने ऐप्रन में छिपा कर सराय से बाहर आयी। यह कीमती चीज़ थी एक कैंची। यह एक जादुई कैंची थी। इस जादुई कैंची का काम यह था कि इसको हवा में चलाने से जो भी कपड़ा जिस रंग में भी सोचो उसी रंग में कट जाता था।

वह बूट्स के पास आयी और बोली — “यह कैंची तुम रखो क्योंकि तुम बहुत सुन्दर हो। इस कैंची की खासियत यह है कि इसको हवा में चलाने से जो भी कपड़ा जिस रंग में भी सोचो उसी रंग में कट जाता है। ”

बूट्स ने उसे नम्रता से धन्यवाद दिया और उससे वह कैंची ले कर अपनी जेब में रख ली।

बूट्स के भाइयों का जब खाना खत्म हो गया तो वे फिर चलने के लिये तैयार हुए और बूट्स गाड़ी के पीछे नौकर की जगह पर खड़ा हुआ।

फिर वे एक दूसरी सराय में आये। वे दोनों तो सराय के अन्दर चले गये और बूट्स बाहर ही सामान आदि की देखभाल करने के लिये खड़ा रहा।

भाइयों ने बूट्स को बताया कि “अगर कोई तुमसे यह पूछे कि तुम किसके नौकर हो तो तुम कहना कि “मैं दो विदेशी राजकुमारों का नौकर हूँ। ”

“ठीक है। ”

इस बार भी वही हुआ जो पिछली सराय में हुआ था। सराय के मालिक की पत्नी ने जब उसे देखा तो वह तो बस उसे देखती ही रह गयी।

पति ने जब अपनी पत्नी को बाहर झाँकते देखा तो उसने भी उससे कहा — “वहाँ तुम दरवाजे पर क्यों खड़ी हो? जाओ और जा कर अपनी रसोई देखो। हमारी सराय में रोज रोज विदेशी राजकुमार नहीं आया करते। ”

और जब वह अन्दर नहीं गयी तो वह उसको उसकी गरदन पकड़ कर अन्दर ले गया। इस बार सराय के मालिक की पत्नी ने उसको एक जादुई मेजपोश दिया जिसकी खूबी यह थी कि उसे बिछाने पर जो भी खाना सोचो वही खाना उस मेजपोश पर आ जाता था।

तीसरी सराय में भी ऐसा ही हुआ। जैसे ही उस तीसरी सराय के मालिक की पत्नी ने बूट्स को देखा तो वह भी उसकी तरफ आकर्षित हो गयी। उसने उसको लकड़ी की एक टोंटी दी जिसकी खूबी यह थी कि उसे खोलने पर जो भी पीने की चीज़ चाहो वही मिल सकती थी।

बूट्स ने उसको भी नम्रता पूर्वक धन्यवाद दिया और वह टोंटी उससे ले कर अपनी जेब में रख ली। एक बार फिर से वे लोग कड़ी सरदी में अपने सफर पर चल दिये।

अबकी बार वे एक राजा के महल में पहुँचे। दोनों बड़े भाइयों ने अपना परिचय बादशाह के लड़कों के रूप में दिया क्योंकि उनके पास खूब पैसा था और बहुत कीमती कपड़े थे। राजा ने उनका बहुत ज़ोर शोर से स्वागत किया और राजमहल में उन्हें इज़्ज़त से ठहराया गया।

मगर बूट्स बेचारा उन्हीं फटे कपड़ों में था जिनको पहन कर वह घर से निकला था। उस बेचारे की जेब में तो एक पेनी भी नहीं थी।

उसको राजा के नौकरों ने नाव में सवार करा कर एक टापू पर भेज दिया क्योंकि वहाँ का यही नियम था कि जो भी गरीब या भिखारी वहाँ आता उसको उसी टापू पर भेज दिया जाता।

राजा ने यह नियम इसलिये बना रखा था क्योंकि वह अपने स्वादिष्ट और अच्छे खाने और पहनने के बढ़िया कपड़ों को गरीबों की नजर से गन्दा नहीं करना चाहता था।

बचा हुआ खाना जो केवल ज़िन्दा रहने के लिये ही काफी होता था भिखारियों से और गरीबों से भरे उस टापू पर भेज दिया जाता था।

घमंडी भाइयों ने अपने भाई को ऐसी जगह जाते देखा मगर अनदेखा कर दिया, बल्कि वे लोग खुश ही हुए कि अच्छा हुआ उन्हें उससे छुटकारा मिल गया।

जब बूट्स उस टापू पर पहुँचा और उसने वहाँ के लोगों की हालत देखी तो उसे अपनी तीनों कीमती चीज़ों की याद आयी। सबसे पहले उसने कैंची निकाली और उसे हवा में चलाना शुरू कर दिया और हवा में से बढ़िया बढ़िया कपड़े कट कट कर गिरने लगे।

जल्दी ही भिखारियों के पास राजा और उन घमंडी भाइयों से भी अधिक कीमती और सुन्दर कपड़े आ गये। उन कपड़ों को पहन कर वे सब बहुत खुश हुए और नाचने लगे पर वे अब अपनी भूख के लिये क्या करें।

अब बूट्स ने अपना मेजपोश निकाला और उसे बिछा दिया। अब क्या था नाम लेते ही मेजपोश पर तरह तरह के स्वाददार खानों का ढेर लग गया।

भिखारियों ने ऐसा खाना कभी ज़िन्दगी में नहीं देखा था। उन्होंने खूब खाया और खूब खिलाया। ऐसी दावत तो राजा के महल में भी शायद कभी नहीं हुई होगी जैसी उन भिखारियों के टापू पर हो रही थी।

“अब तुम्हें प्यास भी लग रही होगी, सो लो जो चाहो पियो। ” कह कर बूट्स ने अपनी लकड़ी की टोंटी निकाली और उसे खोल दिया। तरह तरह की शराब उसमें से निकलने लगी।

इस प्रकार भिखारियों ने बूट्स की मेहरबानी से वह सब कुछ पाया जो किसी राजा को भी नसीब होना मुश्किल था। क्या तुम सोच सकते हो कि यह सब कुछ देख कर वहाँ क्या खुशियाँ मनायीं जा रही होंगी?

अगली सुबह राजा के नौकर भिखारियों के लिये खाना ले कर आये। वे दलिया आदि की खुरचनें, कुछ पनीर के टुकड़े और डबल रोटी के सूखे टुकड़े लाये थे। लेकिन आज भिखारियों ने उनको छुआ तक नहीं।

यह देख कर राजा के नौकरों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि जिस खाने के ऊपर वे रोज टूट पड़ते थे आज वे उसको छूने भी नहीं आये।

लेकिन इससे भी ज्यादा आश्चर्य उन्हें तब हुआ जब उन्होंने देखा कि सारे भिखारी राजकुमारों जैसे शाही कपड़े पहने हुए हैं। राजा के नौकरों को लगा कि वे शायद किसी गलत टापू पर आ गये हैं। पर नहीं, यह तो वही टापू था जिस पर वे रोज आते थे।

फिर उन्होंने सोचा कि शायद यह कल वाले भिखारी की करामात रही हो। पर यह सब उसने कैसे किया होगा यह उनके दिमाग में नहीं आया। वे महल लौट गये और उन्होंने टापू के बारे में कई सारी बातें राजा को बतायीं।

एक बोला — “उनको इतना घमंड हो गया है कि उन्होंने आज के खाने को छुआ तक नहीं। ”

दूसरा बोला — “उस कल वाले लड़के ने सबको शाही कपड़े पहनने को दे दिये हैं। टापू पर रहने वालों का कहना है कि उस लड़के के पास एक ऐसी कैंची है जो हवा में चलाने से सिल्क और साटन के कपड़े काटती है। ”

तीसरा बोला — “उनके पास बहुत तरह का खाना और शराब पड़ी थी इसलिये उन्होंने यह खाना छुआ तक नहीं। ”

एक और बोला — “और मैंने तो उस नये भिखारी की जेब में एक टोंटी जैसी चीज़ भी देखी थी। ”

राजा के एक बेटी थी। उसके कानों में भी ये बातें पड़ीं तो उसके मन में इस लड़के को देखने की इच्छा हो आयी कि अगर वह कैंची उसे बेच दे तो वह भी सिल्क और साटन के कपड़े पहन पायेगी।

उसने अपने पिता को चैन नहीं लेने दिया और राजा को उस लड़के को बुलाने के लिये एक आदमी उस टापू पर भेजना ही पड़ा।

जब वह लड़का महल में आया तो राजकुमारी ने देखा कि वह किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था। उसने पूछा क्या यह सच है कि उसके पास जादू की कैंची है?

बूट्स बोला कि हाँ यह सच है कि उसके पास जादू की कैंची है। उसने अपनी जेब से जादू की कैचीं निकाली और हवा में चलाने लगा। सिल्क, साटन और मखमल के कपड़ों के ढेर लग गये, पीले, हरे, गुलाबी, नीले।

राजकुमारी ने कहा — “यह कैंची हमें बेच दो। तुम जो चाहोगे हम तुम्हें वही देंगे। ”

बूट्स ने कहा — “नहीं, मैं इसे नहीं बेच सकता क्योंकि ऐसी कैंची मुझे दोबारा नहीं मिल सकती। ”

जब वे लोग आपस में सौदेबाजी कर रहे थे तो राजकुमारी के साथ भी वही हुआ जो उन तीनों स्त्र्यिों यानी सराय के मालिकों की पत्नियों के साथ हुआ था।

उसे लगा कि इतना सुन्दर लड़का तो उसने पहले कभी देखा ही नहीं था। उसे लगा कि उस लड़के के बाल पीली साटन से भी ज़्यादा पीले हैं, उसकी आँखें नीली मखमल से भी ज़्यादा नीली हैं और उसके गाल गुलाबी सिल्क से भी ज़्यादा गुलाबी हैं।

वह उसको जाने नहीं देना चाहती थी सो उसने सौदा छोड़ कर उससे कैंची देने के लिये प्रार्थना करनी शुरू कर दी जो बूट्स उसको किसी तरह भी देने के लिये राजी नहीं था। उसने उस लड़के से पूछा कि आखिर तुम्हें इसके लिये चाहिये क्या।

बूट्स ने कहा — “मैं अगर एक रात तुम्हारे कमरे के दरवाजे पर फर्श पर सो जाऊँ तो यह कैंची मैं तुम्हें ऐसे ही दे दूँगा। मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा लेकिन अगर तुम्हें मुझसे डर लगे तो तुम अपने भरोसे के दो चौकीदार रख सकती हो और रात भर कमरे में रोशनी भी रहने दे सकती हो। ”

राजकुमारी को इसमें कोई परेशानी नहीं थी। सो बूट्स राजकुमारी के कमरे के दरवाजे के पास फर्श पर रात भर सोया, दो चौकीदार वहाँ रात भर रहे और कमरे में रोशनी रही।

पर राजकुमारी को नींद नहीं आयी क्योंकि वह जब भी अपनी आँखें बन्द करती उसके सामने बूट्स की सूरत नाचने लगती और फिर वह अपनी आँखें खोल लेती। रात भर यही चलता रहा। वह उसे उन सब लड़कों से सुन्दर लग रहा था जो अब तक उससे शादी के उम्मीदवार रह चुके थे।

अगले दिन राजकुमारी ने कैंची ले ली और बूट्स को भिखारियों के टापू पर वापस भेज दिया। अब उसे कैंची से कोई काम नहीं था बस उसके मन में तो बूट्स की सुन्दर सूरत बसी हुई थी।

सो अब उसने उस अच्छे खाने के बारे में सोचा जो उस टापू पर बूट्स ने वहाँ के भिखारियों को दिया था। वह उसकी तह तक भी पहुँचना चाहती थी। सो बूट्स को फिर महल में लाया गया।

जब राजकुमारी ने उन बढ़िया खानों के बारे में उससे पूछा तो उसने उसको मेजपोश के बारे में बताया और साथ में यह भी कहा कि वह उसको बेचेगा नहीं, लेकिन अपनी पुरानी शर्त पर उसको ऐसे ही दे सकता हैं।

राजकुमारी राजी हो गयी और बूट्स पहले दिन की तरह से फिर वैसे ही राजकुमारी के कमरे के दरवाजे के पास फर्श पर सोया।

इस रात राजकुमारी को और भी कम नींद आयी। वह रात भर बूट्स का चेहरा अपनी आँखों के सामने देखती रही और फिर भी उसे रात छोटी लगी। अगले दिन बूट्स ने अपना जादू का मेजपोश राजकुमारी को दे दिया।

राजकुमारी ने राजा से बूट्स को महल में रखने की जिद की तो राजा ने कहा — “किसी चीज़ की कोई हद भी तो होती है, हम इस तरीके से उसे यहाँ नहीं रख सकते। उसे टापू पर जाना ही होगा। ”

और अगले दिन राजकुमारी की इच्छा के खिलाफ उसको फिर उसी टापू पर भेज दिया गया। जाते जाते राजकुमारी से उसने कहा कि उसको उन दो राजकुमारों से अच्छा व्यवहार करना चाहिये जो उनके महल में ठहरे हुए हैं।

अबकी बार राजकुमारी को उसकी शराब की याद आयी तो वह फिर अपने पिता के पास गयी और बोली — “पिता जी, उसके पास अभी एक चीज़ और है जो मेरे पास होनी चाहिये इसलिये मेहरबानी करके उसे एक बार और बुला दीजिये। ”

राजा ने अनमने मन से उसको बुलवा दिया। इस बार जब बूट्स आया तो राजा ने भी उनकी बातें सुनी।

राजकुमारी ने पूछा — “क्या तुम्हारे पास कोई जादुई टोंटी भी है?”

बूट्स ने फिर वही जवाब दिया — “हाँ है। अगर राजा मुझे अपना आधा राज्य भी दे दें तो भी मैं उसे नहीं बेचूँगा पर अगर तुम मुझसे शादी करने को तैयार हो तो मैं तुमको वह ऐसे ही दे सकता हूँ। ”

राजकुमारी मुँह फेर कर हँसी। फिर उसने अपने पिता की ओर देखा। पिता ने भी अपनी बेटी की ओर देखा तो उसको लगा कि उसकी बेटी इस लड़के को प्यार करती थी।

राजा ने बेटी से कहा — “ठीक है, हम तुम्हारी शादी इस लड़के से कर देंगे क्योंकि इसके पास ऐसी चीज़ें हैं जिनकी वजह से वह हमारे जितना ही धनी है। ”

बस फिर क्या था बूट्स और राजकुमारी की शादी हो गयी। राजा ने अपना आधा राज्य उन दोनों को दे दिया। उसके भाइयों को भिखारियों के टापू पर भेज दिया गया। वे वहाँ उस टापू पर धन का क्या करते क्योंकि वहाँ तो खरीदने को कुछ था ही नहीं।

अगर बूट्स ने मेहरबानी करके कोई नाव उन्हें लेने नहीं भेजी होगी तो हमें यकीन है कि वे लोग अभी भी वहीं होंगे। पर हम आशा करते हैं कि बूट्स ने उन्हें जरूर माफ कर दिया होगा।

पर जब तक वहाँ बूट्स का राज्य रहा उसने और उसकी रानी ने फिर किसी और को उस टापू पर नहीं भेजा।