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Pakistan ki Lok Kathayen-1/ पाकिस्तानी लोक कथाएँ-1

झोंपड़ी और महल: पाकिस्तानी लोक-कथा

सिंध के सक्खर नामक शहर में एक धनी मनुष्य रहता था। रहने के लिए उसके पास कई बड़े-बड़े महल थे। उसकी सेवा के लिए उसके पास बहुत से नौकर-चाकर थे। उसके पास किसी चीज की कमी नहीं थी। यदि कभी एक महल से दूसरे महल तक जाना होता था तो वह घोड़े पर चढ़कर जाता था।

एक दिन रात के समय वह धनी अपने एक महल के सामने टहल रहा था कि सामने से एक बूढ़ा आता हुआ दिखाई दिया। बूढ़े के कपड़े फटे हुए थे और वह अपने सिर पर भार उठाए हुए था। धनी मनुष्य को देखकर उसने अपना भार धरती पर फेंक दिया और प्रणाम करता हुआ बोला-“श्रीमान्‌ जी! बहुत थक गया हूं।”

“तो ?”

“यदि आप आज्ञा दें तो आपके यहां रात काट लूं?”

“यह हमारा महल है, धर्मशाला नहीं है।”

“मैं केवल आपकी घुड़साल के बाहर पड़ा रहूंगा। पौ फटते ही चला जाऊंगा।”

“परंतु यहां तुम्हारी देख-भाल कौन करेगा?”

“मुझे किसी चीज की आवश्यकता नहीं है।”

“हमें क्या मालूम कि तुम कौन हो। एक मनुष्य हमें रात-भर तुम्हारा पहरा देने के लिए लगाना होगा।”

“क्यों, महाराज?”

“इसलिए कि रात को तुम कोई वस्तु उठाकर न भाग जाओ ।”

“राम-राम!” इतना कहकर बूढ़े ने । अपने कानों को हाथ लगाए और धनी को नमस्कार करने के बाद उसने अपना भार सिर पर उठा लिया और वह वहां से चल दिया।

रात अंधेरी थी। आकाश में बादल छा रहे थे। कभी-कभी कुछ बूंदा-बांदी भी होने लगती थी। आंधी आने का डर था। बूढ़ा बुरी तरह से थक रहा था। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। चलना कठिन था परंतु धनी मनुष्य के कटु शब्दों ने उसे ऐसा व्यथित किया था कि उसने अब सक्खर नगर के किसी भी शहरी के पास जाकर विश्राम करने का विचार छोड़ दिया। वर्षा जोरों से आ गई। जिस तरह रात का अंधकार बढ़ता जा रहा था उसी तरह बूढ़ा भी अपना भार उठाये हुए आगे ही चला जा रहा था।

कुछ दिनों के बाद वह सिंधी अमीर अपने मित्रों और सेवकों के साथ शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। शिकार खेलते समय उसने अपना घोड़ा एक हिरण के पीछे लगा दिया। बहुत यत्न करने पर भी वह शिकार उसके हाथ नहीं आया। इस दौड़-धूप में वह अपने साथियों से बिछुड़ गया। घने जंगल में घुस जाने पर वह अपने नगर का मार्ग भी भूल गया और घंटों तक जंगल में भटकता रहा। इतने में रात हो गई। आंधी चलने लगी। बादल छा गए। कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो सिंधी अमीर की कुछ भी सहायता करता। बेचारा थककर चूर-चूर हो गया। जब उसे कोई मार्ग नहीं सूझा तो अपने घोड़े की पीठ से नीचे उतरकर वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गया।

आंधी इतने जोरों से बढ़ने लगी कि जंगल के वृक्ष टूट-टूटकर गिरने लगे। तूफान के कारण अंधेरा बढ़ने लगा। हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता था। प्रकृति के इस प्रकोप से घबराकर घोड़ा अपने बचाव के लिए इधर-उधर भागने लगा। घोड़े का मालिक इतना थका हुआ था कि उसे कोई होश ही नहीं था।

थोड़ी देर के बाद आंधी शांत हो गई। थोड़ी-थोड़ी वर्षा होने से चारों ओर की फैली हुई धूल बैठ गई। आकाश कुछ-कुछ साफ हो गया। सूर्य अभी छिपा नहीं था। उसकी धीमी-धीमी किरणों के प्रकाश में सिंधी अमीर ने देखा कि उसका घोड़ा भी उससे जुदा हो गया था। वह घोड़ा उसने दो हजार रुपए में खरीदा था और बहुत चाव से पाला था। अब तो उस अमीर को घर पहुंचने की कोई आशा ही नहीं थी।

कहते हैं कि सवेरा होने के आस-पास रात का अंधकार बहुत बढ़ जाता है। इसी तरह आशा और सुख की किरणों के पहुंचने से पहले निराशा और दुःख का अंधेरा भी बहुत अधिक होता है। बहुत अधिक दुःखी और निराश हो जाने पर उस सिंधी अमीर को दूर से एक व्यक्ति आता हुआ दिखाई दिया। पहले तो वह डर गया कि कहीं कोई चोर या डाकू न हो, परंतु जब उस व्यक्ति ने पास आकर नमस्कार करते हुए अपने होंठों की मुस्कान से धनी मनुष्य के हृदय को शांत कर दिया तो निराश सिंधी को आशा का प्रकाश दिखाई देने लगा। हंसते हुए उस व्यक्ति ने अमीर से पूछा-“आप इतनी घबराहट में क्यों हैं?”

“साथियों के बिछुड़नें से, राह भटकने से और किसी सहायक के न मिलने से ।” ऐसा कहते-कहते अमीर ने अपनी सारी कथा सुना दी।

निस्सहाय अमीर की करुणाजनक कहानी सुनकर उस व्यक्ति को उस पर दया आ गई। वह उसे अपनी झोंपड़ी में ले गया। वहां जाकर वह बोला-”यहां मैं अपने बूढ़े पिता के साथ रहता हूं। जो रूखा-सूखा भोजन हम खाते हैं वह आप भी खायें, और फिर विश्राम करें।”

“परंतु मेरे घोड़े का क्या होगा?” अमीर ने घबराते हुए पूछा।

“सुबह होने से पहले ही मैं आपके घोड़े को भी ढूंढ लाऊंगा।” वह व्यक्ति बोला।

“कैसे ?”

“मैं इस जंगल के कोने-कोने से परिचित हूं।”

“तो क्याज तुम मेरे साथियों को भी ढूंढ सकोगे?”

“यदि वे इस जंगल में हुए तो मैं उन्हें अवश्य ढूंढ निकालूंगा ।”

इस उत्तर से सिंधी अमीर को बहुत संतोष हुआ। अब वह निश्चित होकर लेट गया। अभी वह सोया नहीं था कि उस व्यक्ति ने अमीर के सामने दूध का कटोरा लाकर रख दिया।

“यह क्या है, महाशय?”’ अमीर ने पूछा।

उत्तर मिला, “हमारी बकरी का दूध ।”

“तुम्हारे पास कितनी बकरियां हैं?

“केवल एक ।”

“क्या एक बकरी इतना अधिक दूध दे सकती है?”

“यह एक सेर से अधिक नहीं होगा ।”

“तुम भी पियो।”

“पिताजी ने कहा है कि आज का दूध केवल अतिथि-सेवा में ही लगाया जा सकता है। आज हम लोग दूध नहीं पियेंगे।”

“क्यों ?”

“हमारे यहां सबसे बढ़िया चीज दूध और पूत को समझा जाता है। अतिथि की सेवा में हम लोग इन दोनों वस्तुओं को पेश कर देते हैं। मैं पिताजी का इकलौता पुत्र हूं, और दूध हमारे यहां सर्वोत्तम भोजन समझा जाता है। पिताजी ने ये दोनों वस्तुएं आपकी सेवा में भेज दी हैं।”

“तुम सचमुच देवता हो ।”

“नहीं साहब! देवता तो बहुत दूर की चीज है, हम तो पूरी तरह मानवता को भी नहीं अपना सके ।”

“नहीं भैया! मानवता तो आप लोगों में कूट-कूटकर भरी हुई है।”

इस तरह बातें करते-करते सिंधी अमीर सो गया।

अपने अतिथि की सच्ची सेवा करने वाला वह व्यक्ति चुपके से उठा और हाथ में मशाल लेकर अपने अतिथि का घोड़ा ढूंढ़ने के लिए चल दिया।

पौ फटने के समय के आस-पास वह अपने अतिथि का घोड़ा लेकर अपनी झोंपड़ी पर लौटा। उसकी माता ने जब देखा कि अतिथि का घोड़ा मिल गया है तो वह उठकर घोड़े के लिए दाना दलने लगी। वह जानती थी कि घोड़ा जंगल में घास चरकर आया होगा परंतु फिर भी उसने अतिथि के थोड़े की सेवा करना अपना कर्त्तव्य समझा।

घोड़े को यदि दाना न मिलता तो शायद अतिथि-सेवा अधूरी समझी जाती।

प्रातःकाल जब सिंधी अमीर सोकर उठा तो उसने देखा कि उसका घोड़ा दाना खा रहा था और अतिथि-सेवक किसान उसके सामने हाथ जोड़े हुए कह रहा था- “आज ईश्वर ने हमारी लाज रख ली।”

“कैसे ?” अमीर ने पूछा।

“आपका घोड़ा सकुशल मिल गया। यदि वह सामने की ओर निकल गया होता तो शायद बाघ उसे अपना शिकार बना लेता।”

यह सुनकर अमीर ने उस व्यक्ति को बड़ा धन्यवाद दिया। इसी समय उस व्यक्ति की वृद्ध माता ने अतिथि के लिए दूध का एक कटोरा भरकर भेज दिया।

दूध पी लेने के बाद अमीर ने घर लौटने की इच्छा प्रकट करते हुए कहा-“मैं तुम्हारे पिता से मिलना चाहता हूं।”

नवयुवक अपने पिता को बुलाने गया और कहने लगा-“पिताजी, अतिथि महाशय आपको याद कर रहे हैं।”

“किसलिए?” पिता ने पूछा।

“वे जाना चाहते हैं।”

“उनसे कहो कुछ दिन और ठहरें।”

“मैंने कहा था परंतु वे मानते नहीं।”

“अच्छा तो उन्हें सक्खर शहर तक छोड़ आओ।”

“जाने से पहले वे आपके दर्शन करना चाहते हैं।”

“बेटा! अच्छा तो यही होगा कि मैं उनसे न मिलूं।”

पिता की यह बात सुनकर पुत्र को कुछ आश्चर्य हुआ। उसने अपने पिता के सामने मुख से कभी ‘क्यों’ का शब्द नहीं बोला था। अतः वह पिता को इस प्रकार देखने लगा मानो उसकी आंखों में ‘क्यों’ का शब्द लिखा हो। वृद्ध पिता ने पुत्र के इस प्रश्न को पढ़ लिया और उसे धीरे से समझाते हुए बोला-“तुम शायद यही पूछना चाहते हो कि मैं अतिथि से इस प्रकार दूर रहकर उसका निरादर क्यों  कर रहा हूं। असल में मेरी इस बात में भी अतिथि-सत्कार का भाव भरा हुआ है।”

“मैं इस अनादर में आदर की भावना को समझ नहीं सका, पिताजी!”

“समझाऊं भी कैसे?”

“ऐसी कौन-सी कठिन बात है जो मुझे न समझा सकें।”

“यूं ही एक व्यर्थ-सी घटना है जिसे मैं बताना नहीं चाहता।”

“अच्छा तो मैं अतिथि महोदय से आपके बारे में क्या कहूं?”

“यही कि पिताजी बूढ़े भी हैं और रोगी भी। वे चल-फिर नहीं सकते। अतः उनका बाहर आना कठिन है।”

पुत्र ने अपने पिता का संदेश सिंधी अमीर तक पहुंचा दिया। यह बात सुनकर अमीर बोला-“इस पवित्र स्थान पर आकर मैं ऐसे महात्मा को देखे बिना कैसे जाऊं जिसके घर में भूले-भटकों को मार्ग दिखाया जाता है, जहां अतिथि की सेवा जी-जान से की जाती है, जहां अपरिचित अतिथि के घोड़े को ढूंढने के लिए घरवाले अपनी जान संकट में डाल सकते हैं, और जहां गृहिणी अपना खान-पान उठाकर अतिथि के घोड़े का पेट भरने के लिए तैयार रहती है। तुम्हारे पिता को देखकर ही मेरा जीवन सफल हो सकता है।”

पुत्र ने अतिथि का संदेश पिता से कह सुनाया। अब वृद्ध क्या करता! उसे अतिथि के सामने आना ही पड़ा।

सिंधी अमीर ने जब उसे देखा तो उसी समय पहचान गया कि यह तो वही बूढ़ा है जो कुछ दिन हुए सक्खर में उसके महलों के सामने बोझ उठाए हुए आया था। एक रात के लिए वह आश्रय मांगता था। अमीर ने उसे चोर तक कह दिया था। कितनी दानवता थी उस दुर्व्यवहार में! इस वृद्ध के पुत्र ने अपनी मानवता का परिचय देकर सिंधी अमीर के हृदय को बिलकुल ही बदल दिया। सिंधी अमीर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और अपने दुर्व्यवहार के लिए क्षमा-याचना करने लगा।

वृद्ध ने कहा-“आपकी ओर से क्षमा-याचना का प्रश्न पैदा ही नहीं होता, क्योंकि मैं बाहर आकर आपको उस पुरानी घटना की याद दिलाना नहीं चाहता था। आपके आग्रह को मैं टाल भी नहीं सका। इसीलिए मुझे यहां आना पड़ा। इससे शायद आपको दुःख हुआ हो। अतः मुझे आपसे क्षमा मांगनी चाहिए ।”

“कितना ऊंचा है आपका व्यक्तित्व!” यह कहकर सिंधी अमीर वृद्ध के चरणों में गिर पड़ा। उसके नेत्रों से पश्चाताप के आंसू गिर रहे थे। उसके होंठ फड़फड़ा रहे थे, मानो वह यही कह रहा हो-“इस बूढ़े की झोपड़ी महलों से बहुत ऊंची है क्योंकि यहां मानवता का निवास है।”

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Peru ki Lok Kathayen-1/ पेरू की लोक कथाएँ-1

मन का जादू: पेरू की लोक-कथा

बहुत पुरानी कहानी है। तब पेरू में एक शक्तिशाली राजा राज्य करता था। उसका साम्राज्य दूर-दूर तक फैला हुआ था। राजा के सन्देश लाने-ले जाने के लिए दरबार में सन्देशवाहकों की एक पूरी टोली काम करती थी।

हुलाची नाम का व्यक्ति उस टुकड़ी का मुखिया था। राजा हुलाची पर बहुत विश्वास करता था। अगर राजा को कोई अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और गुप्त सन्देश भेजना होता हो वह हुलाची को ही सौंपता था।

हुलाची बहुत वीर और दयालु स्वभाव का था। शुरू-शुरू में तो सब ठीक-ठाक चला, लेकिन अब उसका स्वभाव ही उसके रास्ते का रोड़ा बनने लगा। हुलाची किसी को दुःखी नहीं देख सकता था। अगर वह रास्ते में किसी दीन-दुःखी को देखता, तो सारा काम-काज छोड़कर उसकी देखभाल में जुट जाता। उस समय वह बिल्कुल भूल जाता था कि राजा ने उसे एक महत्त्वपूर्ण सन्देश देकर भेजा है, जिसे तुरन्त पहुंचाना है। कई बार इस कारण से राजा के सन्देश विलम्ब से पहुंचते। इससे कभी-कभी नुक्सान भी हो जाता।

राजा को पता चला तो वह बहुत गुस्सा हुआ। उसने हुलाची को खूब डांटा-फटकारा। चेतावनी दी कि अगर अब कभी सन्देश विलम्ब से पहुंचा तो उसे कड़ा दण्ड दिया जाएगा।

हुलाची सिर झुकाए सुनता रहा । लेकिन वह अपना स्वभाव न बदल सका। एक बार वह राजा का सन्देश लेकर जा रहा था तो उसने एक व्यक्ति को बेहोश पड़े देखा । वह वहां रुकने को हुआ, लेकिन तभी उसे राजा की चेतावनी याद हो आयी । वह मन मारकर आगे बढ़ गया। पर सारे रास्ते उसका मन उसे कचोटता रहा।

एक बार हुलाची सन्देश लेकर पहाड़ी रास्ते से जा रहा था। आकाश में बादल घिरे थे, वर्षा हो रही थी। तभी उसने एक बुढ़िया को फिसलकर गिरते देखा। उसने झट दौड़कर बुढ़िया को पकड़ लिया। अगर हुलाची समय पर वहां न पहुंच जाता तो बुढ़िया हज़ारों फीट गहरी खाई में गिर जाती।

लेकिन फिर भी बुढ़िया को काफी चोट आयी थी। पत्थर से टकराकर उसका सिर फट गया था और खून बह रहा था। बुढ़िया बेहोश हो गई थी।

हुलाची धर्म-संकट में पड़ गया। अगर बुढ़िया की देखभाल करता है तो सन्देश पहुंचने में विलम्ब हो जाएगा, राजा क्रोधित होंगे। और अगर सन्देश देने जाता है तो देखभाल न होने से न जाने बुढ़िया की क्या दशा हो। वहां कोई था भी नहीं, जिसे हुलाची बुढ़िया की देखभाल के लिए छोड़ जाता। हुलाची सोचता रहा, सोचता रहा। आखिर उसने निर्णय लिया कि चाहे जो हो, वह बुढ़िया के स्वस्थ होने के बाद ही आगे जाएगा।

हुलाची ने वहीं बुढ़िया के लिए एक झोंपड़ा बनाया। उसकी मरहमपट्टी की और जब वह ठीक हो गई तो उसे एक गांव में छोड़कर आगे बढ़ चला। बुढ़िया ने हुलाची को खूब आशीर्वाद दिए।

सन्देश पहुंचने में बहुत देर हो गई थी। हुलाची समझ गया कि राजा इस बार अवश्य दण्ड देंगे। और यही हुआ भी। जब राजा को पता चला तो उसने हुलाची को न सिर्फ नौकरी से हटा दिया बल्कि अपना राज्य छोड़कर चले जाने का भी आदेश दिया।

बेचारा हुलाची क्या करता! वह चुपचाप राज्य छोड़कर चला गया। वह सारा दिन इधर-उधर फिरता रहता। जंगली फल-फूल खाकर पेट भरता। कहीं किसी दीन-दुःखी को देखता, या घायल जानवर पर नजर पड़ती, तो सब कुछ भूलकर उसकी सेवा में लग जाता।

लेकिन हमेशा तो ऐसे नहीं चल सकता था। हुलाची को कई-कई दिन खाना न मिलता ।

एक दिन वह जंगल में घूम रहा था। उसने वहां एक झोंपड़ी देखी। शायद कुछ खाने-पीने को मिल जाए, यह सोचकर वह उस ओर बढ़ चला। जैसे ही हुलाची झोंपड़ी के पास पहुंचा, एक बुढ़िया अन्दर से निकली। यह वही बुढ़िया थी, जिसे हुलाची ने खड्ड में गिरने से बचाया था। बुढ़िया भी उसे पहचान गई। वह हुनाची को झोंपड़ी में ले गई और उसे भरपेट भोजन कराया।

खाना खाते समय हुलाची की आंखों में आंसू आ गए। आज न जाने कितने दिन बाद उसने भरपेट भोजन किया था। बुढ़िया ने पूछा तो हुलाची ने सारी कहानी बता दी।

सुनकर बुढ़िया ने एक जोड़ी चप्पल हुलाची को दीं। बोली, “बेटा, इन्हें पहन ले ।”

हुलाची आश्चर्य से बुढ़िया को देखता रहा । बात उसकी समझ में नहीं आयी थी। बुढ़िया हुलाची के मन की बात समझ गई। मुस्करा कर बोली, “बेटा, ये चप्पलें उड़ने वाली हैं। मैं एक जादूगरनी हूं। मैं इतने दिनों से किसी ऐसे आदमी की तलाश में थी, जो निःस्वार्थ भाव से परोपकार करता हो। तू सचमुच बहुत अच्छा इन्सान है। ये चप्पलें तेरे बहुत काम आएंगी। इन्हें पहनकर तू जहां चाहे जा सकेगा। जरा भी देर नहीं लगेगी।”

हुलाची जादुई चप्पलें पहनकर बाहर आया। उसने उड़ने की बात सोची तो सचमुच वह हवा में उड़ने लगा। यह देख वह बहुत प्रसन्नब हुआ और बुढ़िया को धन्यवाद देकर वापस चल दिया।

अब हुलाची फिर राजा के पास पहुंचा। राजा से कहा कि उसे फिर से नौकरी पर रख लिया जाए। अब वह बिल्कुल ठीक-ठीक काम करेगा। राजा हुलाची को अच्छा आदमी समझता था। उसका गुस्सा भी उतर चुका था। उसने हुलाची को फिर से नौकरी पर रख लिया।

हुलाची उन जादुई चप्पलों की मदद से पलक झपकते ही सन्देश यहां से वहां पहुंचा देता था। इससे राजा बहुत खुश हुआ।

एक दिन हुलाची सन्देश लेकर उड़ा जा रहा था। एकाएक उसने नीचे देखा-एक आदमी एक चट्टान पर खून से लथपथ बेहोश पड़ा था। हुलाची आगे न जा सका। उसने वहीं उतरकर उस आदमी की मरहम-पट्टी की, फिर आगे बढ़ा।

इस बार सन्देश पहुंचाने में फिर देर हो गई थी। राजा ने फिर उसे बुरा-भला कहा। हुलाची ने मन-ही-मन निश्चय किया कि वह अपने काम-से-काम रखेगा, किसी ओर नहीं देखेगा और खाली समय में ही दीन-दुखियों की सहायता का काम करेगा।

एक दिन हुलाची एक जंगल से जा रहा था। तभी न जाने क्या  हुआ, उसने देखा वह जमीन पर खड़ा है। वह उड़ते-उड़ते एकाएक धरती पर उतर आया था। हुलाची ने फिर से उड़ने की इच्छा की, लेकिन कई बार इच्छा करने के बाद भी वह उड़ा नहीं। उसी जगह खड़ा रहा। हुलाची ने सोचा, शायद जादुई चप्पलों का प्रभाव जाता रहा। वह खड़ा-खड़ा सोच ही रहा था कि तभी वही बुढ़िया वहां आयी । उसे देखते ही हुलाची ने सब कुछ बता दिया।

सुनकर बुढ़िया ने आश्चर्य से सिर हिला दिया। बोली, “बेटा, ऐसा कभी नहीं हो सकता। ये चप्पलें तो बहुत चमत्कारी हैं। ला, मैं देखूं, क्या बात है।”

बुढ़िया ने चप्पलें स्वयं पहनीं तो वह एकदम आकाश में उड़ने लगी। यह देखकर हुलाची चक्कर में पड़ गया। यह मामला क्या था। उसने बुढ़िया से चप्पलें लेकर पहनी, लेकिन वह नहीं उड़ सका।

फिर तो कई बार ऐसा हुआ। बुढ़िया ने जब भी चप्पलें पहनीं वह आकाश में उड़ने लगी और हुलाची उड़ने में सफल नहीं हुआ।

यह देख बुढ़िया बोली, “बात मेरी समझ में नहीं आ रही है कि यह रहस्य क्याा है?”

तभी हुलाची की नजर सामने गई। उसने देखा, एक गाड़ी के नीचे एक घायल कबूतर पड़ा हुआ है। वह दौड़कर वहां पहुंचा। उसने कबूतर की मरहम-पट्टी कर दी।

और इस बार जब उसने चप्पलें पहनीं तो वह एकदम आकाश में उड़ गया।

हुलाची तुरन्त नीचे उतर आया। उसने चप्पलें बुढ़िया के सामने रख दीं।

बोला, “अम्मा, ये उड़ने वाली चप्पलें तुम्हें ही मुबारक हों।”

“क्यों , बेटा ?” बुढ़िया ने पूछा।

“अब मैं समझ गया हूँ कि मैं पहले क्यों  नहीं उड़ पा रहा था और अब कैसे उड़ सका। असल में चप्पलें तो ठीक हैं। खराबी मेरे मन में ही है।” हुलाची ने कहा।

बुढ़िया चुपचाप उसकी बात सुन रही थी।

हुलाची कहता गया, “सामने घायल कबूतर पड़ा था और मैं उसे छोड़कर उड़ जाना चाहता था। इसलिए मेरे मन ने मुझे रोक दिया। तेरी जादुई चप्पलें भी मन के सामने बेबस हो गईं। मेरा मन उस घायल कबूतर की आवाज़ सुन रहा था। यही कारण था कि कबूतर के ठीक होते ही चप्पलों का जादू वापस आ गया। इसलिए मैं तो इनके बिना ही ठीक हूं। आज मैं समझ गया हूं कि मुझे क्या करना चाहिए। मैं वही करूंगा। और उस काम के लिए मुझे इन जादुई चप्पलों की कोई आवश्यकता नहीं है।”

सुनकर बुढ़िया हँस पड़ी। बोली, “बेटा, तूने ठीक कहा। मन के जादू के सामने हर जादू बेकार है। तू दीन-दुखियों की सेवा कर। उसी जादू से तुझे सुख मिलेगा ।”

बस, उस दिन से हुलाची ने सारे काम छोड़ दिए। वह दीन-दुखियों की सेवा करता हुआ घूमने लगा। कहते हैं हुलाची आज भी अमर है।

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Tibet ki Lok Kathayen-1/ तिब्बत की लोक कथाएँ-1

कहानी-मेंढ़क राजकुमार: तिब्बती लोक कथा

बहुत दिन हुए किसी ऊँचे पर्वत की चोटी पर एक गरीब दम्पत्ति रहते थे। रोटी कमाने के लिए वे आलू, टमाटर आदि की खेती किया करते थे। पहाड़ी से उतरकर निचले मैदानों में उन्होंने अपनी खेती बना रखी थी। दोनों पति-पत्नी बड़े ही परिश्रमी थे।

धीरे-धीरे उनकी उमर ढलती जा रही थी और शक्ति कम होती जा रही थी। संतान के लिए उन दोनों की बड़ी इच्छा थी। एक दिन दोनों आपस में बातें कर रहे थे।

‘‘कितना अच्छा होता अगर हमारे भी एक बच्चा होता। जब हम बूढ़े हो जायेंगे तो वह हमारे खेतों की रखवाली किया करता और ज़मींदार के पास जाकर हमारा लगान चुका आया करता। बुढ़ापे में वह हमें हर तरह से आराम देता। हम भी अपनी झुकी हुई कमर को कुछ देर आंगन में चूल्हे के पास आराम से बैठकर सीधी कर लिया करते।’’

उन दोनों ने सच्चे दिल से नदी और पहाड़ों के देवता की प्रार्थना की। थोड़े दिनों बाद ही किसान की पत्नी गर्भवती हुई। नौ महीने बाद उसके बच्चा हुआ। लेकिन बच्चा आदमी का न होकर एक मेंढ़क था और उसकी लाल आँखें चमक रही थीं। बूढ़े ने कहा-‘‘कैसे आश्चर्य की बात है ! यह मेंढ़क है। इसकी लाल आँखें तो देखो, कैसी चमक रही हैं ! इसे घर में रखने से क्या फायदा ? चलो, इसे बाहर फेंक आएं।’’

लेकिन पत्नी का मन उसे फेंक देने को न हुआ। उसने कहा-‘‘भगवान हम पर कृपालू नहीं हैं। उसने हमें बच्चे की जगह एक मेंढ़क दिया है। लेकिन अब तो यही मेंढ़क हमारा बच्चा है इसलिए हमें इसको फेंकना नहीं चाहिए। मेंढ़क मिट्टी और तालाबों में रहते हैं। हमारे घर के पीछे जो जोहड़ है, उसमें इसे छोड़ आओ। वहीं रह जाया करेगा।’’

बूढ़े ने मेंढ़क को उठा लिया। जब वह उसे ले जाने लगा तो मेंढ़क बोला-‘‘माताजी, पिताजी, मुझे तालाब में मत डालिए। मैं आदमियों के घर में पैदा हुआ हूं, और मुझे आदमियों की तरह ही रहना चाहिए। जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो मेरी शक्ल बिलकुल आप जैसी हो जाएगी और मैं भी आदमी बन जाऊंगा।’’

बूढ़ा आश्चर्यचकित हो गया। उसने अपनी पत्नी से कहा-‘‘कैसी अद्भुत बात है ! यह तो बिलकुल हमारी तरह से बोलता है।’’

‘‘लेकिन जो कुछ भी उसने कहा है हमारे लिए तो वह अच्छा ही है।’’ उसकी पत्नी ने कहा, ‘‘भगवान ने ज्यों-त्यों करके तो हमें ये दिन दिखाए हैं। अगर यह बोलता है तो जरूर कोई अच्छा बच्चा होगा। हो सकता है कि इस समय किसी के शाप से मेंढ़क बन गया हो। नहीं, इसे आप घर में ही रहने दीजिए।’’ वे दोनों पति-पत्नी बड़े दयालू थे और उन्होंने मेंढ़क को अपने साथ ही रख लिया।

तीन वर्ष बीत गए। इस बीच मेंढ़क ने देखा कि उसके माता-पिता कितनी मेहनत करते थे। एक दिन उसने अपनी बूढ़ी माँ से कहा-‘माँ, मेरे लिए आटे की एक रोटी सेक दो। मैं कल जमींदार के पास जाऊंगा और उसके सुंदर महल में जाकर उससे मिलूँगा। उसके तीन सुंदर बेटियां हैं। उससे कहूंगा कि वह अपनी एक बेटी के शादी मुझसे कर दे। मैं उन तीनों में से उससे शादी करूंगा, जो सबसे अधिक दयावान हो और तुम्हारे काम में सबसे ज्यादा मदद कर सके।’’

‘‘बेटे, ऐसी मज़ाक की बात मत किया करो।’’ बूढ़ी ने कहा, ‘‘क्या तुम समझते हो कि तुम्हारे जैसे छोटे और भद्दे जानवर के साथ में कोई भला आदमी अपनी सुंदर-सी बेटी का हाथ पकड़ा देगा। तुम जैसे को तो कोई भी पैर से दबाकर कुचल देगा।’’

‘‘मां, तुम रोटी तो बनाओ।’’ मेंढ़क ने कहा, ‘‘तुम देखती रहना मैं तुम्हारे लिए एक बहू ज़रूर लाऊंगा।’’

बूढ़ी स्त्री अंत में राजी हो गई।

‘‘अच्छा, मैं तुम्हारे लिए एक रोटी तो सेक दूंगी।’’ उसने मेंढ़क से कहा, ‘‘लेकिन इस बात का ख्याल रखना कि उसके महल की कहारी या नौकरानी तुम्हें भूत-प्रेत समझकर तुम्हारे ऊपर राख न डाल दे।’’

‘‘मां, तुम बेफिक्र रहो।’’ मेंढ़क ने उत्तर में कहा, ‘‘उनके तो अच्छों की भी यह हिम्मत नहीं !’’

और अगले दिन बूढ़ी स्त्री ने एक बड़ी-सी रोटी बना दी और उसे एक थैली में रख दिया। मेंढ़क ने थैला अपने कंधे पर लटकाया और फुदकता हुआ घाटी के किनारे बसे हुए जमींदार के महल की ओर चल दिया। जब वह महल के दरवाज़े के पास पहुँचा तो उसने द्वार खटखटाया।

‘‘ज़मींदार साहब, ज़मींदार साहब, दरवाज़ा खोलो।’’

ज़मींदार ने किसी को दरवाज़ा खटखटाते सुना और अपने नौकर को बाहर देखने भेजा। नौकर आश्चर्यचकित-सा होकर लौटा। उसने कहा-‘‘मालिक, बड़ी अजीब-सी बात है। एक छोटा-सा मेंढ़क दरवाज़े पर खड़ा आपको पुकार रहा है।’’

ज़मींदार के मुंशी ने कहा-‘‘मालिक, यह ज़रूर कोई भूत-प्रेत है। इस पर राख डलवा दीजिए।’’

ज़मींदार राजी नहीं हुआ। उसने कहा-‘‘नहीं, नहीं, रुको। यह ज़रूरी नहीं कि वह कोई भूत-प्रेत ही हो। मेंढ़क पानी में रहते हैं। हो सकता है कि वह जल-देवता के महल से कोई संदेशा लेकर आया हो। जिस प्रकार देवताओं की आवभगत की जाती है, उसी प्रकार उसकी करो। पहले उस पर दूध छिड़क दो। इसके बाद मैं खुद देखूंगा कि वह कौन है और मेरे राज्य में किसलिए आया है।’’

उसके नौकरों ने ऐसा ही किया। मेंढ़क की उसी प्रकार इज्ज़त की गई जैसी देवताओं की की जाती है। उन्होंने उस पर दूध छिड़का और कुछ दूध उसके ऊपर हवा में भी उड़ाया।

उसके बाद ज़मींदार खुद दरवाजे पर आ गया और उसने पूछा-‘‘मेंढ़क देवता, क्या तुम जल-देवता के महल से आ रहे हो ? तुम्हारी हम क्या सेवा कर सकते हैं ?’’

‘‘मैं जल-देवता के महल से नहीं आ रहा।’’ मेंढ़क ने उत्तर दिया, ‘‘मैं तो अपनी ही इच्छा से आपके पास आया हूं। आपकी सब लड़कियां विवाह योग्य हैं। मैं उनमें से एक से शादी करना चाहता हूं। मैं आपका दामाद बनने आया हूं। आप मुझे उनमें से किसी एक का हाथ पकड़ा दीजिए।’’

ज़मींदार और उसके सब नौकर मेंढ़क की इस बात को सुनकर बड़े भयभीत हुए। ज़मींदार बोला-‘‘तुम कैसी बे-सिर-पैर की बातें कर रहे हो ? आइने में ज़रा अपनी सूरत तो देखो। कितने भद्दे और बदसूरत हो ! कितने ही बड़े-बड़े ज़मींदारों ने मेरी बेटियों से विवाह करना चाहा लेकिन मैंने सबको मना कर दिया। फिर मैं कैसे एक मेंढ़क को अपनी बेटी ब्याह दूं। जाओ, बेकार की बातें मत करो।’’

‘‘ओ हो !’’ मेंढ़क बोला, ‘‘इसका मतलब यह है कि आप मुझसे अपनी बेटी की शादी नहीं करेंगे। कोई बात नहीं। अगर आप मेरी बात इस तरह नहीं मानेंगे तो मैं हंसना शुरू कर दूंगा।’’

ज़मींदार मेंढ़क की बात सुनकर गुस्से में आगबबूला हो गया।

उसने पैर पटककर कहा-‘‘मेंढ़क के बच्चे ! तेरा दिमाग खराब हो गया है ! अगर हंसना ही है तो बाहर निकल जा और जी-भरकर हंस।’’

लेकिन तब तक मेंढ़क ने हँसना आरंभ कर दिया था। उसके हंसने से बड़े ज़ोर की आवाज़ हुई। धरती कांपने लगी। ज़मींदार के महल के ऊंचे-ऊंचे स्तम्भ हिलने लगे मानो महल गिरना ही चाहता हो। दीवारों में दरारें पड़ने लगीं। सारे आकाश में धूल-रेत, मिट्टी, कंकड़ और पत्थर उड़ने लगीं। सूरज और सारा आकाश अंधेरे से ढक गया। चारों ओर धूल-ही-धूल दिखाई देने लगी।

ज़मींदार के घर के सब लोग और नौकर-चाकर उछलते फिर रहे थे और अंधेरे में एक-दूसरे से टकरा रहे थे। किसी को नहीं मालूम था कि वे क्या कर रहे हैं और यह सब क्या हो रहा है।

अंत में दुःखी होकर ज़मींदार ने खिड़की से बाहर अपना सिर निकाला और बोला-‘‘मेंढ़क महाशय, अब कृपा कर अपना हंसना बंद कर दीजिए। मैं अपनी सबसे बड़ी बेटी का ब्याह आपके साथ कर दूंगा।

मेंढ़क ने हंसना बंद कर दिया। धीरे-धीरे पृथ्वी ने भी कंपना बंद कर दिया और महल, मकान आदि सब अपनी जगह स्थिर हो गए।

ज़मींदार ने केवल भयभीत होकर ही अपनी बेटी मेंढ़क के हाथों सौंपी थी। उसने दो घोड़े मंगाये—एक अपनी बेटी के लिए और दूसरा उसके दहेज के लिए।

ज़मींदार की बड़ी लड़की मेंढ़क से शादी करने के लिए बिलकुल भी राजी नहीं थी। उसने अपने पास छिपाकर दो पत्थर के टुकड़े रख लिए जो समय पर काम आएं।

मेंढ़क रास्ता दिखाने के लिए आगे-आगे फुदककर चलने लगा और ज़मींदार की सबसे बड़ी लड़की उसके पीछे-पीछे चलने लगी। सारे रास्ते वह यही कोशिश करती रही कि उसका घोड़ा कुछ और तेज चले और वह भागते हुए मेंढ़क को अपने पीछे की टापों के नीचे कुचल डाले। लेकिन मेंढ़क कभी इधर को फुदकता था और कभी उधर को। वह इस तरह चक्कर काटता जा रहा था कि उसे कुचलना राजकुमारी को असंभव दिखाई दे रहा था। अंत में वह इतनी नाराज हो गई कि एक बार जब मेढ़क उसके काफी पास चल रहा था, उसने छिपाया हुआ पत्थर का टुकड़ा मेंढ़क के ऊपर दे मारा। फिर वह मुड़कर घर की ओर चल दी। वह कुछ ही दूर लौटकर गई होगी कि मेंढ़क ने उसे पुकारा—

‘‘राजकुमारी, रुको। मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं।’’

‘‘उसने पीछे घूमकर देखा कि मेंढ़क तो ज़िंदा खड़ा है।

वह समझ रही थी कि मेंढ़क उसके पत्थर के नीचे कुचल गया होगा। वह आश्चर्यचकित रह गई और उसने घोड़े की लगाम खींच ली। मेंढ़क उससे बोला—‘‘देखो, हमारे भाग्य में पति-पत्नी होना नहीं लिखा है। अब तुम घर लौट जाओ क्योंकि ऐसी ही तुम्हारी खुशी है।’’ और उसने घोड़े की लगाम पकड़ ली और राजकुमारी को घर वापस ले चला।

जब दोनों ज़मींदार के महल के पास पहुँचे तो मेंढ़क ने राजकुमारी को छोड़ दिया और आप ज़मींदार के पास जाकर बोला-‘‘ज़मींदार साहब, हम दोनों की आपस में जरा नहीं बनती। इसीलिए मैं उसे वापस छोड़ने आया हूँ। आप मुझे अपनी दूसरी बेटी दे दीजिए, जो मेरे साथ जाने को तैयार हो।’’

‘‘तुम कैसे बदतमीज़ हो, जी ! जरा अपनी हैसियत का तो ख्याल करो।’’

ज़मींदार ने गुस्से से चिल्लाकर कहा-‘‘तुम मेरी बेटी को वापस लाए हो इसलिए मैं तुम्हें अपनी दूसरी बेटी कभी नहीं दूंगा। जानते हो, मैं ज़मींदार हूं। क्या मज़ाक है ! तुम इस तरह मेरी बेटियों में से हरेक को देखना चाहते हो।’’ ज़मींदार यह कहते-कहते गुस्से से कांपने लगा।

‘‘इसका मतलब यह है कि आप राज़ी नहीं हैं !’’ मेंढ़क ने कहा, ‘‘अच्छी बात है, तो मैं चिल्लाता हूं।’’

ज़मींदार ने सोचा कि अगर वह चिल्लाता है तो कोई हर्ज नहीं। बस, उसका तो हंसना ही खतरनाक है। उसने चिढ़ाते हुए कहा-‘‘जी भरकर चिल्लाओ। तुम्हारी ज़रा-ज़रा-सी धमकियों से डर जाने वाले हम नहीं हैं।’’

और मेंढ़क ने चिल्लाना शुरू कर दिया। उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी मानो रात के समय बड़ी जोर से बिजली कड़क रही हो। चारों ओर बिजली की कड़कड़ाहट-ही-कड़कड़ाहट सुनाई दे रही थी और पहाड़ों से नदियों में इतना अधिक पानी आने लगा कि कुछ ही क्षणों में सब नदियों में बाढ़ आ गई। धीरे-धीरे सारी ज़मीन पानी के बहाव में घिरने लगी और पानी चढ़ता-चढ़ता ज़मींदार के महल तक आ पहुंचा और वहां से अपने गांव की तबाही देखने लगे।

पानी चढ़ता ही जा रहा था। ज़मींदार ने अपनी गर्दन खिड़की से बाहर निकाली और चिल्लाकर कहा-‘‘मेंढ़क महाशय, चिल्लाना बंद कीजिए, नहीं तो हम सब मर जायेंगे। मैं तुम्हारे साथ अपनी दूसरी बेटी की शादी कर दूंगा।’’

मेंढ़क ने फौरन ही चिल्लाना बंद कर दिया और धीरे-धीरे पानी नीचे बैठने लगा।

ज़मींदार ने फिर अपने नौकरों को आदेश दिया कि दो घोड़े अस्तबल से निकालकर लाओ—एक राजकुमारी के लिए और दूसरा उसके दहेज के सामान के लिए। इसके बाद उसने अपनी दूसरी बेटी को आज्ञा दी कि मेंढ़क से साथ चली जाए।

ज़मींदार की दूसरी बेटी मेंढ़क के साथ जाने को राजी नहीं थी। उसने भी घोड़े पर चढ़ते समय एक बड़ा-सा पत्थर अपने पास छिपाकर रख लिया। रास्ते में उसने भी अपने घोड़े के पैरों के नीचे मेंढ़क को कुचलने की कोशिश की और एक बार वह पत्थर उसके ऊपर फेंककर वह भी बड़ी राजकुमारी की तरह वापस लौटने लगी।

लेकिन उसे भी वापस बुलाकर मेंढ़क ने कहा-‘‘राजकुमारी, हम दोनों के भाग्य में एक साथ रहना नहीं बदा। तुम घर वापस जा सकती हो।’’ यह कहकर उसके घोड़े की लगाम हाथ में लेकर वह चल दिया।

मेंढ़क ने ज़मींदार के हाथ में उसकी मंझली बेटी का हाथ पकड़ा दिया और बोला कि अपनी सबसे छोटी बेटी की शादी मुझसे कर दो। इस बार तो ज़मींदार के क्रोध का ठिकाना ही न रहा। उसने कहा, ‘‘तुमने मेरी सबसे बड़ी लड़की को लौटा दिया और मैंने तुम पर दया करके अपनी मंझली बेटी दे दी। अब तुमने उसे भी लौटा दिया और मेरी सबसे छोटी लड़की के साथ शादी करना चाहते हो। तुम बहुत बेहूदे हो। कोई भी ज़मींदार तुम्हारी इस बदतमीजी को बरदाश्त नहीं कर सकता। तुम…तुम…तुम कानून के खिलाफ चलते हो।’’ उसके गले में आखिरी शब्द अटक गए। एक छोटे-से मेंढ़क ने उसे इस प्रकार नचा रखा था कि वह बहुत ज़्यादा परेशान हो रहा था।

मेंढ़क ने शांति से जवाब दिया-‘‘ज़मींदार साहब, आप इतना नाराज़ क्यों होते हैं ? आपकी दोनों बेटियां मेरे साथ शादी करने के लिए राजी नहीं थीं इसलिए मैं उन्हें वापस ले आया। लेकिन आपकी तीसरी बेटी मुझसे शादी करना चाहती है, फिर आप क्यों नहीं राजी होना चाहते ?’’

‘‘नहीं, कभी नहीं !’’ ज़मींदार घृणा से चिल्लाया, ‘‘कौन कहता है ! वह कभी राजी नहीं हो सकती। इस दुनिया में कोई भी लड़की एक मेंढ़क से शादी करने के लिए राजी नहीं हो सकती। मैं तुमसे आखिरी बार कह रहा हूं कि अब तुम अपनी राह देखो।’’

‘‘इसका मतलब यह है कि आप अपनी बेटी की शादी मुझसे नहीं करेंगे।’’ मेंढ़क ने कहा, ‘‘अच्छी बात है, तो मैं फुदकना शुरू कर दूँगा।’’

ज़मींदार वैसे मेंढ़क की बात से डर तो गया था लेकिन उसने गुस्से में ही उत्तर दिया-‘‘तुम उछलो, कूदो, फुदको। जो जी में आए सो करो। जी-भरकर करो। मैं तुम्हारी ज़रा-ज़रा-सी बातों से डरने लगा तो ज़मींदारी दो दिन की रह जाएगी।’’

और मेंढ़क ने फुदकना शुरू कर दिया। जब उसने फुदकना शुरू किया तो धरती डोलने लगी। ऐसा प्रतीत होता था मानो धरती एक पत्थर हो जो किसी तालाब में लहरों के बीच जा फंसा हो। पहाड़ इतनी ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगे कि उनमें आपस में ही टक्कर होने लगी। पहाड़ों में से पत्थर टूट-टूटकर आकाश में उड़ने लगे। सारा आकाश पत्थरों और धूल-मिट्टी से ढक गया और सूरज दिखाई देना बंद हो गया। ज़मींदार के महल की दीवारें भी इतनी ज़ोर से हिलने लगीं कि लग रहा था कि महल अब गिरा, अब गिरा।

अब तो हारकर ज़रमींदार को खड़े होकर यह कहना पड़ा कि वह मेंढ़क के हाथ में अपनी तीसरी बेटी का हाथ दे देगा। मेंढ़क ने फुदकना बंद कर दिया। पहाड़ और पृथ्वी अपनी-अपनी जगह पर शांत होकर ठहर गए।

ज़र्मीदार की तीसरी बेटी अपनी अन्य बहनों की तरह नहीं थी। उसके हृदय में दया बहुत थी। उसने सोचा कि यह मेंढ़क कोई साधारण मेंढ़क नहीं है, बल्कि काफी चतुर जान पड़ता है। वह मेंढ़क के साथ जाने को राजी हो गई।

मेंढ़क उसे घर ले गया। जब मेंढ़क की मां दरवाज़े पर उन्हें लेने आयी तो उसे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसने सोचा कि मेरा भद्दा और छोटा-सा बेटा कितनी सुंदर बहू ले आया है।

लड़की बहुत काम करने वाली थी और रोज अपनी सास के साथ खेत पर काम करने जाती थी। उसे बूढ़ी इसलिए बड़ा प्रेम करती थी। लड़की भी अपनी सास की बहुत इज्ज़त किया करती थी। दोनों बहुत सुखी थीं।

पतझड़ का मौसम आया। उन गांवों में हर साल घोड़ों की एक बहुत बड़ी दौड़ हुआ करती थी। सैकड़ों गांवों से गरीब और अमीर लोग अपने-अपने तम्बू लेकर घुड़दौड़ में आया करते थे और अपने साथ खेतों से नया फूटा हुआ अनाज भी लाया करते थे। देवताओं को मनाने के लिए वे लोग उन छोटे-छोटे पौधों को आग में जलाया करते थे और नाचते, गाते, शराब पीते हुए घोड़ों की दौड़ किया करते थे। आमतौर पर वहां लड़के-लड़कियां अपने प्रेमी-प्रेमिकाएं ढूंढने आया करते थे। इस बार मेंढ़क की मां की भी इच्छा थी कि मेंढ़क भी साथ में जाए, लेकिन उसने अपनी मां से कहा-“मां रास्ते में बहुत-से पहाड़ और नदी-नाले पार करने पड़ते हैं। तुम ही चले जाओ। मैं कहां-कहां जाऊंगा!”

और मेंढ़क घर पर ही रह गया। घर के और सब लोग घुड़दौड़ में चले गए।

घुड़दौड़ का मेला सात दिन तक लगा रहता था। आखिरी तीन दिनों में घुड़दौड़ हुआ करती थी। रोज़ जो भी आदमी जीत जाता उसकी बड़ी इज्ज़त होती और लोग उसे अपने यहां बुलाकर दावत दिया करते।

घुड़दौड़ के तीसरे दिन, जब आखिरी दौड़ शुरू होने ही वाली थी, एक नवयुवक हरे रंग की पोशाक पहने हुए और हरे घोड़े पर सवार होकर वहां आया। उसका शरीर हृष्ट-पुष्ट था और वह बहुत सुंदर लगता था। उसके कपड़ों पर बहुत सुंदर जरी का काम हो रहा था और वे बहुत कीमती रेशम के बने हुए थे। उसके घोड़े की जीन पर लाल मोती लगे हुए थे और उसकी बंदूक भी सोने और चांदी की बनी हुई थी। जब उसने लोगों से आखिरी घुड़दौड़ में भाग लेने की अनुमति मांगी तो सब उसकी ओर देखने लगे। जब घुड़दौड़ शुरू हुई तो उसने दौड़ने की कोई जल्दी नहीं दिखाई। यहां तक कि जब और लोग भागना शुरू कर रहे थे, वह अपनी जीन ठीक कर रहा था। लेकिन शीघ्र ही वह उसके साथ हो गया।

घुड़दौड़ के बीच में भी, जिस समय अन्य सब दौड़ने वाले नवयुवक एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रहे थे, वह आराम से चल रहा था और दौड़ के बीच में ही उसने अपने सिर के ऊपर उड़ते हुए तीन कबूतरों का अपनी बंदूक से शिकार किया। दौड़ के बीच में ही उसने अपने घोड़े की जीन में से कुछ सोने के सुंदर फूल निकाले और उन्हें अपने बायीं ओर वाले लोगों के ऊपर फेंक दिया। इसी प्रकार जीन की दायीं ओर से उसने कुछ चांदी के फूल निकाले और उन्हें अपनी दाहिनी ओर वाले लोगों पर फेंक दिया और आगे बढ़ गया। लेकिन शीघ्र ही लोगों ने देखा कि उसका घोड़ा आगे भागा जा रहा है; ऐसा प्रतीत होता था कि उसका घोड़ा मैदान में नहीं, बल्कि हवा में दौड़ रहा हो। लोग उसे देखने के लिए अपने-अपने स्थानों से उठकर खड़े हो गए और सबने देखा कि वह सबसे आगे था और उस दिन आखिरी घुड़दौड़ में जीत उसी की रही।

घुड़दौड़ के मैदान में जो भी उस समय उपस्थित था, वही उस नवयुवक पर मुग्ध हो गया। बड़े-बूढ़े और लड़कियां सभी उसकी ओर देख रहे थे। लोगों में फुसफुसाहट चलने लगी कि उसका क्या नाम है और वह कहां का रहने वाला है।

कुछ लोग कहने लगे-“’उसने बायीं ओर से सोने के फूल निकाले और उन्हें बायीं ओर उछाल दिया। फिर दायीं ओर से चांदी के फूल निकाले और उन्हें दाहिनी ओर फेंक दिया। ऐसा तो आजकल कभी देखा न सुना।”

“कितना सुंदर और तंदुरुस्त लड़का है! उसके कपड़े शरीर पर कितने फब रहे हैं! घोड़ा तो देखो, जैसे देवताओं का हो!”

“लेकिन ऐसे सुंदर और तंदुरुस्त लड़के लिए यह तो सोचो कि लड़की कहां मिलेगी।”

सब लड़कियां उसके चारों ओर एकत्रित होकर गाने और नाचने लगीं और उसे अपने-अपने तम्बू में ले जाने के लिए कहने लगीं। सब उसे अपने तम्बू में ले जाकर शराब पिलाने की इच्छुक थीं।

लेकिन जैसे ही शाम हुई, वह घुड़सवार बिना किसी से कुछ कहे चुपचाप अपने घोड़े पर चढ़कर उस गांव की ओर चल दिया जहां से मेंढ़क की मां और बहू आए थे।

सब लोग वहां खड़े-खड़े उसके हरे घोड़े को देखते रहे और उसके चले जाने के बाद उसके पैरों से उड़ती हुई धूल को देखने लगे।

मेंढ़क की पत्नी सोचती रही कि वह घुड़सवार कहां से आया था और कहां चला गया। वह स्वयं भी उसकी सुंदरता और उसके पुष्ट शरीर पर मुग्ध थी। वह स्वयं भी उसका नाम जानना चाहती थी कि दिन छिपते ही वह इतनी जल्दी क्यों चला गया। वह सोचने लगी कि शायद घुड़सवार बहुत दूर रहता हो। घर लौटते समय वह भी अन्य स्त्रियों की तरह उसी घुड़सवार के बारे में सोचती रही थी।

मेंढ़क उन लोगों को दरवाज़े पर खड़ा मिला। उन्होंने जैसे ही घुड़दौड़ की बातें सुनानी शुरू की वह आगे-आगे सब बताने लगा। उन लोगों को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेंढ़क सब बातें पहले से ही जानता है और उस सुंदर घुड़सवार की भी बातें जानता है, जिसने आज घुड़दौड़ जीती थी।

अगले साल फिर पतझड़ के दिनों में घुड़दौड़ हुई। मेंढ़क की पत्नी, मां और पिता फिर घुड़दौड़ में गए।

जब घुड़दौड़ शुरू हुई तो सब लोग उस हरे घुड़सवार की बाट देखने लगे और सोचने लगे कि इस बार ज़रूर उसका नाम-धाम पूछ लेंगे। वह कहां रहता है और किस ज़र्मीदार के गांव में रहता है, यह पूछे बिना उसे इस बार नहीं जाने देंगे।

घुड़दौड़ के आखिरी दिन, जब आखिरी दौड़ हो रही थी, हरा घुड़सवार फिर अपने हरे घोड़े पर बैठ वहां आया । वह एकदम ऐसे आया मानो आकाश से उतरा हो। लोग उसे देखकर आश्चर्यचकित रह गए। इस बार भी उसके पास अपनी वही सोने-चांदी वाली बंदूक थी लेकिन इस बार उसके शरीर पर पिछली बार से भी अधिक सुंदर और कीमती कपड़े थे। जब अन्य सब घुड़सवारों ने अपनी दौड़ शुरू कर दी तो उसने आराम से बैठकर चाय पी और पीकर तेज़ी से उठा और इस बार भी पिछले साल की भांति उसने तीन कबूतर अपनी बंदूक से दौड़ते-दौड़ते ही मार डाले। जिस समय वह लोगों के सामने से गुज़र रहा था, उसने अपने घोड़े की बायीं ओर वाली जीन में से सोने के कुछ फूल निकाले और उन्हें अपनी बायीं ओर वाले लोगों पर उछाल दिया। फिर उसने दायीं ओर से चांदी के कुछ फूल निकाले और उन्हें अपनी दाहिनी ओर वाले लोगों पर बिखेर दिया। इसके बाद वह बहुत तेजी से आगे की ओर भागा और लोगों को ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह एक हरे बादल की सवारी कर रहा हो। बस, हरे-हरे मैदान में एक हरा बादल उड़ता हुआ नज़र आ रहा था। और इस बार लोगों ने फिर देखा कि वह घुड़दौड़ में जीत गया था।

लड़कियों ने इस बार फिर उसके सामने अपना नाच और गाना रखा और उसे अपने तम्बू में ले चलने के लिए कहने लगीं। लेकिन दिन छिपते ही उसने फिर बिना किसी से कहे अपने घोड़े को एड़ लगाई और मैदान से भाग लिया।

जब मेंढ़क की पत्नी और मां घर आयी तो उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस बार फिर मेंढ़क को सब बातें मालूम थीं।

इस बार लड़की के दिमाग में उथल-पुथल हुई कि जब वह घुड़दौड़ में जाता नहीं है तो उसको सब बातें मालूम कैसे हो जाती हैं। उस घुड़सवार को दिन छिपने से पहले ही क्योंह जाना पड़ता है? वह हमारे घर की तरफ ही क्यों जाता है? क्या इस दुनिया में सचमुच ही ऐसा कोई घुड़सवार हो सकता है? फिर मेंढ़क को उसके बारे में सब बातें कैसे मालूम चल जाती हैं? यही सब बातें उसके दिमाग में घूमती रहीं। अंत में उसमे निश्चय किया कि वह इन बातों का पता लगाकर ही रहेगी।

इस साल फिर घुड़दौड़ आयी। लड़की मेले में गई। उसने सब काम किए। लेकिन आखिरी दिन, जब आखिरी घुड़दौड़ होने वाली थी, वह अपनी सास से बोली-“’माताजी, मेरे सिर में बड़े ज़ोर से दर्द हो रहा है। मैं घर जाना चाहती हूँ। आप मुझे एक खच्चर दे दीजिए ।”

लड़की की सास और ससुर उसका बहुत ख्याल रखते थे। उन्होंने उसे खच्चर दे दिया और कहा कि वह घर चली जाए। जब वह अपने सास-ससुर की आंखों से ओझल हो गई तो उसने खच्चर को तेजी से घर की ओर दौड़ाया। जब वह घर पहुंची तो उसने सबसे पहला काम जो किया वह था मेंढ़क को ढूंढ़ने का। लेकिन उसे मेंढ़क कहीं भी दिखाई न दिया । तभी उसे एक कोने में मेंढ़क की खाल पड़ी दिखाई दी, जो उसके पति की ही थी। उसने उसे उठा लिया और उसकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे।

उसने सोचा कि मैं कितनी सौभाग्यशाली हूं! मेरा पति कितना सुंदर है और कितनी अच्छी घुड़सवारी करता है! मैं तो उसके बिलकुल अयोग्य हूं। आह! आज मुझे कितनी खुशी है!

वह बार-बार अपने आंसू रोकने की कोशिश करती लेकिन आंसू थे कि रुक ही नहीं रहे थे। वह बार-बार मेंढ़क की खाल को देख रही थी और सोच रही थी कि उसके पति को इतनी गंदी खाल नहीं पहननी चाहिए। वह इतने भद्दे वेश में क्यों रहता है? क्या वह उसके योग्य नहीं है?

उसे उस खाल से इतनी अधिक घृणा हो गई कि उसने उसे जला देने का निश्चय किया। वह सोच रही थी कि जब मेंढ़क यहां आएगा तो इसी बदसूरत वेश में बदल जाएगा इसलिए उसने उसे जला दिया।

जब उसने खाल जलाई तो सूरज डूब रहा था। तभी अचानक वह नवयुवक अपने हरे घोड़े पर सवार बादलों की तरह उड़ता हुआ वहां आया। जब उसने अपनी पत्नी को खाल जलाते देखा तो उसका रंग डर के मारे पीला पड़ गया और उसने फौरन घोड़े से उतरकर खाल को आग में जलने से बचा लेना चाहा। लेकिन उसे बहुत देर हो गई थी। मेंढ़क की केवल एक टांग ही बची थी।

उसने एक ठंडी सांस ली और घर के सामने पड़े एक बड़े पत्थर पर जाकर गिर पड़ा।

लड़की यह देखकर बहुत डर गई और उसकी सहायता करने के लिए दीड़ी।

“तुम इतने अच्छे आदमी हो और इतनी बढ़िया घुड़सवारी करते हो। तुम फिर मेंढ़क क्योंा बने रहना चाहते हो? और सब लड़कियों के पति तुम्हारी तरह के आदमी हैं, फिर मेरा ही भाग्य क्यों फूटा रहे? क्या तुम नहीं सोचते कि यह मुझे कितना बुरा लगता है?”

लड़के ने जवाब दिया-“तुम बहुत अधिक आतुर हो गई थीं। जो कुछ भी तुमने किया है, वह बहुत जल्दी कर डाला। अभी उसको करने के लिए हमें कुछ दिन रुकना था। अब मैं ज़िंदा नहीं रह सकता और लोग पृथ्वी पर खुश नहीं रह सकते ।”

“क्या मैंने कुछ गलत काम कर डाला है?” लड़की ने पूछा, “बोलो, अब मुझे क्या करना चाहिए?”

“इसमें तुम्हारी गलती नहीं है। मेरा ही दोष है। मैं बहुत ज्यादा लापरवाह हो गया था। यही वजह थी कि मैं घुड़दौड़ में जा पहुंचा। मैं लोगों को अपनी ताकत दिखाना चाहता था। लेकिन अब न तो हम लोग और न ही दुनिया के लोग सुखी रह सकते हैं। मैं कोई साधारण आदमी नहीं हूं, बल्कि पृथ्वी माता का बेटा हूं। अगर मैं और अधिक मज़बूत हो गया होता तो मैं लोगों की मदद करने के लिए खड़ा हो सकता था। मैं ऐसी दुनिया के स्वप्न देखा करता था जिसमें अमीर लोग गरीबों का खून चूसना बंद कर दें और जिसमें अफसर लोग अपने से नीचे के आदमियों को दबाया न करें। मैं चाहता हूं कि सब लोगों के पास राजधानी में जाने के लिए साधन हों और सब लोग आपस में मिल-जुलकर अपनी भेड़ और बकरियों का व्यापार कर सकें। लेकिन अभी मैं इतना बड़ा नहीं हुआ था और मेरी शक्तियां भी अभी बहुत सीमित थीं। अभी तक मुझमें इतनी शक्ति नहीं पैदा हुई कि मैं रात की ठंड को बिना अपनी मेंढ़क की खाल के सह सकूं। इसलिए दिन निकलते ही मैं मर जाऊंगा। जब मैं धीरे-धीरे इतना बड़ा हो जाता कि लोगों की इतनी सेवा कर सकता तो मेरे शरीर में इतनी शक्ति पैदा हो जाती कि मैं बिना मेंढ़क की खाल के रह सकता था। लेकिन अभी यह बहुत जल्दी है। तुमने यह क्या कर डाला? अब मैं यहां पृथ्वी पर नहीं रुक सकता। आज ही रात को मैं अपनी मां के पास लौट जाऊंगा।”

जब लड़की ने यह सुना तो उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने नवयुवक के कमज़ोर शरीर को अपनी बांहों में संभाल लिया और बोली-“तुम नहीं मर सकते । मुझे विश्वास नहीं होता कि तुम मर जाओगे। नहीं, नहीं, मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगी।”

लड़की शोक से कातर होकर इतनी बुरी तरह चिललाने लगी कि नवयुवक ने उसका हाथ अपने कमज़ोर हाथों में लेकर कहा-“प्रिय, तुम इतना दुःखी मत हो। अगर तुम वास्तव में यह चाहती हो कि मैं ज़िंदा रहूं तो अब भी तुम कुछ कर सकती हो।” उसने पश्चिम की ओर इशारा किया, “लेकिन यह सब केवल भगवान की इच्छा और उनकी अनुमति से ही किया जा सकता है। मेरा घोड़ा ले लो। अभी भी समय है क्योंकि मेरा घोड़ा हवा की तरह भागता है। वह तुम्हें पश्चिम दिशा की ओर ले जाएगा जहां लाल-लाल बादलों के बीच एक बहुत बड़ा महल है। वहां जाकर भगवान से प्रार्थना करना। कहना कि लोगों की भलाई के लिए वह इन तीन बातों को पूरा कर दें। उनसे कहना कि यह सब दिन निकलने से पहले ही कर दें। देखो, अच्छी तरह याद कर लो। पहली बात यह है कि लोग गरीब और अमीर न कहलायें, सबके पास बराबर धन हो। दूसरा यह कि अफसर लोग और सरकारी आदमी जैसे ज़मींदार आदि जनता को न दबायें। और तीसरे यह कि हमारे पास नगरों तक जाने के लिए सड़कें हों और हम वहां जाकर व्यापार कर सकें। अगर भगवान तुम्हारी इन बातों को मान जाते हैं तो हम सब सुख से रह सकेंगे और मुझमें इतनी शक्ति हो जाएगी कि मैं रात को भी बिना मेंढ़क की ख़ाल के रह सकूंगा।

लड़की फौरन घोड़े पर सवार होकर वहां से चल दी। घोड़ा उसे लेकर हवा में उड़ रहा था। हवा उसको छूकर भागी जा रही थी और वह बादलों के बीच में होती हुई पश्चिम दिशा की ओर उड़ रही थी। अंत में वह उस महल के सामने आयी जो सूर्य की भांति लाल-लाल चमक रहा था। वह अंदर गई और उसने भगवान से अपनी प्रार्थनाएं कहीं। भगवान उसकी बातों की सच्चाई और उसके दुःख को देखकर पिघल गए और उन्होंने उसकी बातें मान लीं।

भगवान उससे बोले-“तुम्हारी बातों में सच्चाई है इसलिए मैं तुम्हारी सब. बातें मान लूंगा। लेकिन दिन निकलने से पहले तुम्हें जाकर यह खबर सब घरों में पहुंचा देनी होगी। तुम्हारी प्रार्थनाएं तभी पूरी हो सकेंगी, यदि सब लोग इस बात को दिन निकलने से पहले सुन लें। तब यहां इतनी अधिक ठंड पड़नी बंद हो जाएगी और तुम्हारा पति रात को भी बिना मेंढ़क की खाल के रह सकेगा ।”

लड़की खुशी के मारे फूली नहीं समा रही थी। उसने भगवान को धन्यवाद दिया और अपने घोड़े पर चढ़कर घर की ओर चल दी जिससे दिन निकलने से पूर्व ही वह इस समाचार को घर-घर फैला सके।

लेकिन जब वह घाटी में घुसी तो उसका ज़मींदार पिता किले के दरवाज़े पर खड़ा हुआ था।

जब उसने अपनी बेटी को आते देखा तो वह बोला-‘क्यों बेटी, तुम इतनी देर गए यहां क्योंे आयी हो?”

उसने कहा, “पिताजी, भगवान ने मुझे एक बहुत ही आश्चर्यजनक वरदान दिया है। अब मैं उसे सबको बताने जा रही हूं।”

“जल्दी कहां की है!” ज़मींदार बोला, “ज़रा मुझे तो बताओ, भगवान ने तुम्हें क्या-क्या वरदान दिए हैं।’

‘पिताजी, मैं एक मिनट के लिए भी नहीं रुक सकती मेरे पास इतना समय नहीं है। मैं आपको फिर बता दूंगी।” लड़की बोली।

“यह नहीं हो सकता। मैं ज़मींदार हूं और तुम्हें सबसे पहले मुझे ही बताना पड़ेगा।” और उसने आगे बढ़कर घोड़े की लगाम पकड़ ली।

लड़की जानती थी कि उसका पिता इस तरह नहीं मानेगा लेकिन वह उससे जल्दी-से-जल्दी छुटकारा पाना चाहती थी इसलिए उसने उसे सब कुछ सच-सच बता दिया। वह बोली-“भगवान ने मुझसे तीन वायदे किए हैं। पहला तो यह है कि गरीब और अमीर में कोई भेद नहीं रहेगा।”

ज़मींदार ने अपना सिर खुजलाया। वह बोला-“अगर गरीब और अमीर में कोई भेद नहीं रहेगा तो मेरी इज़्ज़त कौन करेगा और तुम्हारी बहनों के लिए दहेज का पैसा कहां से आएगा?”

यह कहकर उसने घोड़े की लगाम को और भी कसकर पकड़ लिया।

“दूसरी बात यह है कि सरकारी अफसर आम जनता को नहीं सतायेंगे ।”

“यह क्या मूर्खता है! फिर हमारा काम कौन करेगा? हमारी भेड़-बकरी कौन चराएगा? हमारे खेत कौन जोतेगा?” उसने बड़े ही बेमन से कहा और पूछा कि तीसरा वचन क्याो है?

“और तीसरी बात यह है कि यहां से नगरों तक कोई रास्ता बन जाए और हम लोग वहां पर व्यापार कर सकें। अहा, पिताजी, जब यह सब बातें हो जायेंगी तो यहां की ठंड बिलकुल खत्म हो जाएगी और यहां काफी गर्मी पड़ने लगेगी। उसके बाद-”

लेकिन ज़मींदार ने बीच में ही टोककर कहा-“ये सब बेकार की बातें हैं। ऐसा कभी नहीं हो सकता। हमारा काम अब बिलकुल ठीक तरह से चल रहा है। हमें शहर जाने की क्या जरूरत है? यह कभी भी भगवान के हुक्म नहीं हो सकते। मुझे इनमें से किसी भी बात पर विश्वास नहीं है। मैं तुम्हें इनमें से एक भी शब्द लोगों को नहीं बताने दूंगा।”

“पिताजी, मैं अब यहां एक क्षण भी नहीं ठहर सकती।” लड़की ने चिल्लाकर कहा, “मुझे आप फौरन जाने दीजिए ।”

उसने भागने की कोशिश की लेकिन उसके पिता ने घोड़े की लगाम नहीं छोड़ी । बेचारी लड़की बहुत अधिक दुःखी हो रही थी और उधर उसका पिता उससे सवाल-जवाब करने पर तुला हुआ था।

तभी मुर्गा बोला। लड़की तेजी से कूदी और घोड़े को छुड़ाना चाहा। लेकिन ज़मींदार अभी भी उसे कसकर पकड़े हुए था। वह जोर से चिल्लाया-“क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? कया तुम चाहती हो कि तुम्हारी बहनों की शादी में मैं दहेज न दूं? क्या तुम अपने पिता की बेइज्ज़ती करना चाहती हो? क्या तुम चाहती हो कि मैं घर का सब काम अपने हाथ से किया करूं? हमारी भेड़-बकरियां कौन चरायेगा? हमारे खेत कौन जोतेगा? क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?”

लड़की की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। मुर्गा दूसरी बार फिर बोला और इधर उसका पिता उसे छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था।

अंत में निराश होकर उसने अपने घोड़े को बड़े जोर से कोड़ा लगाया। घोड़े ने ज़मींदार को एक ओर फेंक दिया और हवा से बातें करने लगा। लड़की अभी पहले मकान पर ही पहुंच पायी थी कि मुर्गा तीसरी बार फिर बोला। पौ फटने लगी थी और अब तक कुछ ही घरों में वह अपनी बात कह पायी थी।

लड़की का दिल बैठने लगा। पौ फट गई थी और उसका काम अभी आधा भी नहीं निपटा था। अब तो बहुत देर हो गई थी। अब केवल उसके लिए यही चारा रह गया था कि वह घर की ओर जल्दी से कदम बढ़ाए।

उसने देखा कि उसके ससुर उसके पति के पास खड़े हुए रो रहे हैं और उसकी सास मृतक की आत्मा को शांति देने के लिए भगवान से प्रार्थना कर रही है।

सब बेकार हो गया था। वह अपने पति के शव पर गिर पड़ी और अपने पिता को कोसती हुई जोर-जोर से रोने लगी।

इस घुड़सवार नवयुवक के शव को वहां से कुछ दूर पर ही एक चट्टान पर दफना दिया गया। रोज शाम को जाकर वह लड़की उसकी कब्र के पास रोती। अंत में एक दिन वह खुद भी पत्थर में बदल गई। उस दिन के बाद लोगों को उसका रोना सुनाई देना बंद हो गया।

आज भी उस कब्र के पास वह पत्थर की लड़की बनी हुई है। बहुत दूर से देखने पर ही तुम्हें मालूम चल जाएगा कि वह कोई लड़की है जिसके बाल बिखरे हुए हैं और वह भगवान से प्रार्थना कर रही है। वह अपने पति की कब्र के पास सदा से इसी प्रकार प्रार्थना करती रही है और सदा इसी प्रकार प्रार्थना करती रहेगी।

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Chinese Lok Kathayen-9/ चीनी लोक कथाएँ-9

कहानी-शीमन पाओ के ये कांउटी का शासन: चीनी लोक कथा

शीमन पाओ ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी का निवासी था। वह दौर चीन में युद्धरत काल था। शीमन पाओ प्रतिभा और योग्यता के लिए राजा द्वारा ये ती ज़िले का जिलाधीश नियुक्त किया गया।

पद संभालने के तुरंत बाद शीमन पाओ ने कुछ जाने-माने स्थानीय वृद्ध व्यक्तियों को बुलाकर जिले की समस्याएं पूछीं। वृद्धों ने उसे बताया कि जिले की प्रजा इस मुसीबत से बुरी तरह परेशान है कि हर साल नदी के जल देवता को दुल्हन के रूप में एक नव युवती भेंट की जाती है।

असल में बात यह थी कि ये ती जिला पीली नदी के किनारे पर बसा था। स्थानीय प्रथा के अनुसार नदी में जल देवता रहता था, उसे हर साल एक नव युवती दुल्हन के रूप में भेंट की जाती थी, वरना देवता नदी में भयंकर बाढ़ ला देगा, जिससे पूरा जिला पानी में जलमग्न हो जाएगा। लम्बे अरसे से जिले के अधिकारी और भूतनी जल देवता के शादी ब्याह की सेवा में बहुत सक्रिय थे और इसके लिए प्रजा से अतिरिक्त कर वसूल करते आए थे, जो धन दौलत मिलती थी, उसे आपस में बांटा जाता था।

वृद्धों के अनुसार हर साल एक निश्चित समय पर जिले की एक बूढ़ी भूतनी विभिन्न जगहों पर गरीब घर की रूपवती लड़की की तलाश करने निकलती है और उसे जल देवता को भेंट करने के लिए चुनती थी। फिर सरकारी अधिकारी मामले को अपने हाथ में ले कर चुनी गई लड़की को जबरन एकांत जगह में बंद करते थे और उसे अच्छे वस्त्र और भोजन देते थे।

दस दिन के बाद जल देवता की शादी का मुहूर्त आता था, उस लड़की को खूबसूरत संजाया संवारा जाता था। पलंग के रूप में एक चटाई तैयार की जाती थी और लड़की उस पर बिठा कर नदी में छोड़ी जाती थी। शुरू-शुरू में चटाई पर बैठी युवती नदी की जल सतह पर तैरती थी, पर थोड़े ही वक्त के बाद वह नदी में डूब जाती थी। भूतनियां इस घड़ी पर अनुष्ठान कर घोषणा करती थी कि जल देवता की शादी संपन्न हो चुकी है और वह अपनी नई दुल्हन से संतुष्ट है।

ये ती जिले के स्थानीय वृद्धों की बातें सुन कर शीमन पाओ कुछ नहीं बोला। इस तरह वृद्धों ने भी उससे खास आशा नहीं बांधी।

जल देवता की शादी का दिन आ गया। खबर पाकर शीमन पाओ अपने सिपाहियों को लेकर पहले ही नदी के किनारे पर आया। कुछ समय बाद जिले के सरकारी अधिकारी, कुलीन वर्ग के लोग और जल देवता के लिए चुनी गई दुल्हन भी नदी के तट पर आए। उनके साथ जो बूढ़ी भूतनी आई, वह 70 साल से अधिक उम्र वाली थी।

तब जाकर शीमन पाओ ने आगे आ कर कहा:“जल देवता की दुल्हन ले आओ, मैं देखना चाहता हूं कि वह सुन्दर है या नहीं।”

दुल्हन के लिए चुनी गई वह नव युवती शीमन पाओ के सामने ला खड़ी की गई। उस पर एक नज़र दौड़ा कर शीमन पाओ ने उपस्थित लोगों से कहा:“यह लड़की खूबसूरत नहीं है और जल देवता की दुल्हन बनने के काबिल नहीं है। लेकिन आज जल देवता की शादी का दिन है, वह इंतजार में अवश्य है, भूतनी को थोड़ा कष्ट उठाना होगा। तुम देवता को यह सूचना देने जाओ कि हम इस लड़की से सुन्दर लड़की ढूंढ़ निकालेंगे, शादी दूसरे दिन होगी।”

कहते हुए शीमन पाओ ने अपने सिपाहियों को उस बूढ़ी भूतनी को नदी में फेंकने का आदेश दिया। थोड़ी देर बाद, शीमन पाओ फिर बोला:“क्या बात है बहुत देर हो चुकी है भूतनी वापस नहीं आयी। उसकी एक शिष्या को वहां के हालात जानने के लिए भेजा जाय।”

शीमन पाओ के आदेश पर सिपाहियों ने बूढ़ी भूतनी की एक चेली को नदी के पानी में छोड़ दिया। इस तरह एक के बाद एक भूतनी की तीन शिष्याएं पानी में डाल दी गयी।

नदी के तट पर इक्ट्ठे सरकारी अधिकारी, धनी व्यक्ति और भीड़ सबके सब हैरान थे, लेकिन शीमन पाओ सम्मान की मुद्रा में खड़े जल देवता की खबर आने की प्रतीक्षा में था।

थोड़ी देर के बाद शीमन पाओ बोला:“ लगता है जल देवता बहुत मेहमाननवाज है, वह हमारे द्वारा भेजे गए दूतों को लौटने नहीं देते हैं। बेहतर होगा कि खबर लेने के लिए फिर एक व्यक्ति को भेजा जाय।”

कहते हुए शीमन पाओ की नज़र जल देवता की शादी ब्याह के मामले में सक्रिय रहे सरकारी अधिकारियों, धनी और कुलीन लोगों की ओर घूमी। डर के मारे ये लोग तुरंत जमीन पर घुटनों के बल झुक कर शीमन पाओ से क्षमा मांगने लगे। उन्हें डर था कि कहीं शीमन पाओ उन्हें भी जल देवता से मिलने के लिए नदी में तो नहीं फेंक देगा।

इस वक्त शीमन पाओ ने भीड़ को संबोधित करते हुए बुलंद आवाज में कहा:“जल देवता की शादी असल में जिलावासियों से धन दौलत लूटने की चाल है। भविष्य में अगर कोई फिर जल देवता की शादी ब्याह का मामला करेगा, तो उसे नदी में देवता के पास भेज दिया जाएगा।”

इस घटना के बाद ये ती जिले में जल देवता की शादी फिर कभी नहीं हुई और ये ती जिला भी शीमन पाओ के कुशल प्रशासन में सुव्यवस्थित और सुशासित हो गया।

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Chinese Lok Kathayen-8/ चीनी लोक कथाएँ-8

कहानी-पेइ श्वेइ का युद्ध: चीनी लोक कथा

“पेइ श्वेइ का युद्ध”का अर्थ आम तौर पर निकलता है कि नदी को अपने पीछे रखकर शत्रु के साथ जीवन-मरण की लड़ाई लड़ना, मतलब है कि शत्रु को हराने का पूरा प्रयास करना है, वजह है पीछे हटाने का रास्ता नहीं है।

यह युद्ध आज उत्तर चीन के हपेई प्रांत की चिंग शिंग कांउटी में हुआ, तो इसे चिंग शिंग का युद्ध कहा जाता है।

ईसा पूर्व 206 में चीन के प्रथम एकीकृत सामंती राजवंश छिन का पतन हुआ। देश का इतिहास एक नए दौर से गुजरने लगा। राजसत्ता छीनने के लिए तत्काल की दो शक्तिशाली सेनाओं के नेता यानी शी-छु राज्य के राजा श्यांग-यु और हान राज्य के राजा ल्यू पांग के बीच युद्ध छिड़ा।

दोनों के बीच का युद्ध करीब पांच सालों तक चला। इस दौरान ल्यू पांग की सेना यानी हान राज्य की सेना के सेनापति हान शिन ने असाधारण युद्ध कला और सामरिक प्रतिभा का परिचय दिया। चिंग शिंग नाम के स्थान पर हान और चाओ सेनाओं में हुआ। युद्ध हान शिन की सामरिक प्रतिभा की एक मिसाल थी।

ईसा पूर्व 204 के अक्तूबर में हान शिन के कमान में हान सेना की एक नव गठित दस हजार लोगों की टुकड़ी लम्बा सफ़र तय कर उत्तरी चीन के थाई हांग पर्वत से गुज़र कर शी-छु राजा श्यांग-यु के अधीनस्थ चाओ राज्य पर हमला करने गई। चाओ राजा श्ये और उसके सेनापति छन-यु के पास दो लाख सैनिकों की एक विशाल सेना थी, जो थाई हांग पर्वत के एक दर्रे चिंग शिंग नामक स्थान पर तैनात थी और हान शिन की सेना के विरूद्ध निर्णायक युद्ध करने के लिए तैयार थी।

चिंग शिंग हान सेना के लिए चाओ राज्य की सेना पर हमला करने जाने का एकमात्र रास्ता था, जहां भू-स्थिति खतरनाक और जटिल थी। वहां से गुज़रने के लिए मात्र सौ किलोमीटर लम्बा संकरा मार्ग मिलता था। यह स्थिति हमला करने वाली विशाल सेना के लिए अत्यन्त प्रतिकूल थी और प्रतिरक्षा की सेना के हित में थी।

युद्ध से पहले चाओ राज्य की सेना ने चिंग शिंग दर्रे पर कब्जा कर रखा था और ऊंचे पहाड़ पर अपना मजबूत मोर्चा बनाया था। उसकी सैन्य शक्ति भी तगड़ी थी और लम्बा मार्च करने की ज़रूरत भी नहीं थी। युद्ध जीतने की प्राथमिकता चाओ राज्य की सेना के हाथ में थी। चाओ सेना पर हमला करने आई हान शिन की सेना के पास केवल दस हजार सैनिक थे, वे भी लम्बा मार्च कर बहुत थके हुए थे, इसलिए हान शिन की सेना कमजोर और प्रतिकूल स्थिति में थी।

युद्ध से पहले चाओ सेना के सलाहकार ली च्वेच्यु ने सेनापति छन-यु को यह सलाह दी कि दर्रे के सामने आ पहुंची हान शिन की सेना के हमले को रोकने के लिए अपनी मुख्य टुकड़ी तैनात की जाए। साथ ही पीछे के रास्ते से एक छोटी टुकड़ी भेजकर हान शिन की सेना के अनाज आपूर्ति रास्ते को काट दे और दोनों तरफ़ उस पर धावा बोले, इस रणनीति से हान शिन को जिन्दा पकड़ा जा सकता है। लेकिन सेनापति छन-यु युद्ध कला में एक रूढ़िवादी था, उसे अपनी शक्तिशाली सेना पर अंधा विश्वास था और पीछे की ओर दुश्मन पर हमला करने का विरोधी था, इसलिए उसने ली च्वेच्यु के अच्छे सुझाव को ठुकरा दिया।

युद्ध में चतुर हान राज्य की सेना के सेनापति हान शिन को मालूम था कि दोनों सेनाओं की शक्ति काफ़ी फर्क है, यदि सामने से सीधे चाओ राज्य की सेना के मोर्चे पर चढ़ाई की जाय, तो हान राज्य की सेना निश्चय ही परास्त होगी। सो उसने चिंग शिंग दर्रे से बहुत दूर एक जगह पर अपनी सेना तैनात की और वहां की भू-स्थिति और चाओ राज्य की सेना के विन्यास का बारीकी से विश्लेषण किया। हान शिन को जब यह खबर मिली कि चाओ सेना के सेनापति छन-यु हान सेना की शक्ति को बड़ी उपेक्षा की नजर से देखता है और जल्दी से युद्ध जीतने के लिए उतावला है, तो उसने तुरंत अपनी सेना को चिंग शिंग दर्रे से 15 किलोमीटर की दूरी पर तैनात कर दिया।

आधी रात के समय, हान शिन ने दो हजार सैनिकों को हान सेना का एक झंडा लिए रात के अंधेरे की आड़ में पहाड़ी पगडंडी से चाओ राज्य की सेना के शिविर के बगल में भेजकर घात में लगाया। हान शिन की योजना थी कि अगर दूसरे दिन युद्ध छिड़ा, चाओ सेना शिविर से लड़ाई के लिए बाहर आई, तो मौके का लाभ उठा कर ये दो हजार सैनिक चाओ सेना के शिविर में प्रवेश कर चाओ सेना के झंडों की जगह हान सेना के झंडे फहराएंगे। इसके बाद हान शिन ने और 10 हज़ार सैनिकों को नदी के पास भेजा। सैनिकों के पीछे नदी है, अगर युद्ध में हारे, तो पीछे नहीं हटा सकते। चीनी युद्ध कला में नदी के पीछे रहकर लड़ाई करना बहुत खतरनाक बात है, आम तौर पर ऐसी स्थिति में सैनिकों की हार के बाद मौत होती है। छन-यु हान शिन की इस प्रकार की तैनाती के बारे में जानकर ज़ोर से हंसा, उसने कहा कि हान शिन को युद्ध कला मालूम नहीं है, अपनी सेना के लिए हटाने का रास्ता नहीं रखा, वह जरूर खत्म होगा।

दूसरे दिन, हान शिन के कमान में हान राज्य की सेना खुले तौर पर चाओ सेना की ओर बढ़ने लगी, जब चिंग शिंग दर्रे के पास आ पहुंची, तो एकदम सुबह हो गयी। चाओ सेना के सेनापति छन-यु ने अपनी सभी सैन्य शक्ति को एकत्र कर हान शिन की सेना पर हमला बोला। दोनों सेनाओं में घमासान लड़ाई हुई, लेकिन देर तक हार जीत तय नहीं हो पाई।

इसी बीच चाओ सेना के शिविर में बहुत कम संख्या में सैनिक पहरे के लिए छोड़े गए थे, शिविर के बगल में घात लगाकर बैठे हान शिन के दो हजार सैनिकों ने तुरंत चाओ सेना के शिविर में धावा बोला और वहां हान सेना के झंडे फहराए, फिर ढोल बजाते हुए हुंकार करते रहे।

दर्रे के पास घमासान लड़ाई में चाओ सेना ने अचानक देखा कि उसके शिविर में हर जगह हान सेना के झंडे फगराए गए हैं, तो उसमें बड़ी घबराहट मची और मोर्चा भी ध्वस्त हो गया। हान शिन ने मौके पर दुश्मन पर जवाबी हमला बोला और चाओ राज्य की दो लाख सैनिकों वाली विशाल सेना को बुरी तरह पराजित कर दिया, चाओ का सेनापति छन-यु युद्ध में मारा गया और चाओ राजा ज़िंदा पकड़ा गया।

युद्ध की विजय की खुशियां मनाने के समारोह में कुछ सैन्य अफ़सरों ने सेनापति हान शिन से पूछा:“युद्ध कला के ग्रंथों में कहा गया कि पर्वत को पीछे रखकर या नदी को आगे रखकर सैनिकों की तैनाती की जा सकती है, लेकिन आपने नदी को सैनिकों के पीछे रख दिया और कहा था कि विजय पाकर हम खुशियां मनाएंगे। उस समय हमें विश्वास नहीं था। लेकिन अंत में हमें विजय मिली। आपने क्या रणनीति बनायी?”

सेनापति हान शिन ने मुस्कराते हुए कहा:“यह उपाय युद्ध कला के ग्रंथों में लिखा गया है। शायद आप लोगों ने इस पर ध्यान नहीं दिया हो। युद्ध कला ग्रंथों में कहा गया कि सबसे खतरनाक स्थिति में फंस कर भी रास्ता निकल सकता है”नदी के पीछे रहकर हमारे सैनिकों के लिए भागने का कोई रास्ता नहीं था, जीतने के लिए उन्हें पुरज़ोर कोशिश करनी थी।

“पेइ श्वेइ का युद्ध”शीर्षक कहानी चीन में कहावत के रूप में इस्तेमाल की जाती है। इसका इस्तेमाल अधिकतर सैन्य कार्रवाइयों में किया जाता है। इसके साथ ही निर्णायक लड़ाई वाली कार्रवाई में भी प्रयोग किया जाता है। मतलब है कि बचने का कोई रास्ता न होने पर शत्रु के साथ जीवन-मरण की लड़ाई लड़ना। दूसरा अर्थ निकलता है कि गतिरोध से बाहर निकलने के लिए अंतिम प्रयत्न करना।

चिंग शिंग युद्ध में हान शिन ने दस हजार सैनिकों की सेना से चतुर युद्ध कला का इस्तेमाल कर दो लाख वाली दुश्मन सेना को पूरी तरह खत्म कर दिया और चीन के सैन्य इतिहास में एक शानदार मिसाल कायम की।

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Chinese Lok Kathayen-7/ चीनी लोक कथाएँ-7

कहानी-छांग फिंग का युद्ध: चीनी लोक कथा

ईसा पूर्व चौथी शताब्दी यानी युद्धरत राज्य काल में चीन की भूमि पर कई राज्य अस्तित्व में आए, जो आपस में युद्ध लड़ते थे। इसी दौरान छिन राज्य ने राजनीतिक सुधार कर अपनी शक्ति अत्याधिक बढ़ा दी थी। राजा छिन चाओवांग के शासन काल में छिन प्राचीन चीन की भूमि पर स्थापित सात प्रमुख राज्यों में से सबसे शक्तिशाली और समृद्ध हो गया और उसने देश का एकीकरण करने का अभियान चलाया। इस दौरान कई मशहूर युद्ध हुए, जिनमें छांग फिंग का युद्ध काफ़ी प्रसिद्ध था।

यहां बता दें कि ये सात प्रमुख राज्य छी राज्य, छू राज्य, यान राज्य, हान राज्य, चाओ राज्य, वेइ राज्य और छीन राज्य थे।

छिन राज्य के पड़ोसी राज्य हान, वेइ, यान और चाओ ने छिन राज्य की विस्तार नीति को विफल करने के लिए गठबंधन कायम किया। चारों राज्यों में से चाओ राज्य सबसे सशक्त था और वेइ सबसे कमजोर था।

ईसा पूर्व वर्ष 268 में छिन राज्य ने वेइ राज्य पर हमले के लिए सेना भेजी और उसे अपना अधीनस्थ राज्य बनाया। इसके बाद उसने हान राज्य पर धावा बोलने सेना भेजी। हान राज्य का राजा बहुत भयभीत हो गया और उसने छिन राज्य को अपने देश का शांग तांग शहर भेंट करने का निश्चय किया। लेकिन हान राज्य के शांग तांग शहर का महापौर फ़ंग थिंग अपने शहर को छिन राज्य को भेंट नहीं करना चाहता था। उसने शहर को चाओ राज्य को भेंट कर हान और चाओ के बीच छिन राज्य के आक्रमण का मुकाबला करने का गठबंधन करवाया।

चाओ राज्य का राजा दूरदर्शी नहीं था। उसने एक शहर के लालच में अंतिम परिणाम के बारे में नहीं सोचा और शांग तांग शहर को अपनी सीमा में शामिल किया। उसकी इस हरकत से छिन राज्य बहुत क्रोधित हो उठा। ईसा पूर्व 261 में, छिन राज्य के राजा ने सेनापति वांग ह को सेना के साथ शांग तांग शहर पर चढ़ाई करने भेजा।

शांग तांग में तैनात चाओ राज्य की सेना हार कर छांग फिंग नामक स्थान तक हट गई। छिन राज्य की सेना को रोकने के लिए चाओ राजा ने अपने वृद्ध सेनापति ल्यान फो को छांग फिंग में चाओ सेना का नेतृत्व करने भेजा।

चाओ सेना की मुख्य टुकड़ी ने छांग फिंग पर छिन राज्य की सेना के साथ कई बार युद्ध किये, लेकिन वह विजयी नहीं हुई और काफ़ी नुकसान भी हुआ। वस्तुगत स्थिति पर गौर कर चाओ सेना के सेनापति ल्यान फो ने अपनी अच्छी भू स्थिति के सहारे मजबूत मोर्चा बनाकर छिन राज्य की सेना के हमले को रोकने की प्रतिरक्षा नीति तैयार की। यह रणनीति रंग लायी, छिन राज्य की सेना के हमलों को वहीं रोका गया और दोनों सेनाओं के बीच लम्बे समय तक बराबर की स्थिति बनी रही।

युद्ध के इस प्रकार के गतिरोध को भंग करने के लिए छिन राज्य ने चाओ राज्य के शासक वर्ग में फूट डालने की चाल चली। उसने चाओ राजा के नज़दीकी मंत्री को धन-दौलत से खरीद लिया, जिसने चाओ राजा और सेनापति ल्यान फो के संबंधों को बिगाड़ने की कोशिश में यह अफ़वाह फैलाई कि ल्यान फो छिन राज्य की सेना को आत्मसमर्पण के लिए उस पर हमला नहीं करना चाहता। छिन राज्य की सेना सबसे ज्यादा चाओ राज्य के सेनापति चाओ खुओ से डरती है।

युद्ध की स्थिति से अज्ञात चाओ राजा को लगा कि ल्यान फो डर के मारे दुश्मन पर हमला नहीं करता है, इसलिए उसने उसे पद से हटा कर चाओ खुओ को सेनापति नियुक्त किया ।

वास्तव में चाओ खुओ ने कभी युद्ध में भाग नहीं लिया था। उसे असली युद्ध के बारे में कोई अनुभव भी नहीं था, पर वह युद्ध कला पर खोखली बातें बहुत पसंद करता था। छांग फिंग नाम के स्थल तक पहुंच कर उसने ल्यान फो की प्रतिरक्षा की रणनीति छोड़ कर दुश्मन पर दल बल से धावा बोलने और अंतिम जीत हार तय करने की रणनीति अपनायी।

इस तरह छिन राज्य चाओ राज्य की सेना में फूट का बीज डालने में सफल हुआ। उसने वांग ह की जगह अपने अनुभवी और वीर जनरल पाई छी को सेनापति नियुक्त किया और इस बदलाव को चाओ राज्य की सेना के प्रति गोपनीय भी रखा, ताकि चाओ राज्य की सेना चेत न जाए।

चाओ सेना के सेनापति चाओ खुओ की युद्ध का अनुभव न होने और खुद पर घमंड होने की कमजोरी से लाभ उठाकर छिन राज्य के सेनापति पाई छी ने दुश्मन को भ्रम में डालकर उसे घेरने की नीति लागू की।

ईसा पूर्व वर्ष 260 में चाओ खुओ ने अपनी सेना को छिन राज्य की सेना पर बड़ा हमला बोलने का आदेश दिया। दोनों सेनाओं में कुछ समय युद्ध चलने के बाद छिन सेना हार का बहाना कर पीछे हटने लगी। चाओ खुओ ने स्थिति की असलियत का जायजा न कर तुरंत छिन राज्य की सेना का पीछा करने का निश्चय किया। इस तरह चाओ राज्य की सेना छिन राज्य की सेना द्वारा पूर्व योजना के अनुसार बिछाए गए जाल में फंस गयी। उसे छिन राज्य की सेना की मुख्य टुकड़ी का जमकर मुकाबले का सामना करना पड़ा। इसी बीच बगल में घात लगाकर बैठी छिन राज्य की सेना की टुकड़ियों ने दोनों तरफ़ से चाओ सेना को टुकड़ों में विभाजित कर दिया और एक-एक को घेर लिया।

कड़ी घेराबंदी में फंसे चाओ खुओ ने खुद चाओ राज्य की सेना की मजबूत टुकड़ी का नेतृत्व कर घेराबंदी तोड़ने की अंतिम कोशिश की, किन्तु छिन राज्य की सेना के तीरों की अंधाधुंध वर्षा में वह खुद मारा गया। सेनापति के मरने पर चाओ राज्य की सेना का हौसला पस्त हो गया और सभी ने आत्मसमर्पण किया। इस तरह छिन राज्य की सेना ने छांग फिंग पर हुए घमासान युद्ध में अंतिम विजय पायी।

छांग फिंग का युद्ध चीन के युद्ध इतिहास में दुश्मन को घेराबंदी में डाल कर खत्म करने की एक शानदार प्राचीन मिसाल है।

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Chinese Lok Kathayen-6/ चीनी लोक कथाएँ-6

कहानी-खाली शहर की चाल: चीनी लोक कथा

खाली शहर की चाल: चीनी लोक-कथा

“खाली शहर की चाल” बुद्धिमानी से जुड़ी एक कहानी है। यह मशहूर चीनी ऐतिहासिक व्यक्ति चु क ल्यांग की बुद्धि से जुड़ी कहानी है।

चीन में चु क ल्यांग का नाम सभी जानते हैं। वह असधारण बुद्धिमान और कार्यकुशल शख्स था। उसके बारे में कई रोचक कहानियां प्रचलित हैं, खाली शहर की चाल उनमें से एक है।

ईसवी तीसरी शताब्दी में यानी ईसवी वर्ष 220 से 280 तक के समय में चीन में मुख्यतः तीन राज्य शासन करते थे, वे थे वेई राज्य, शू राज्य और वू राज्य। चीन के इतिहास में यह काल त्रि-राज्य काल कहलाता है। उत्तरी चीन पर वेई राज्य, दक्षिण पश्चिमी चीन पर शू राज्य और दक्षिण चीन पर वू राज्य का नियंत्रण हुआ करता था। इन तीनों राज्यों में वेई राज्य अधिक शक्तिशाली था।

इन तीनों राज्यों में वेई राज्य अधिक शक्तिशाली था। शू राज्य के सैन्य सलाहकार चु क ल्यांग युद्ध कला में पारंगत और अजेय माने जाते थे।

एक बार वेई राज्य को यह सूचना मिली कि शू राज्य के सामरिक स्थल पश्चिमी नगर में तैनात सैन्य बल बहुत कम है, वहां केवल दस हजार सिपाही पहरा दे रहे थे। वेई राज्य के सेनापति स-मा यी ने एक लाख से अधिक सैनिकों वाली सेना लेकर शू राज्य के पश्चिमी शहर पर हमला बोल दिया।

वेई राज्य की विशाल सेना के पश्चिमी शहर की ओर आने की खबर पा कर वहां के सभी लोगों को बड़ी चिंता हो उठी। एक लाख सैनिकों की सेना को रोकने में दस हजार लोगों की शक्ति कुछ भी नहीं थी। शू राज्य के दूसरे स्थानों से कुमक सेना बुलाने के लिए अब समय भी नहीं था। स्थिति बड़े खतरे में पड़ गई। इस नाजुक घड़ी में सभी लोगों ने शहर बचाने की आशा शू सेना के नायक चु क ल्यांग पर बांधी। चु क ल्यांग भी मुश्किल में पड़ गया, इस प्रकार की असाधारण गंभीर स्थिति का सामना करने के लिए एक उचित उपाय सोचना था।

काफी सोच विचार कर चु क ल्यांग को एक साहसिक चाल सूझी। उसने शहर के तमाम आम निवासियों और सिपाहियों को शहर से बाहर सुरक्षित स्थान छिप जाने का आदेश दिया। शहर का दरवाजा पूरा खुलवाया और इस तरह दुश्मन की सेना के आगमन की प्रतीक्षा में बैठ गए।

कुछ समय बाद वेई राज्य की सेना स-मा यी के नेतृत्व में पश्चिमी शहर के पास आ पहुंची और उसने शहर को घेरने का हुक्म जारी किया। लेकिन वह इस बात से हैरान हो गया कि पश्चिमी शहर निर्जन सा है, शहर का दरवाजा खुला का खुला हुआ है, शहर की दीवार पर पहरे के लिए एक भी सैनिक नहीं है और केवल एक बूढ़ा दरवाजे के पास जमीन पर झाड़ू लगा रहा है। जबकि युद्ध की आम स्थिति में इस समय पश्चिमी शहर पर प्रतिरक्षा की कड़ी मुस्तैदी होनी चाहिए था।

स-मा यी के लिए और बड़ी हैरान की बात यह थी कि शहर की दीवार पर निर्मित दुर्ग के सामने चु क ल्यांग आराम से बैठा दिखाई दे रहा है। चु गल्यांन स-मा यी का पुराना और प्रबल प्रतिद्वंद्वी था। दोनों के बीच कई बार युद्ध हुए थे। स-मा यी ने ऊपर शहर की ऊंची दीवार की ओर नज़र दौड़ाई, तो देखा कि चु क ल्यांग बड़े इतमिनान के साथ खड़ा होकर अपने वस्त्रों को थोड़ा ठीकठाक कर फिर बैठ गया और सामने रखे वाद्य यंत्र पर उंगली फेरने लगा। मधुर संगीत की धुन उसकी उंगलियों से निकल रही थी। शहर की दरवाजे के नीचे खड़े वेई राज्य के सभी सैनिक आश्चर्य में मौन रह गए। उन्होंने सोचा नहीं था कि इतनी विशाल शक्तिशाली दुश्मन की सेना के सामने चु क ल्यांग इस तरह निश्चिंत वाद्य बजाने में मग्न होगा। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मामला क्या हुआ।

खुले दरवाजे और वाद्य यंत्र बजा रहे चु क ल्यांग को देखकर अक्लमंद और चालाकी के लिए मशहूर स-मा यी को कुछ भी नहीं सूझा। वह अच्छी तरह जानता था कि चु क ल्यांग असाधारण रूप से बुद्धिमान और चतुर है और युद्ध में बड़ी सावधानी से काम लेता है । अब उसे शहर का दरवाजा पूरा खोल कर वेई राज्य के एक लाख सैनिकों की अगवानी करने का साहस हुआ, तो निस्संदेह शहर में उसकी तगड़ी सेना छुपी हुई है।

इस वक्त चु क ल्यांग की ओर वाद्य यंत्र की ध्वनि मंद गति से वेग चाल में बदल गई। मानो अपनी सेना को दुश्मन पर धावा बोलने का हुक्म जारी कर रहा हो। स-मा यी ने स्थिति को भांपते हुए महसूस किया कि चु क ल्यांग ने उसे फंसाने के लिए कोई चाल चली है। उसने तुरंत अपनी सेना को वहां से हट जाने का आदेश दिया।

इस तरह वेई राज्य की एक लाख सैनिकों वाली सेना घबराते हुए वहां से हट गई। चु क ल्यांग की बुद्धिमत्ता के बल पर पश्चिमी शहर को खतरे से बचाया गया। और चु क ल्यांग की यह कहानी खाली शहर की चाल के नाम से मशहूर हो गई।

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Chinese Lok Kathayen-5/ चीनी लोक कथाएँ-5

कहानी-होंगमन दावत: चीनी लोक कथा

होंगमन प्राचीन काल में छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग के उपनगर में स्थित है, जो आज के पश्चिमोत्तर चीन के शानशी प्रांत की राजधानी शीआन के अधीन लिनथोंग नगर के शिनफ़ंग कस्बे में होंगमनपु गांव में स्थित है। ईसा पूर्व साल 206 में होंगमन दावत का आयोजन किया गया था, जिसमें तत्कालीन छिन राजवंश की विरोधी दो सेनाओं के सेनापतियों श्यांग यु और ल्यू पांग ने भाग लिया। इस दावत का छिन राजवंश के अंत में हुए किसान युद्ध, श्यांग यु और ल्यू पांग के बीच हुए युद्ध पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इस दावत को अप्रत्यक्ष तौर पर श्यांग यु की हार और ल्यू पांग की विजय और बाद में ल्यू पांग के हान राजवंश की स्थापना का मुख्य कारण माना जाता है।

ईसा पूर्व 221 में चीन के प्रथम एकीकृत सामंती राजवंश छिन राजवंश की स्थापना हुई। लेकिन चीन के एकीकरण के बाद छिन राजवंश के सम्राट छिन श हुआंग बेहद तनाशाही, निरंकुश और अहंकार से भरा निकला। अपने सुखभोग के लिए छिन शहुआंग ने बेशुमार धन दौलत खर्च कर आलीशान राजमहल और मकबरा बनवाया और हूणों के आक्रमण को रोकने के लिए लम्बी दीवार का निर्माण करवाया।

छिन राजवंश के शासक प्रजा का बहुत शोषण और अत्याचार करते थे, जिससे प्रजा में उसके विरूद्ध विद्रोह भड़क उठा। इस तरह अपने साम्राज्य की स्थापना के 15 सालों के बाद ही छिन राजवंश का तख्ता पलट दिया गया और राज्य सत्ता छीनने के लिए उसमें मुख्यतः दो शक्तिशाली सेनाएं रह गईं:एक सेना प्राचीन चीन के मशहूर राजा श्यांग यु की थी और दूसरी सेना उपरांत के हान राजवंश के संस्थापक ल्यू पांग की थी।

दोनों सेनाओं के बीच राज्य सत्ता छीनने के लिए भीषण युद्ध चले। शुरू-शुरू में श्यांग यु की सेना बहुत सशक्त थी। राजा श्यांग यु एक बहादुर योद्धा था, लेकिन वह बहुत घमंडी और तानाशाही भी था। जबकि ल्यु पांग शुरू में एक छोटे पद का अधिकारी था। वह स्वभाव में चालाक था, पर दूसरे लोगों को अपने उद्देश्य के लिए वशीभूत करने में कुशल था। पहले छिन राजवंश का तख्ता पलटने के संघर्ष में दोनों सेनाओं के बीच गठबंधन कायम हुआ था, किन्तु छिन राजवंश के खत्म होने के बाद दोनों एक दूसरे का दुश्मन हो गए। श्यांग यू और ल्यू पांग ने एक दूसरे से वादा किया कि जिसकी सेना ने सबसे पहले छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग पर कब्ज़ा करेगी, श्यान यांग का राजा उसी सेना का होगा।

ईसा पूर्व 207 में श्यांग यु की सेना ने च्यु लू नाम के स्थान पर छिन राजवंश की प्रमुख सेना को परास्त कर दिया, जबकि ल्यू पांग की सेना ने भी तत्कालीन छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग पर कब्जा कर लिया। श्यान यांग पर कब्जा करने के बाद ल्यू पांग ने अपने सलाहकार की सलाह के अनुसार शहर के निकट पा शांग, जो आज के पश्चिमोत्तर चीन के शानशी प्रांत की राजधानी शीआन के पूर्व में स्थित है, पर सेना तैनात की और श्यान यांग शहर में प्रवेश नहीं करने दिया। उसने छिन राजवंश के राजमहल और खजाने को सील करने का आदेश दिया और प्रजा को सांत्वना देने का काम किया, जिससे प्रजा शांत और खुश हो गई और चाहती थी कि ल्यू पांग छिन राज्य का राजा बने।

श्यांग यु को जब पता चला कि ल्यू पांग उससे पहले श्यान यांग शहर में प्रवेश कर चुका है, तो उसे अत्यन्त आक्रोश आया। वह चार लाख सैनिकों की विशाल सेना लेकर श्यान यांग शहर के निकट होंगमन नाम के स्थान पर तैनात हो गया और बल प्रयोग से श्यान यांग शहर को छीनने के लिए तैयार हो गया। श्यांग यु के सैन्य सलाहकार फ़ान जंग ने श्यांग यु को इस मौके पर ल्यू पांग का विनाश करने की सलाह दी। उसने कहा कि ल्यू पांग एक लोभी और विलासी आदमी है, लेकिन इस बार श्यान यांग पर कब्जा करने के बाद उसने वहां से एक भी पैसा नहीं लिया और एक सुन्दरी भी नहीं चाही। इससे जाहिर है कि वे अब बड़ा महत्वाकांक्षी बन चुका है। उसके ज्यादा मजबूत न होने की स्थिति में खत्म करना चाहिए।

खबर ल्यू पांग तक पहुंची। उसके सलाहकार फुंग ल्यांग ने ल्यू पांग को सलाह देते हुए कहा कि अब ल्यू पांग की सेना में सिर्फ़ एक लाख सैनिक हैं, उसकी शक्ति श्यांग यु से बहुत कमज़ोर है, इसलिए उसके लिए श्यांग यु से साधा मोर्चा लेना उचित नहीं है।

फुंग ल्यांग ने अपने मित्र, श्यांग यु के ताऊ श्यांग पो से मदद हुवांग। इसके साथ साथ ल्यू पांग अपने सलाहकार फुंग ल्यांग और अपनी सेना में कुछ जनरलों का नेतृत्व कर होंगमन पहुंचे और श्यांग यू को बताया कि वह खुद श्यान यांग शहर की रक्षा कर रहा है और यहां रहकर श्यांग यू के आने के बाद राजा बनने का इंतज़ार कर रहा है। श्यांग यू को ल्यू पांग की बात पर भरोसा किया और होंगमन पर ल्यू पांग को एक दावत देने का निश्चय किया।

लेकिन वास्तव में श्यांग यू ने दावत में ल्यू पांग को मार डालने की साजिश रची । दावत में ल्यू पांग के साथ उसके सलाहकार फुंग ल्यांग और जनरल फ़ान ख्वाई थे। दावत के दौरान ल्यू पांग ने श्यांग यु को विनम्रता से कहा कि छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग पर कब्जा करने के बाद वह महज शहर पर पहरा दे रहा है और श्यांग यु के छिन का राजा बनने की प्रतीक्षा में है। श्यांग यु ल्यू पांग के धोखे में आ गया और उसके साथ अच्छा बर्ताव करने लगा।

दावत के दौरान श्यांग यु के सैन्य सलाहकार फ़ान जंग ने कई बार श्यांग यु को इशारा दे देकर उसे ल्यू पांग को मार डालने का गोपनीय संकेत दिया, लेकिन श्यांग यु ने न देख पाने का स्वांग किया। लाचार होकर फ़ान जंग ने श्यांग यु के एक जनरल श्यांग च्वांग को दावत में बुलाकर तलवार की कला दिखाने की आड़ में ल्यू पांग को मार डालने का प्रबंध किया। इस नाजुक घड़ी में श्यांग यु के ताऊ, यानी ल्यू पांग के सैन्य सलाहकार फुंग ल्यांग के मित्र श्यांग पो ने भी आगे आकर तलवार की कला दिखाने के बहाने अपने शरीर से श्यांग च्वांग के वार को रोकने की कोशिश की, जिससे श्यांग च्वांग को ल्यू पांग को मारने का मौका हाथ नहीं लगा। खतरनाक स्थिति में फुंग ल्यांग ने तुरंत ल्यू पांग के जनरल फ़ान ख्वाई को मदद के लिए बुलाया। फ़ान ने तलवार और ढाल उठाकर दावत में घुस कर बड़े गुस्से में श्यांग यु की आलोचना करते हुए कहा:“ल्यू पांग ने श्यान यांग शहर पर कब्जा कर लिया है, पर उसने खुद को छिन राज्य का राजा घोषित नहीं किया और महाराज आपके आने की राह देखता रहा, इस प्रकार के योगदान के लिए आपने उसे इनाम तो नहीं दिया, फिर दुष्टों की बातों में आकर उसे मार डालने की सोची। यह कैसा न्याय है।”

फ़ान ख्वाई की बातों पर श्यांग यु को बड़ी शर्म आयी। इस मौके का लाभ उठाकर ल्यू पांग शौचालय जाने का बहाना बनाकर वहां से भाग गया और दावत में भागीदार अन्य जनरल के साथ पा शांग स्थित अपनी सेना के शिविर में वापस लौटा।

उधर श्यांग यु के सलाहकार फ़ान जंग ने जब देखा कि श्यांग यु ने इतने दयालु और नरम दिल का परिचय देकर ल्यू पांग को भागने का मौका दिया, तो बड़े गुस्से में कहा:“श्यांग यु कोई महत्वाकांक्षी व्यक्ति नहीं है। इंतजार करो ल्यू पांग जरूर पूरे देश पर कब्जा करेगा।”

होंगमन स्थान पर हुई दावत की यह कहानी चीन के इतिहास में बहुत मशहूर है। श्यांग यु ने अपनी सेना के शक्तिशाली होने के घमंड में ल्यू पांग पर विश्वास किया और उसे जिन्दा भागने दिया। इसके बाद श्यांग यु ने खुद को पश्चिमी छु यानी शी छू का राजा घोषित किया, जिसका स्थान सम्राट के बराबर था। उसने ल्यू पांग को सुदूर क्षेत्र में“हान राजा”नियुक्त किया, जो स्थानीय राजा के तुल्य था। अपनी शक्ति को सुरक्षित रखने के लिए ल्यू पांग ने श्यांग यु को शासक मान लिया। लेकिन गुप्त रूप में वह विभिन्न प्रतिभाशाली लोगों को अपने पक्ष में लाने और अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा था। अंत में ल्यू पांग की सैन्य शक्ति श्यांग यु से भी मजबूत हो गयी। एक बार श्यांग यू अपनी सेना का नेतृत्व कर दूसरे छोटे राज्य पर आक्रमण करने बाहर निकला, तो ल्यू पांग इस मौके का लाभ उठाकर श्यांग यू के शी छू राज्य की राजधानी श्यान यांग पर हमला कर उस पर कब्ज़ा कर लिया। इस तरह श्यांग यू और ल्यू पांग दोनों के बीच चार साल तक युद्ध चला। इसे चीनी इतिहास में“छू हान का युद्ध”कहा जाता है। छू राज्य की सेना ने अधिक शक्तिशाली होने की वजह से कई बार हान राज्य की सेना को हराया। लेकिन श्यांग यू का स्वभाव क्रूर था और इसके नेतृत्व वाली सेना किसी जगह पर कब्जा करने के बाद हत्या और आगजनी करती थी, इस तरह श्यांग यू की सेना का जनता समर्थन नहीं करती थी। धीरे-धीरे श्यांग यू के शी छू राज्य की सेना शक्तिशाली से कमज़ोर हो गयी। उधर ल्यू पांग जनता का समर्थन हासिल करने के लिए प्रयासरत था। वह सुयोग्य व्यक्तियों का इस्तेमाल करने में निपुण था। ल्यू पांग की शक्ति शक्तिशाली होने लगी और अंत में उसने श्यांग यू को हरा दिया।

ईसा पूर्व 202 में ल्यू पांग की सेना ने काइ श्या, यानी आज के पूर्वी चीन के आनहुइ प्रांत की लिंगपी कांउटी के दक्षिण में स्थित जगह, पर श्यांग यु की सेना को घेरकर खत्म कर दिया। वहां श्यांग यु ने आत्महत्या कर ली। अंत में ल्यू पांग ने चीन के हान राजवंश की स्थापना कर खुद को सम्राट घोषित किया। हान राजवंश चीन के इतिहास में दूसरा एकीकृत सामंती राजवंश था।

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Chinese Lok Kathayen-1/ चीनी लोक कथाएँ-1

कहानी-दो भाई चांग और हुवांग: चीन की लोक कथा

एक गांव में दो भाई रहते थे, उनका नाम था चांग और हुवांग। कहने को तो दोनों सगे भाई थे परंतु उनकी आदत एक दूसरे के विपरीत थी ।

चांग बहुत उदार और नेकदिल था । वह अपने बड़ों का आदर और छोटों से प्यार करता था । उसने खूब मेहनत करके अपार धन कमाया था । उसके यहां अनेक नौकर-चाकर थे और वह अपने नौकरों के प्रति बहुत दयावान था । उनकी परेशानी में उनकी सहायता करता था । इस कारण उसके नौकर उसे दिल से प्यार करते थे ।

इसके ठीक विपरीत हुवांग क्रूर स्वभाव का था । उसमें दया और प्रेम की भावना बिलकुल भी नहीं थी । वह अकड़ू और कठोर इंसान था । परंतु व्यापार के मामले में किस्मत ने उसका साथ दिया था । इस कारण उसका व्यापार खूब फल-फूल रहा था । उसके यहां नौकर तो बहुत थे, परंतु कोई अंदर से खुश नहीं था ।

हुवांग अपने नौकरों से सुबह से शाम तक काम करवाता, परंतु तनख्वाह बहुत कम देता था । बीमार होने पर भी उन्हें छुट्टी नहीं देता था । यदि किसी नौकर के परिवार में कोई बीमार हो अथवा कोई परेशानी हो, हुवांग उसकी कोई भी सहायता करने से इन्कार कर देता था ।

कई बार दुखी होकर कुछ नौकर हुवांग का काम छोड़ने की सोचते थे, परंतु अपने मालिक के साथ नमक हरामी करना पसंद नहीं करते थे । वह कहते थे कि हम जब तक जिंदा रहेंगे, मालिक की सेवा करते रहेंगे । मालिक चाहे जैसा भी हो, वह हमारा अन्नदाता होता है । उसकी सेवा करना हमारा फर्ज है । इसी कारण कोई भी नौकर उसके यहां दुख सहते हुए भी नौकरी छोड़कर नहीं जाता था ।

चांग यह देखकर मन ही मन बहुत दुखी होता था कि हुवांग के सारे नौकर इतना कष्ट सह रहे हैं । चांग ने अपने भाई को कई बार समझाने की कोशिश की, परंतु वह कुछ समझता ही नहीं था ।

धीरे-धीरे हुवांग का व्यापार चौपट होने लगा। उसके बुरे व्यवहार व रूखी भाषा के कारण सभी लोग उससे व्यापार करने में कतराने लगे थे । एक दिन चांग ने हुवांग से कहा – “भाई, ईश्वर का दिया हम लोगों के पास सब कुछ है । फिर भी तुम अपने नौकरों से इतना बुरा व्यवहार क्यों करते हो ?”

हुवांग थोड़ा क्रोधित होते हुए बोला – “मैं तो किसी से दुर्व्यवहार नहीं करता, तुम यूं ही मुझ पर आरोप लगा रहे हो ।”

चांग ने कहा – “मैं जानता हूं कि तुम्हारे नौकर बहुत दुखी हैं, यदि तुम अपने नौकरों को ठीक तनख्वाह देकर मीठा व्यवहार नहीं कर सकते तो तुम किसी और शहर में जाकर अपना व्यापार शुरू कर दो । मुझसे अपनी आंखों के सामने ऐसा व्यवहार देखा नहीं जाता । तुम्हारे जाने के बाद मैं तुम्हारे नौकरों को अपने पास रख लूंगा ।”

यह सुनकर हुवांग ने अपने भाई को बहुत भला-बुरा कहा और चांग चुपचाप वहां से चला गया ।

चांग अपने भाई को सुधारने के लिए कोई उपाय सोचने लगा । एक दिन वह विचारों में खोया था । तभी उसका पुराना नौकर उसके पास आया और बोला – “मालिक, मैं जानता हूं कि आप क्यों परेशान हैं ? आप कहें तो मैं आपकी सहायता कर सकता हूं ।”

नौकर की बात सुनकर चांग का ध्यान भंग हो गया । वह बोला – “तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो ?”

नौकर ने कहा – “मैं चाहे जो करूं, पर उससे हुवांग साहब जरूर सुधर जाएंगे या फिर शहर छोड़कर चले जाएंगे ।”

चांग बोला – “क्या तुम जानते हो कि यह कितनी मुसीबत का काम है ?”

नौकर ने जवाब दिया – “हां मालिक, मैं अच्छी तरह जानता हूं । पर आपके लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं । बस, आप मुझे आज्ञा दीजिए ।”

इसके पश्चात् बूढ़े नौकर ने अपनी योजनानुसार रात्रि में हुवांग के घर में प्रवेश किया और जब हुवांग चैन से गहरी नींद सो गया तो उसने धीरे से हुवांग का कम्बल उतारा और खिड़की के रास्ते भाग गया ।

सुबह को हुवांग उठा तो उसे बहुत तेज सर्दी लग रही थी । उसने ढूंढ़ा परंतु उसका कम्बल कहीं नहीं मिला । उसे क्रोध आ गया । फिर जब वह दिन में अपने व्यापार पर गया तो वहां एक पैकेट पड़ा पाया । हुवांग ने पैकेट खोला तो उसका कम्बल वहां रखा था, उस पर एक पर्ची लगी थी जिस पर लिखा था – “अपने लोगों से व्यवहार सुधार ले, वरना छोड़ूंगा नहीं ।”

हुवांग को लगा कि जरूर यह उसके नौकरों की चाल है । अगले दिन वह अपने कमरे के भीतर सोया । परंतु जब सुबह उठा तो यह देखकर हैरान रह गया कि उसका तकिया गायब है । उसे बड़ा क्रोध आने लगा । उसने नौकरों को अच्छी-खासी डांट पिलाई । परंतु नौकर शिष्टाचार पूर्वक माफी मांगते रहे और कुछ न बोले ।

वह व्यापार को जाने के लिए तैयार हो रहा था कि तभी कोई उसके दरवाजे पर एक बड़ा पैकेट छोड़ गया । उसने देखा कि उसके सारे नौकर उसके ही सामने खड़े थे । उसने धड़कते दिल से पैकेट खोला तो देखा कि उसमें उसका तकिया रखा था जिस पर एक पर्ची लगी थी । पर्ची पर लिखा था – “अपना व्यवहार बदल लो वरना… ।”

हुवांग डर गया । अगले दिन वह रात्रि होने पर बहुत देर तक जागता रहा ताकि वह तकिया कम्बल ले जाने वाले को पकड़ सके । परंतु आधी रात तक कोई नहीं आया । वह बैठा इंतजार करता रहा कि न जाने कब उसे नींद आ गई ।

हुवांग सुबह को उठा तो उसने देखा कि उसका बिस्तर सही सलामत है। वह बहुत खुश हुआ । तभी उसको देखकर उसका एक नौकर हंसने लगा । उसे बड़ा क्रोध आया । उसके बाद जो भी उसे मिलता उसे देखकर हंसने लगता । हुवांग को कुछ भी समझ में न आया । कुछ देर बाद जब वह शीशे के सामने गया तो उसे हकीकत मालूम हुई ।

हुवांग डर के मारे थर-थर कांपने लगा । कोई उसकी एक मूंछ व सिर के आधे बाल काट कर ले गया था । हुवांग को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे ? उसे लगने लगा कि यदि कोई उसकी मूंछ काट सकता है तो कल उसकी गरदन भी काट सकता है । उसने तुरंत नौकरों को आदेश दिया – “मेरा सारा सामान बांध दो । मैं दूसरे शहर में जाकर व्यापार करना चाहता हूं ।”

नौकर कुछ समझ ही न सके । हुवांग सिर पर टोपी लगाकर व दूसरी मूंछ पूरी तरह साफ करके अपने व्यापार के लिए चल दिया ताकि अपना व्यापार बंद करके कहीं और जाने का इंतजाम कर दे ।

रास्ते में उसे चांग मिला । वह चांग से नजरें चुराने लगा । बिना मूंछों के उसकी शक्ल पहचानी नहीं जा रही थी । चांग ने उसे रोक लिया और पूछा – “तुम इतने घबराए हुए कहां जा रहे हो ?”

हुवांग बोला – “भाई तुम ठीक कहते थे । मैंने भी अब निर्णय कर लिया है कि मैं अपना व्यापार दूसरे शहर में जाकर करूंगा ।”

चांग ने बहुत पूछा, तब उसने सारी घटना बता दी । हुवांग को अपने बुरे व्यवहार के लिए भी पश्चाताप था । चांग ने कहा – “यदि तुम्हें विश्वास है कि अब तुम अपने नौकरों व अन्य लोगों से दुर्व्यवहार नहीं करोगे तो मेरी प्रार्थना है कि तुम यहीं रहो ।”

हुवांग अपने भाई की बात मान कर वहीं रहने लगा । अब चांग-हुवांग व उनके सभी नौकर बहुत खुश थे ।

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Italy ki Lok Kathayen-7(इटली की लोक कथाएँ-7)

कहानी- वफ़ादार शेर: इटली की लोक कथा

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पुराने समय में यूरोप में धनी लोग अपने यहाँ गुलाम रखा करते थे । उन गुलामों को अपने स्वामी की हर आज्ञा का पालन करना पड़ता था । ऐसे ही एक दास का नाम एन्ड्रोक्लीज़ था । एन्ड्रोक्लीज़ का स्वामी अपने गुलामों के साथ जानवरों सा व्यवहार करता था । उनसे बहुत काम लिया जाता था फिर भी उन्हें भूखा रहना पड़ता था । एन्ड्रोक्लीज़ को भी दिन-रात यातना सहनी पड़ती । एक दिन वह यातनाओं से तंग आकर चुपके से भाग गया । वह जंगल की पहाड़ियों के बीच एक गुफा में रहने लगा ।

एक दिन वह जंगल में घूम रहा था कि उसने सामने से आते हुए एक शेर को देखा । एन्ड्रोक्लीज़ डर गया । वह शेर से दूर भागना चाहता था परंतु उसे उपयुक्त अवसर नहीं मिला । शेर धीरे- धीरे उसके पास आया और बैठ गया । वह अपना अगला पैर बार – बार उठाकर एन्ड्रोक्लीज़ को कुछ इशारा कर रहा था । उसका भय दूर हो गया । उसने ध्यान से देखा तो पाया कि शेर के पंजे में एक बड़ा-सा काँटा गड़ा हुआ था । उसने तुरन्त काँटा खींचकर निकाल दिया और घाव पर जड़ी-बूटियों का रस डाल दिया । शेर को आराम मिला । उसने एन्ड्रोक्लीज़ को कोई हानि नहीं पहुँचाई ।