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Norway ki Lok Kathayen-2/ नॉर्वे की लोक कथाएँ-2

भालू ने अपनी पूँछ कैसे खोयी: नॉर्वे की लोक-कथा

बच्चो, क्या तुम जानते हो कि भालू करीब करीब हर जानवर पर जो भी उसको जंगल में मिलता है क्यों गुर्राता है? वह ऐसा हमेशा से नहीं था।

पहले जब भी कोई उसके पास आता था तो उसको देख कर वह बड़े दोस्ताना अन्दाज़ में अपनी लम्बी पूँछ हिलाता था जैसे कि कुत्ते हिलाते हैं और बहुत प्यार से बात करता था।

पर आजकल? आजकल ऐसा नहीं है। तो फिर वह ऐसा कैसे हुआ?

तो हुआ यों कि एक बार जाड़े के एक दिन में एक मछियारे ने बहुत सारी मछलियाँ पकड़ीं और उन सबको एक रस्सी में बाँध कर पानी में वहीं छोड़ दिया ताकि वे ताजा रहें।

चालाक लोमड़े ने यह देख लिया कि मछियारे ने मछलियाँ पकड़ीं और उनको पकड़ कर पानी में ही छोड़ दीं और वह चला गया। सो जब वह मछियारा उधर नहीं देख रहा था तो उसने उसकी उन मछलियों को चुरा लिया और उनको ले कर घर चल दिया।

घर जाते समय उसको रास्ते में बैठा एक भालू दिखायी दे गया। भालू ने लोमड़े को बहुत सारी मछलियाँ ले जाते देखा तो उसको देख कर उसने अपने दोस्ताना अन्दाज में उसकी तरफ अपनी पूँछ हिलायी।

उसको वे मछलियाँ देखने और खुशबू में बहुत ही अच्छी लग रहीं थीं सो भालू ने लोमड़े से पूछा — “लोमड़े भाई, ये मछलियाँ तुमको कहाँ से मिलीं?”

लोमड़े ने झूठ बोला — “मिलेंगी कहाँ से? मैंने इनको पकड़ा है। ”

असल में लोमड़े को बहुत शरम आ रही थी क्योंकि उसको लगा कि भालू ने उसको वे मछलियाँ चुराते हुए देख लिया था। पर ऐसा कुछ नहीं था। भालू को तो यह पता ही नहीं था कि लोमड़े ने ये मछलियाँ चुरायी थीं।

भालू ने फिर पूछा — “लेकिन तुमने इनको पकड़ा कैसे लोमड़े भाई, झील तो सारी जमी पड़ी है?”

लोमड़े ने फिर झूठ बोला — “मेरे पास इनको पकड़ने का एक खास तरीका है। ”

भालू बोला — “ये मछलियाँ तो दिखायी भी बहुत अच्छी दे रही हैं लोमड़े भाई और खुशबूदार भी बहुत लग रही हैं। क्या तुम इनमें से थोड़ी सी मुझे भी दोगे?”

लोमड़ा बोला — “नहीं भाई। तुम अपनी मछलियाँ अपने आप पकड़ो। ”

भालू बड़ी नम्रता से बोला — “मैं भी ऐसी मछली पकड़ना चाहता हूँ। क्या तुम मुझको मछली पकड़ने का अपना वह खास तरीका बताओगे जिससे मैं भी इस जमे हुए बरफ में से ऐसी ही मछलियाँ पकड़ सकूँ?” और ऐसा कह कर उसने अपनी पूँछ फिर से हिलायी।

लोमड़ा भालू के साथ उस झील पर फिर से जाना नहीं चाहता था क्योंकि उसको डर था कि वह मछियारा कहीं उसको पकड़ न ले जिसकी मछलियाँ उसने चुरायी थीं।

पर उसको भालू का उसकी तरफ देख कर बार बार पूँछ हिलाना भी अच्छा नहीं लग रहा था सो उसने भालू से एक और झूठ बोलने का निश्चय किया।

लोमड़े ने भालू से कहा — “मछलियाँ पकड़ना बहुत आसान है भालू भाई। मैं तुम्हें बताता हूँ। पहले तुम बरफ में एक छेद करो फिर तुम उस छेद पर ऐसे बैठ जाओ जिससे तुम्हारी पूँछ उस छेद में नीचे गिर जाये। पर तुमको अपनी पूँछ पानी में काफी देर तक लटकानी पड़ेगी।

सो अगर तुम्हारी पूँछ को थोड़ी तकलीफ भी हो तो चिन्ता मत करना क्योंकि उस तकलीफ का मतलब होगा कि मछलियाँ तुम्हारी पूँछ को काट रही हैं। जितनी ज़्यादा देर तक तुम अपनी पूँछ पानी में रखोगे उतनी ही ज़्यादा मछलियाँ तुम पकड़ पाओगे।

जब तुम देखो कि अब तुम अपनी पूँछ हिला भी नहीं पा रहे हो तो समझना कि अब तुम अपनी पूँछ बाहर निकालने के लिये तैयार हो। बस फिर तुम एक दम से उठ कर खड़े हो जाना और जितनी जल्दी से अपनी पूँछ बाहर निकाल सको निकाल लेना। ”

उफ़, यह चालाक लोमड़ा भालू से कितना झूठ बोला?

भालू ने उसको बड़ी नरमी से धन्यवाद दिया और एक बार फिर से अपनी लम्बी पूँछ हिलाता हुआ उस जमी हुई झील की तरफ चल दिया।

रास्ते में भालू ने एक मछियारे से बरफ खोदने वाला औजार और एक आरी उधार माँगी और उनसे उसने जमी हुई झील की बरफ में एक छेद किया।

जैसे लोमड़े ने उस मछियारे की बिना इजाज़त के उसकी मछलियाँ चुरा ली थीं भालू ने ऐसा नहीं किया।

जब भालू का छेद तैयार हो गया तो उसने उस मछियारे के औजार वापस किये और उससे इजाज़त ले कर वह उस छेद पर आ कर बैठ गया। उसने अपनी लम्बी पूँछ उस छेद में अन्दर डाल दी।

उतनी कड़ी सरदी में उस ठंडे पानी में अपनी पूँछ डाल कर बैठना उसको बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था पर वैसी ही सुन्दर, ताजा और खुशबूदार मछलियाँ पकड़ने के लिये वह यह भी करने को तैयार था।

वह बेचारा वहाँ तब तक बैठा रहा जब तक पानी ने उसकी पूँछ के चारों तरफ जमना नहीं शुरू किया।

पानी जमने की वजह से अब उसकी पूँछ में दर्द होना शुरू हो गया था तो उसको लोमड़े की बात याद आयी कि “अगर तुम्हारी पूँछ में थोड़ा बहुत दर्द भी हो तो चिन्ता मत करना, यह समझना कि मछलियाँ तुम्हारी पूँछ को काट रही हैं। ”

इसलिये वह वहाँ खुशी खुशी बैठा रहा और तब तक बैठा रहा जब तक उसकी पूँछ के चारों तरफ का पानी ठोस तरीके से जम नहीं गया।

जब भालू को लगा कि अब वह अपनी पूँछ बिल्कुल भी नहीं हिला पा रहा है तो उसने सोचा कि लगता है कि अब उसकी पूँछ से बहुत सारी मछलियाँ चिपक गयी हैं इसलिये अब खड़े होने का समय आ गया है। वह खड़ा हो गया और एक झटके से उसने अपनी पूँछ पानी में से बाहर खींच ली।

भालू तो बहुत ताकतवर जानवर होता है सो जैसे ही उसने अपनी पूँछ बाहर खींची वह बाहर तो निकल आयी। पर यह क्या?

उसकी पूँछ तो अभी भी पानी में रह गयी थी। वह इसलिये कि पानी में जमी रहने की वजह से उसकी पूरी पूँछ निकल ही नहीं पायी और झटके से खींचने की वजह से टूट गयी।

जो पूँछ उसकी बाहर थी उसमें कोई मछली नहीं थी और बाकी की पूँछ उसकी पानी के अन्दर ही रह गयी थी। बस अब तो वह एक बहुत ही छोटी सी पूँछ वाला जानवर रह गया था।

भालू को लोमड़े पर बहुत गुस्सा आया कि लोमड़े ने उसके साथ इतने नीच किस्म की यह चालाकी खेली।

उस दिन के बाद से भालू की पूँछ बढ़ी ही नहीं, वह उतनी की उतनी ही है। और तभी से वह जंगल में जब किसी से भी मिलता है तो उससे वह प्रेम का बरताव नहीं करता और हर एक पर गुर्राता ही रहता है।

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Japan ki Lok Kathayen-4/ जापान की लोक कथाएँ-4

कहानी-मैले कपड़े: जापानी लोक-कथा

जापान में ओसाका शहर के निकट गांव में एक विद्वान संत रहते थे। एक दिन संत अपने एक अनुयायी के साथ सुबह की सैर कर रहे थे। अचानक एक व्यक्ति उनके निकट आया और उन्हें भला बुरा कहने लगा। संत मुस्कराकर चल दिए। संत पर कोई असर न देख वह व्यक्ति परेशान हो गया। वह गुस्से से तमतमा उठा और उनके पूर्वजों को गालियां देने लगा। फिर भी संत मुस्कराते रहे। संत पर जब कोई असर नहीं हुआ तो वह व्यक्ति निराश होकर रास्ते से हट गया।

उस व्यक्ति के जाते ही एक अनुयायी ने संत से पूछा- ‘आपने उस दुष्ट की बातों का कोई जवाब क्यों नहीं दिया, वह बोलता रहा और आप मुस्कराते रहे। क्या आपको उसकी बातों से जरा भी कष्ट नहीं हुआ?’

संत कुछ नहीं बोले और अपने अनुयायी को पीछे आने का इशारा किया कुछ देर बाद संत के साथ वह अनुयायी कक्ष में पहुंचा। संत बोले- ‘तुम यहीं रुको, मैं अंदर से अभी आता हूं।’

कुछ देर बाद संत अपने कमरे से निकले तो उनके हाथों में कुछ मैले कपड़े थे। उन्होंने बाहर आकर उस अनुयायी से कहा, ‘ये लो, तुम अपने कपड़े उतारकर इन्हें धारण कर लो।’

उस व्यक्ति ने देखा कि उन कपड़ों में बड़ी तेज दुर्गध है, उनसे अजीब-सी बदबू आ रही थी। अनुयायी ने उस कपड़े को हाथ में लेते ही उन कपड़ों को दूर फेंक दिया।

संत बोले- ‘अब समझे ? जब कोई तुमसे बिना मतलब के भला-बुरा कहता है तो तुम क्रोधित होकर उसके फेंके हुए अपशब्द धारण कर लेते हो, लेकिन दूसरे के गंदे कपड़े नहीं पहन सकते जिस तरह तुम अपने साफ-सुथरे कपड़ों की जगह ये मैले कपड़े धारण नहीं कर सकते उसी तरह मैंने भी उस आदमी के फेंके हुए अपशब्दों को धारण नहीं किया। यही वजह थी कि मुझे उसकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा।’

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Denmark ki Lok Kathayen-7/ डेनमार्क की लोक कथाएँ-7

कहानी-जंगली हंस: डेनमार्क की लोक कथा

बहुत दूर एक देश में जहाँ ठंड में चिड़ियें उड़ती हैं, यानी डेनमार्क देश में, एक राजा रहता था। उसके 11 बेटे थे और एक बेटी थी जिसका नाम था ऐलीसा । इन बच्चों की माँ नहीं थी।

राजा के 11 बेटे अपनी कमर में तलवार लटका कर और अपनी छाती पर एक तारा लगा कर स्कूल जाते थे। वे हीरे की कलम से सोने की स्लेट पर लिखते थे। उनको अपने पाठ ऐसे जबानी याद थे जैसे वे उसको किताब से पढ़ रहे हों। तुम उनको देख कर ही यह कह सकते थे कि वे कितने राजकुमार जैसे लगते थे।

उनकी बहिन ऐलीसा एक साफ सुथरे शीशे के नीचे स्टूल पर बैठती थी। उसके पास तस्वीरों की एक किताब थी जिसकी कीमत राजा के आधे राज्य के बराबर थी।

सब बच्चे बहुत खुशी खुशी रह रहे थे पर उनकी यह खुशी बहुत दिनों तक नहीं रही।

कुछ दिन बाद उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली। उनकी नयी माँ एक बहुत ही बुरी स्त्री थी। वह राजा के बच्चों को ठीक से नहीं रखती थी। बच्चों ने यह बात पहले दिन से ही जान ली थी।

एक दिन सारे महल में खूब खाना पीना चल रहा था। बच्चे भी मेहमानों के स्वागत में लगे हुए थे। पर उनको केक और बेक किये गये सेब के मिलने की बजाय जो ऐसी दावतों में उनको अक्सर मिला करता था उनकी नयी सौतेली माँ ने उनको प्याले में रेत भर कर दे दिया। और उनसे कहा कि वे उसको खास खाना समझ कर खायें। बच्चों को यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा।

अगले हफ्ते रानी ने ऐलीसा को एक गाँव में कुछ किसानों के साथ रहने के लिये भेज दिया। और इस बीच उसने राजा को बच्चों के बारे में कुछ झूठी बातें कह कर उसका मन ऐसा कर दिया कि राजा का मन अपने बच्चों से फिर गया।

एक दिन रानी ने राजकुमारों से कहा — “जाओ, तुम लोग बड़ी चिड़िया बन कर उड़ जाओ जिसकी आवाज नहीं होती और जा कर अपनी रोजी रोटी अपने आप कमाओ। ”

पर वह राजकुमारों को इतना नुकसान नहीं पहुँचा सकी जितना कि वह चाहती थी। क्योंकि उसके यह कहते ही वे बहुत ही खूबसूरत 11 सफेद हंसों में बदल गये और एक अजीब सी आवाज के साथ महल की खिड़की से बाहर बागीचे के पार जंगल में उड़ गये।

अभी सुबह होने में देर थी और ऐलीसा अभी सो ही रही थी कि वे हंस उसकी झोंपड़ी के ऊपर से उड़े जहाँ वह रह रही थी। वे उसकी झोंपड़ी की छत पर उतर गये।

वहाँ उन्होंने अपनी लम्बी गरदन को इधर उधर घुमाया, अपनी चोंचों से उस झोंपड़ी की छत को खुरचा, अपने पंख फड़फड़ाये पर न तो उनको किसी ने देखा और न ही उनको किसी ने सुना।

सो वे बेचारे फिर आसमान में ऊपर बादलों में उड़ गये और दुनिया में दूर चले गये। उड़ते उड़ते वे एक बड़े से घने जंगल में आ गये जो समुद्र तक फैला चला गया था।

ऐलीसा बेचारी वहीं किसान की झोंपड़ी में रहती और एक हरी पत्ती से पीकेबू खेलती रहती क्योंकि उसके पास खेलने के लिये और कोई चीज़ ही नहीं थी।

वह पत्ते में एक छेद बना लेती और उस छेद में से सूरज को देखती। उस छेद में से सूरज को देख कर उसको ऐसा लगता जैसे वह अपने भाइयों की चमकीली आँखें देख रही हो।

और जब भी सूरज की गरम किरणें उसके गालों को छूतीं तो उसको लगता जैसे उसके भाई उसको प्यार कर रहे हों।

एक दिन हवा चली और उसने उस झोंपड़ी के चारों तरफ लगी गुलाब के पौधों की दीवार पर लगे गुलाबों को हिला दिया और उनके कान में फुसफुसायी — “तुमसे ज़्यादा सुन्दर और कौन हो सकता है?”

फूल अपना सिर ना में हिला कर बोले “हम नहीं, ऐलीसा। ”

इतवार को जब उस किसान की पत्नी दरवाजे में बैठी साम्स की किताब पढ़ रही थी तो हवा ने उसकी किताब के पन्ने उड़ाये और उससे पूछा — “तुमसे बड़ा संत और कौन हो सकता है?”

वह किताब भी बोली “मैं नहीं, ऐलीसा। ”

गुलाबों ने भी कहा कि यह किताब बिल्कुल सच कह रही है।

ऐलीसा को जब वह 15 साल की हो जाती तब घर वापस जाना था पर रानी ने देखा कि वह तो बहुत ही सुन्दर राजकुमारी होती जा रही थी तो उसके मन में राजकुमारी के लिये और ज़्यादा नफरत पैदा हो गयी।

उसको उस बच्ची को भी हंस में बदलने में कोई हिचक नहीं हुई जैसे कि उसने उसके भाइयों को बदला था। पर वह यह काम उसी समय नहीं कर सकती थी क्योंकि राजा अपनी बेटी को देखना चाहता था।

सो सुबह सवेरे ही रानी अपने संगमरमर के बने कमरे में नहाने के लिये गयी जिसमें बहुत कीमती कालीन बिछा हुआ था और गद्दियाँ पड़ी हुईं थीं। व

हाँ वह अपने साथ तीन मेंढक ले गयी और उनको चूम कर उनमें से एक मेंढक से बोली — “जब ऐलीसा नहाये तो तुम उसके सिर पर बैठ जाना जिससे वह तुम्हारे जैसी आलसी हो जाये। ”

फिर वह दूसरे मेंढक से बोली — “तुम ऐलीसा के माथे पर बैठ जाना ताकि वह उतनी ही बदसूरत हो जाये जितने तुम खुद हो। ”

फिर वह तीसरे मेंढक से बोली — “तुम उसके दिल के ऊपर बैठ जाना ताकि उसके मन में हमेशा बुरी बुरी इच्छाएँ उठती रहें। ”

उसके बाद रानी ने वे तीनों मेंढक साफ पानी में छोड़ दिये। पानी में पड़ते ही वे मेंढक हरे रंग के हो गये। फिर उसने ऐलीसा को बुलाया और उसको कपड़े उतार कर नहाने के लिये जाने के लिये कहा।

जब ऐलीसा पानी में घुसी तो एक मेंढक उसके बालों से चिपक गया, दूसरा मेंढक उसके माथे से चिपक गया और तीसरा मेंढक उसके दिल पर बैठ गया। पर ऐलीसा को इसका पता ही नहीं चला।

जब वह नहा कर खड़ी हुई तो तीन लाल रंग के पौपी के फूल पानी में तैर गये। अगर वे मेंढक जहरीले न हुए होते और उस जादूगरनी ने न चूमे होते तो वे लाल गुलाब बन गये होते। पर वे उसका माथा और दिल छू कर कम से कम फूलों में तो बदल गये।

ऐलीसा इतनी ज़्यादा भोली थी कि रानी की जादूगरी भी उसके ऊपर असर नहीं कर पायी।

जब रानी ने यह महसूस किया कि उसकी जादूगरी बेकार गयी तो उसने ऐलीसा के शरीर पर अखरोट का रंग मल दिया जिससे उसका शरीर गहरे कत्थई रंग का हो गया।

उसके चेहरे पर एक गन्दी सी क्रीम का लेप कर दिया और उस के बाल बिगाड़ दिये। अब सुन्दर ऐलीसा को कोई नहीं पहचान सकता था।

फिर वह उसको राजा के पास ले गयी तो राजा तो उसको देख कर दंग रह गया। राजा ने उसको देखते ही कहा कि यह मेरी बेटी नहीं हो सकती।

उसको पहरा देने वाले कुत्ते और चिड़ियों के अलावा और कोई नहीं जानता था। और वे सब बहुत ही नम्र थे सो वे कुछ कह नहीं सकते थे।

यह सब देख कर बेचारी ऐलीसा रो पड़ी और अपने भाइयों को याद करने लगी जो अब सब बहुत दूर थे। भारी दिल से वह महल से बाहर निकल आयी और सारा दिन वह खेतों और मैदानों में घूमती रही।

घूमते घूमते वह एक बड़े जंगल में आ निकली। वह नहीं जानती थी कि अब वह कहाँ जाये। वह बहुत दुखी थी और बस उसकी यही इच्छा थी कि काश उसके भाई उसके पास होते।

उसको लगा कि लगता है वे भी उसी की तरह से महल से बाहर निकाल दिये गये होंगे सो उसने तय किया कि वह उनको ढूँढ कर ही रहेगी।

वह अभी कुछ ही देर जंगल में ठहरी थी कि रात होने लगी। उसको लगा कि वह रास्ता भूल गयी थी। सो उसने अपनी रात की प्रार्थना की और एक जगह मुलायम सी घास देख कर उस पर लेट गयी। उसने एक पेड़ की लकड़ी का तकिया बना लिया था।

सब कुछ शान्त था। हवा बहुत ही धीरे बह रही थी। बहुत सारे पटबीजने इधर उधर घास में चमक रहे थे। वह जल्दी ही सो गयी। सारी रात वह अपने भाइयों के ही सपने देखती रही।

सपने में उसने देखा कि जैसे वे सब फिर से बच्चे बन गये हैं। आपस में खेल रहे हैं। अपनी हीरों की कलम से सोने की स्लेटों पर लिख रहे हैं। और वह अपनी तस्वीरों की किताब देख रही है। उसमें छपी हुई हर तस्वीर उसको जानदार दिखायी दे रही थी।

जब वह सुबह उठी तो सूरज बहुत देर का निकल आया था। पहले तो उसको साफ साफ दिखायी नहीं दिया क्योंकि पेड़ की शाखों का साया उसकी आँखों पर पड़ रहा था। पर फिर बाद में ठीक हो गया। चिड़ियें भी उसके पास आ कर उसके कन्धे पर बैठ गयीं।

तभी उसको पानी में छपाकों की आवाज आयी। वह आवाज वहाँ के एक तालाब में से आ रही थी जिसमें कई झरनों से पानी गिर रहा था। उसकी तली में बहुत सुन्दर रेत पड़ी हुई थी।

हालाँकि उस तालाब के चारों तरफ घनी झाड़ियाँ लगी हुई थीं फिर भी किसी हिरन ने पानी के पास तक जाने के लिये एक छोटा सा रास्ता बना लिया था। ऐलीसा उस रास्ते से हो कर पानी तक जा सकती थी।

उस तालाब का पानी इतना साफ था कि अगर हवा से पानी न हिल रहा हो तो उसमें पड़े पेड़ों के साये ऐसे लग रहे थे जैसे तालाब की तली में किसी ने कोई तस्वीर बना दी हो। उसमें पेड़ों की हर पत्ती का साया बहुत साफ था।

वह उस रास्ते से हो कर तालाब तक गयी और पानी में अपना चेहरा देखा तो वह तो उसे देख कर बहुत डर गयी – कितना कत्थई और कितना बदसूरत।

पर जैसे ही उसने अपना पतला सा हाथ पानी में डाल कर उस पानी से अपनी भौंहें और आँखें साफ कीं तो उसका गोरा रंग फिर से वापस आ गया। यह देख कर उसने कपड़े उतारे और उस साफ पानी में कूद गयी।

सारी दुनिया में राजा की बेटी ऐलीसा जैसी सुन्दर और कोई लड़की नहीं थी। नहा धो कर वह पानी से बाहर आयी। उसने अपने कपड़े पहने। फिर अपने लम्बे बालों की चोटी बनायी। वहाँ से वह एक झरने पर गयी और दोनों हाथों से ले कर ठंडा पानी पिया।

वह फिर जंगल में इधर उधर बिना मतलब के घूमती रही। वह बस अपने भाइयों और भगवान के बारे में ही सोचती रही कि भगवान उसको ऐसे ही नहीं छोड़ देगा। वही तो है जो भूखों के लिये खट्टे सेब उगाता है।

फिर वह एक पेड़ की तरफ चली गयी जिसकी डालियाँ फलों से लदी नीचे को झुकी जा रही थीं। वहाँ से फल खा कर वह फिर जंगल की तरफ चल दी।

आगे चल कर वह एक बड़ी शान्त जगह पहुँच गयी। वहाँ एक चिड़िया भी नहीं थी। सूरज की एक किरन भी जंगल के पेड़ों की घनी डालियों मे से हो कर जमीन तक नहीं आ रही थी।

बहुत जल्दी ही वहाँ रात हो गयी और वह भी बहुत अँधेरी रात। रात को सो कर वह सुबह को फिर चल दी।

आगे जा कर राजकुमारी को एक बुढ़िया मिली जिसके पास बैरीज़ की एक टोकरी थी। उसने उसको कुछ बैरीज़ दीं तो उसने उस बुढ़िया से पूछा कि क्या उसने 11 राजकुमारों को जंगल से जाते हुए देखा है।

बुढ़िया बोली — “मैंने 11 राजकुमारों को तो नहीं देखा पर हाँ 11 सफेद हंसों को जरूर देखा है जो सुनहरे ताज पहने हुए थे। वे एक नदी में तैर रहे थे। वह नदी यहाँ से पास में ही है। ”

कह कर वह बुढ़िया ऐलीसा को एक छोटी सी पहाड़ी की चोटी पर ले गयी। वहाँ से फिर वे दोनों नीचे उतर गये। नीचे उतरते ही नदी थी और नदी के दोनों तरफ पेड़ लगे हुए थे।

वहाँ ऐलीसा ने बुढ़िया को गुड बाई कहा और वह नदी के नीचे की तरफ चल दी जिधर वह समुद्र की तरफ जा रही थी। ऐलीसा ने देखा कि उसके सामने बहुत बड़ा समुद्र पड़ा हुआ था पर उसमें एक भी नाव या जहाज़ नहीं था। तो वह उसको कैसे पार करे।

किनारे पर अनगिनत पत्थर और लोहे के छोटे छोटे टुकड़े पड़े थे जिनको समुद्र का पानी किनारे पर डाल गया था। उसने सोचा कि एक दिन यह समुद्र का पानी जैसे वे पत्थर यहाँ डाल गया है उसी तरह से वह उसको भी उसके भाइयों के पास ले जायेगा।

वहाँ समुद्री घास भी उगी हुई थी। वहाँ उसको सफेद हंसों के कुछ पंख मिल गये तो वह उसने इकठ्ठे कर लिये। उन पर अभी भी पानी की बूँदें थीं पर वे बूँदें पानी की थीं या फिर आँसू की यह नहीं कहा जा सकता। ऐलीसा वहीं बैठ गयी और बहुत देर तक समुद्र को देखती रही।

शाम को उसको 11 सफेद हंस दिखायी दिये जिनके सिर पर सुनहरे ताज रखे हुए थे। वे उड़तेे हुए किनारे की तरफ ही आ रहे थे। जब वे एक के पीछे एक उड़ रहे थे तो वे ऐसे लग रहे थे जैसे आसमान में कोई सफेद रिबन उड़ा चला आ रहा हो।

ऐलीसा वहाँ से उठ कर एक झाड़ी के पीछेे छिप गयी। हंस वहीं तक आ गये जहाँ ऐलीसा छिपी हुई थी।

जब सूरज समुद्र के नीचे जा रहा था तो उन हंसों ने अपने अपने पंख उतार दिये और अब वहाँ 11 सुन्दर राजकुमार खड़े थे। वे उसके भाई थे। हालाँकि उनकी शक्लें काफी बदल गयी थीं पर फिर भी उसको पूरा विश्वास था कि वह उनको पहचानने में गलती नहीं कर सकती।

उनको देख कर वह रोती हुई अपनी जगह से निकली और अपने सारे भाइयों का अलग अलग नाम लेते हुए उनकी बाँहों में जा कर गिर गयी। वे अपनी छोटी बहिन को देख कर बहुत खुश हुए। वे भी अपनी बहिन को पहचान गये थे हालाँकि वह भी अब लम्बी और सुन्दर हो गयी थी।

वे रो रहे थे, वे हँस रहे थे। उनको तुरन्त ही पता चल गया कि उनकी सौतेली माँ ने उन सबके साथ बहुत बेरहमी का बरताव किया है।

बड़े भाई ने अपनी बहिन को बताया — “हम सब जब तक सूरज आसमान में है तब तक जंगली हंस के रूप में उड़ने के लिये मजबूर किये गये। और जब सूरज डूब जाता है तब हम आदमी के रूप में आ सकते हैं।

इसलिये जब सूरज डूबने वाला होता है तो हमको यह देखना पड़ता है कि हम किसी ऐसी जगह के आस पास हो जहाँ हम खड़े हो सकें। क्योंकि अगर उस समय हम आसमान में हुए तो हमारे नीचे गिर जाने का डर है।

हम लोग यहाँ इस किनारे पर नहीं रहते। इस समुद्र के उस पार एक और जमीन है जो इतनी ही अच्छी है वहाँ रहते हैं और वहाँ पहुँचने के लिये हमें इस समुद्र को पार करना पड़ता है।

हमारे इस रास्ते पर कोई ऐसा टापू नहीं है जहाँ हम रात बिता सकें। बस एक छोटी सी चट्टान है जो समुद्र के बीच में उठी हुई है। वह चट्टान भी इतनी बड़ी नहीं है जो हम सबको जगह दे सके।

हाँ अगर हम बहुत ही पास पास खड़े हों तब हम उसके ऊपर आराम कर सकते हैं। पर अगर समुद्र में तूफान आने लगे तब वहाँ बहुत मुश्किल हो जाती है पर फिर भी वह हमारे लिये एक सहारा तो है ही।

जब हम अपनी आदमी की शक्ल में होते हैं तब हम वहाँ आराम करते हैं। बिना उस चट्टान के हम अपने घर कभी नहीं आ सकते हैं क्योंकि हमको यहाँ आने के लिये साल के दो सबसे ज़्यादा लम्बे दिन लगते हैं।

हमको यहाँ अपनी जमीन पर साल में केवल एक बार आने की और केवल 11 दिन रहने की ही इजाज़त है।

जब हम इस जंगल के ऊपर से उड़ते हैं तो अपना महल देख लेते है जहाँ हमारे पिता रहते हैं और जहाँ हम पैदा हुए थे। यहाँ से हम अपने उस चर्च की ऊँची मीनार भी देख सकते हैं जहाँ हमारी माँ सोयी हुई है।

यह बहुत अच्छा हुआ कि हमने तुमको यहाँ देख लिया। हम यहाँ दो दिन ज़्यादा रह सकते हैं पर उसके बाद हमको अपनी जमीन पर चले जाना चाहिये जो हमारी तो नहीं है पर ठीक है।

पर हम तुमको अपने साथ कैसे ले जायें क्योंकि न तो हमारे पास कोई जहाज़ है और न ही कोई नाव। ”

ऐलीसा बोली — “पर मैं तुमको इस जादू से कैसे आजाद कराऊँ?”

वे लोग बस कुछ ही देर सोये होंगे वरना तो उनकी सारी रात यही सब बात करते करते बीत गयी।

सुबह को ऐलीसा की आँख हंसों के पंख के फड़फड़ाने से खुली। उसके सब भाई सुबह होते ही हंस बन चुके थे और वे सब ऊपर आसमान में उड़ रहे थे। उसके बाकी सब भाई तो चले गये पर उसका सबसे छोटा भाई उसी के पास रह गया।

वह उसकी गोद में सिर रख कर लेटा हुआ था और वह उसके पंख सहला रही थी। उन दोनों ने सारा दिन साथ साथ बिताया। शाम को उसके दूसरे भाई भी वापस आ गये। जब सूरज डूब गया तो उसके सभी भाई फिर से आदमी बन गये।

उसका एक भाई बोला — “कल हम लोग चले जायेंगे और फिर एक साल तक नहीं आयेंगे। पर हम तुमको यहाँ ऐसे भी नहीं छोड़ सकते। क्या तुम हमारे साथ चलने की हिम्मत रखती हो?

जब मेरी बाँहें इतनी मजबूत हैं कि वह तुमको जंगल के उस पार तक ले जा सकती हैं तो हमारे पंख भी इतने मजबूत होने चाहिये जो हम तुमको समुद्र पार ले जा सकें। ”

ऐलीसा बोली — “हाँ हाँ क्यों नहीं। तुम मुझे अपने साथ ले चलो। मैं तुम्हारे साथ चलने के लिये तैयार हूँ। ”

वह सारी रात उन सबने एक जाल बनाने में गुजार दी। उन्होंने वह जाल काफी बड़ा और मजबूत बनाया। ऐलीसा उस जाल में लेट गयी और जब सुबह हो गयी तो उसके भाई फिर से हंस बन गये।

उन्होंने अपनी चोंचों में उस जाल को उठाया और अपनी बहिन को ले कर आसमान में उड़ चले ऐलीसा अभी भी सो रही थी। जब सूरज की रोशनी उसकी आँखों पर पड़ी तो एक हंस उसके ऊपर ऐेसे उड़ा जिससे उसकी आँखों पर सूरज की रोशनी न पड़े।

वे अभी किनारे से बहुत दूर ही थे कि ऐलीसा की आँख खुल गयी। उसको लगा कि जैसे वह सपना देख रही है – समुद्र के ऊपर आसमान में उड़ना। उसके बराबर में ही उसके खाने के लिये पकी हुई बैरीज़ की एक शाख और कुछ मीठी जड़ें रखी हुई थी।

उसके सबसे छोटे भाई ने उसके लिये उनको इकठ्ठा किया था और उनको उसके लिये वहाँ रख दिया था। उसको यह भी पता चल गया था कि वही उसकी आँखों को सूरज की धूप से बचाने के लिये उसके सिर के ऊपर उड़ रहा था।

वे लोग हवा में सारा दिन तीर की तरह से उड़ते रहे। पर क्योंकि वे अपनी बहिन को ले जा रहे थे इसलिये वे पहले के मुकाबले में बहुत धीरे उड़ पा रहे थे। रात होने वाली थी और तूफान आने वाला था।

ऐलीसा सूरज डूबता देख कर डर गयी क्योंकि वह समुद्र के बीच की चट्टान जिसका उसके भाइयों ने जिक्र किया था उसको कहीं दिखायी ही नहीं दे रही थी।

उसको ऐसा लगा कि हंसों के पंख और बहुत ज़ोर ज़ोर से चलने लगे हैं। उसको इस बात का भी बहुत अफसोस हुआ कि उसकी वजह से वे जल्दी नहीं उड़ पा रहे हैं।

सूरज जल्दी ही डूब जायेगा और वे हंस से फिर आदमी बन जायेंगे। और आदमी बन जायेंगे तो वे समुद्र में गिर जायेंगे और डूब जायेंगे।

उसने दिल से भगवान की प्रार्थना करनी शुरू कर दी पर फिर भी कोई भी चट्टान उसको कहीं भी नजर नहीं आ रही थी।

काले काले बादल घिरते चले आ रहे थे और चलती हुई तेज़ हवाएँ बता रहीं थीं कि जल्दी ही तूफान भी आने वाला है। बादल बहुत तेज़ी से इधर उधर दौड़ रहे थे। बिजली भी चमकना शुरू हो गयी थी। तभी सूरज समुद्र के किनारे को छूने वाला था।

उसी समय हंसों ने नीचे की तरफ बहुत ज़ोर से उड़ान भरी। ऐलीसा को लगा कि वे हंस नीचे गिर रहे हैं सो उसका दिल बहुत ज़ोर से धड़का। पर वे बीच में ही रुक गये।

सूरज समुद्र में आधा डूब गया था कि तभी ऐलीसा को समुद्र में वह चट्टान दिखायी दी। ऊपर से वह चट्टान पानी में से बाहर निकलते हुए एक सील मछली के सिर जितनी बड़ी दिखायी दे रही थी।

सूरज बहुत तेज़ी से नीचे जा रहा था। वह अब एक सितारे जितना बड़ा दिखायी दे रहा था कि उसके पैरों ने जमीन छुई। उसने देखा कि उसके भाई भी हाथ में हाथ डाले उसके पास खड़े हुए थे। उन लोगों के लिये बस वह ठीक जगह थी।

समुद्र की लहरें उस चट्टान से टकरा टकरा कर उनके ऊपर पानी डाल रही थीं। बार बार बिजली चमक जाती थी। तब भाई बहिन ने मिल कर एक साम्स गाया जिसने उनको तसल्ली और हिम्मत दी।

अगले दिन सुबह हवा शान्त थी। जैसे ही सूरज निकला ऐलीसा के भाई फिर से हंस बन गये थे सो वे ऐलीसा को ले कर फिर उड़ चले। नीचे समुद्र में अभी भी ऊँची ऊँची लहरें उठ रही थीं और उन पर बहुत सारे हंस तैर रहे थे।

जब सूरज थोड़ा और ऊपर उठा तो ऐलीसा को एक पहाड़ी जगह दिखायी दी जिसकी चोटियाँ उसको हवा में तैरती नजर आ रही थीं। वे चोटियाँ बरफ से ढकी हुई थीं और उनके बीच में एक किला था जो करीब करीब एक मील लम्बा था।

नीचे बहुत सारे पाम के पेड़ लगे हुए थे और किसी चक्की के पाट जितने बड़े बहुत सारे रंगों के बहुत सारे फूल खिले हुए थे। ऐलीसा ने अपने भाइयों से पूछा कि क्या यही वह जगह थी जहाँ उनको आना था। उन्होंने कहा “नहीं। ”

वास्तव में उसने जो देखा वह फ़ैटा मौरगैना का हमेशा जगह बदलता हुआ महल था। उसमें धरती का कोई भी आदमी जाने की हिम्मत नहीं कर सकता था।

ऐलीसा ने जब दोबारा उस तरफ देखा तो वह किला, पाम के पेड़, फूल सभी कुछ उसको गायब होता नजर आया। उसकी जगह अब वहाँ 20 शानदार चर्च खड़े थे – सब एक से और सबकी खिड़कियाँ नुकीली।

जब वह उनके और पास आयी तो वे जहाज़ी बेड़ा बन गये और जब उसने उनकी तरफ दोबारा देखा तो वहाँ कोहरे के अलावा और कुछ भी नहीं था।

इस तरह से नयी नयी चीज़ें देखते हुए आखिर में वे उस जमीन पर आ गये जहाँ उनको आना था। वहाँ नीले नीले सुन्दर पहाड़ खड़े हुए थे जिन पर सीडर के पेड़ लगे हुए थे और वहाँ कई सारे शहर ओैर महल थे।

वे लोग वहाँ शाम होने से बहुत पहले ही पहुँच गये थे और एक पहाड़ के पास एक गुफा में बैठ गये थे जिसमें बड़ी बड़ी बेलें इतनी घनी फैली हुई थीं कि लगता था जैसे उस गुफा में हरा हरा कालीन बिछा हो।

ऐलीसा के सबसे छोटे भाई ने उसको उसके सोने की जगह दिखायी और बोला — “अब देखते है कि यहाँ तुम क्या सपने देखती हो। ”

वह तुरन्त बोली — “काश मैं सपने में यह देख सकूँ कि मैं तुम सबको कैसे आजाद कराऊँ। ” इस बारे में वह इतना ज़्यादा सोचती रही और भगवान से प्रार्थना करती रही कि वह यह सब सपने में भी करती रही।

जब वह वहाँ सो गयी तो उसको लगा कि वह अकेली ही फ़ैटा मौरगैना के बादलों के महल के ऊपर उड़ रही है।

वहाँ उसको एक परी मिली जो बहुत गोरी और सुन्दर थी। फिर भी उसकी शक्ल उस बुढ़िया से मिलती थी जो उसको जंगल में मिली थी और जिसने उसको बैरीज़ दी थीं और उन हंसों के बारे में बताया था जो सोने का ताज पहने थे।

परी बोली — “तुम्हारे भाई आजाद हो सकते हैं पर उसके लिये क्या तुम्हारे पास हिम्मत है? यह सच है कि वह समुद्र का पानी जो पत्थरों की शक्ल बदल सकता है तुम्हारे हाथों से ज़्यादा मुलायम है पर तुम्हारे हाथ जो दर्द महसूस कर सकते हैं वह दर्द वह पानी महसूस नहीं कर सकता। क्योंकि उसके तो दिल ही नहीं है जो वह गुस्सा या दिल में दर्द महसूस कर सके जो तुम कर सकती हो।

तुम मेरे हाथ में यह काटने वाला नैटिल देख रही हो? ऐसे बहुत सारे नैटिल के पौधे उस गुफा के आस पास उगे हुए हैं जहाँ तुम सोती हो।

पर याद रखना कि तुमको केवल वही पौधे इस्तेमाल करने हैं जो चर्च के कम्पाउंड में कब्रों के ऊपर उगे हुए हैं। सो तुम उन्हीं को इकठ्ठा करो। हालाँकि उससे तुम्हारे हाथ जलने लगेंगे और उनमें छाले पड़ जायेंगे।

उन नैटिल के पौधों को अपने पैरों से कुचलना तो उसमें से रुई जैसी चीज़ निकलेगी। उस रुई को तुम कातना और उसके धागे से लम्बी बाँह वाली 11 शाही कमीजें बनाना।

एक बार जब तुमने ये 11 कमीजें बना कर अपने भाइयों के ऊपर फेंक दीं तो उनके ऊपर किया हुआ जादू टूट जायेगा।

एक बात तुम और ध्यान में रखना कि तुमको इस काम में चाहे कई साल लग जायें पर जब से भी तुम इस काम को शुरू करो और जब तक खत्म करो तुम बोलना नहीं।

जैसे ही तुम एक शब्द बोली तो वह तुम्हारे भाइयों के दिल में चाकू की तरह से लगेगा। इस तरह उनकी ज़िन्दगी तुम्हारी जबान में है। जो भी मैंने तुमसे कहा है वह सब तुम याद रखना। ”

फिर परी ने ऐलीसा के हाथ से नैटिल छुआयी तो उसने ऐलीसा के हाथ में जलन पैदा कर दी जिससे वह जाग गयी।

दिन निकले काफी देर हो चुकी थी। उसने देखा कि जैसे नैटिल के पौधे उसने सपने में देखे थे वैसे ही पौधे उसके चारों तरफ बहुतायत से लगे हुए थे जहाँ वह सो रही थी। उसने घुटने के बल बैठ कर भगवान को धन्यवाद दिया और वहाँ से उठ कर अपना काम शुरू करने चल दी।

उसने अपने कोमल हाथों से उन नैटिल के पौधों से वह काँटों वाली नैटिल चुनी जो चर्च के कम्पाउंड में कब्रों के ऊपर उगे हुए हैं।

नैटिल चुनते समय उसने उसके हाथों पर बड़े बड़े छाले डाल दिये पर उसने वह सब इस आशा में सह लिया कि वह अपनी प्यारे भाइयों को अपनी सौतेली माँ के जादू से आजाद करा सकेगी।

उसने नैटिल के हर पौधे को अपने नंगे पैरों से कुचला और उससे निकली हुई हरी रुई को काता।

जब उसके भाई शाम को घर लौटे तो वे यह देख कर चिन्ता में पड़ गये कि उनकी बहिन तो बोल ही नहीं रही थी। उनको लगा कि यह कहीं उनकी सौतेली माँ का डाला हुआ कोई नया जादू तो नहीं है।

पर जब उन्होंने उसके हाथ देखे तो वे समझ गये कि वह उनको आजाद करने के लिये ही यह सब कर रही थी। सबसे छोटा भाई तो बहिन के हाथों को देख कर रो ही पड़ा।

पर आश्चर्य की बात ऐलीसा के शरीर पर जहाँ जहाँ उसके आँसू गिरे वहाँ वहाँ से उसका दर्द भी खत्म हो गया और उसके छाले भी ठीक हो गये।

वह रात भर करवटें बदलती रही क्योंकि उसको चैन ही नहीं था जब तक वह अपने भाइयों को उस जादू से आजाद नहीं करा लेती।

अगले दिन जब उसके भाई वहाँ से चले गये तो वह सारा दिन अकेली बैठी रही पर समय इससे पहले कभी इतनी जल्दी नहीं भागा था।

उसकी एक कमीज बन गयी थी और अब वह दूसरी कमीज बनाने बैठी। तभी उसने पहाड़ पर शिकारी बिगुल बजने की आवाज सुनी।

वह आवाज सुन कर वह डर गयी क्योंकि वह आवाज तो उसके पास ही आती जा रही थी और फिर उसने शिकारी कुत्तों के भौकने की आवाज सुनी। डर कर वह अपना सामान ले कर गुफा के अन्दर भागी और जा कर उस गठरी पर बैठ गयी जिसमें नैटिल रखी हुई थी।

तभी पास की एक झाड़ी में से एक बड़ा सा शिकारी कुत्ता भागता हुआ आया। उसके पीछे एक और कुत्ता था और उसके पीछे एक और कुत्ता था। उन कुत्तों के पीछे पीछे भागते भागते कुछ ही देर में शिकारी भी वहीं आ कर इकठ्ठे हो गये।

इन शिकारियों में से सबसे सुन्दर शिकारी था वहाँ का राजा। वह ऐलीसा के पास आया। राजा ने इतनी सुन्दर लड़की पहले कभी नहीं देखी थी। उसने ऐलीसा से पूछा — “बच्ची, तुम यहाँ कैसे आयीं?”

ऐलीसा ने ना में अपना सिर हिला दिया क्योंकि वह बोल नहीं सकती थी। क्योंकि उसके भाइयों की आजादी और ज़िन्दगी इसी बात पर आधारित थी कि वह न बोले। उसने अपने हाथ भी अपने ऐप्रन के पीछे छिपा लिये ताकि राजा यह न देख ले कि वह कितने कष्ट में थी।

राजा को उसको इस तरह वहाँ अकेले बैठे देख कर उसके ऊपर तरस आ गया। वह बोला — “चलो, तुम मेरे साथ चलो। मैं तुमको यहाँ इस तरह से अकेले नहीं छोड़ सकता। तुम यहाँ इस तरीके से नहीं रह सकतीं।

अगर तुम इतनी ही अच्छी हो जितनी तुम सुन्दर हो तो मैं तुमको रेशम और मखमल के कपड़े पहनाऊँगा, तुम्हारे सिर पर सोने का ताज रखूँगा और तुमको अपने सबसे अच्छे महल में रखूँगा। ”

इतना कह कर राजा ने उसको उठा कर अपने घोड़े पर बिठा लिया। यह सब देख कर ऐलीसा रो पड़ी और अपने हाथ मलने लगी तो राजा बोला — “मेरी तो बस यही इच्छा है कि तुम खुश रहो। देखना, एक दिन तुम इस सबके लिये मुझे धन्यवाद दोगी। ”

और वह उस लड़की को अपने घोड़े पर अपने आगे बिठा कर घोड़े को पहाड़ों में से हो कर दौड़ाता हुआ चला गया। उसके शिकारी लोग उसके पीछे आ रहे थे। शाम तक वह अपने महल पहुँच गया।

राजा उसको अपने महल में ले गया जहाँ संगमरमर के ऊँचे ऊँचे कमरों में बहुत सुन्दर शानदार फव्वारे चल रहे थे। और जहाँ छतें और दीवारें दोनों ही तस्वीरों से सजी हुई थी। पर राजकुमारी ने इनमें से किसी की तरफ नहीं देखा। वह तो बस रोती रही और दुखी होती रही।

महल में पहुँच कर स्त्र्यिों ने उसको शाही कपड़े पहनाये, उसके बालों में मोती गूँथे और उसके छालों भरे हाथों में बहुत ही मुलायम दस्ताने पहनाये। ये सब पहन कर वह इतनी सुन्दर लग रही थी कि राजा का सारा दरबार उसके सामने बहुत नीचे तक झुक रहा था।

फिर राजा ने उससे शादी करने का विचार किया हालाँकि पादरी ने राजा से कहा भी कि जंगल में पायी जाने वाली यह लड़की जादूगरनी भी हो सकती है जिसने राजा की आँखों पर परदा डाल दिया हो और पलक झपकते ही उसका दिल चुरा लिया हो।

पर राजा ने उसकी एक न सुनी और हुकुम दिया कि संगीत बजाया जाये, बढ़िया बढ़िया खाने लगाये जायें और सुन्दर सुन्दर लड़कियाँ वहाँ नाच करें।

लड़की को खुश करने के लिये उसको खुशबूदार बागीचों में घुमाने के लिये ले जाया गया, शानदार कमरे दिखाये गये पर कोई भी चीज़ उसके होठों पर मुस्कुराहट और आँखों में चमक न ला सकी। भाइयों के दुख ने उसकी हर खुशी पर ताला लगा रखा था।

अन्त में राजा ने उसके सोने वाले कमरे के साथ लगा एक छोटे से कमरे का दरवाजा खोला। वह कमरा उसकी गुफा की तरह से हरे रंग की कढ़ाई के काम से भरा हुआ था और बिल्कुल वैसा ही लग रहा था जैसी कि उसकी वह गुफा थी जहाँ से वह उसको ले कर आया था।

उस कमरे के फर्श पर नैटिल की रुई की एक गठरी पड़ी हुई थी जिससे वह उसका सूत कात रही थी। और उस कमरे की छत से वह कमीज लटक रही थी जो उसने खत्म कर ली थी। उसका एक शिकारी उत्सुकतावश उसकी वे चीजें, वहाँ से उठा लाया था।

राजा बोला — “यहाँ बैठ कर तुमको लगेगा कि तुम अपनी पुरानी जगह बैठी हुई हो। यह वह तुम्हारा काम है जो तुम वहाँ कर रही थीं। इन सबके बीच में तुमको वहीं बैठे रहने का आनन्द मिलेगा। ”

जब ऐलीसा ने वह सब चीज़ें देखीं जो उसके लिये बहुत कीमती थीं तो एक मुस्कुराहट उसके होठों पर दौड़ गयी। उसके चेहरे की लाली लौट आयी।

उसकी यह आशा वापस आ गयी कि अब वह अपने भाइयों को उस जादू से आजाद करा सकेगी जो उसकी सौतेली माँ ने उसके भाइयों के ऊपर डाला था और इस खुशी में उसने राजा के हाथ चूम लिये।

राजा ने भी उसको अपने सीने से लगा लिया और यह घोषणा करने का हुकुम दिया कि उनकी शादी की तैयारी की जाये। सो जंगल से लायी गयी देश की एक गूँगी लड़की देश की रानी बनने वाली हो गयी।

चर्च के पादरी ने राजा के कान में फिर से उसकी कुछ बुराई की लेकिन राजा ने फिर से उसको अनसुना कर दिया और अब तो उन दोनों की शादी होने वाली थी। पादरी को खुद अपने हाथ से उसके सिर पर ताज रखना था।

पर क्योंकि राजा ने पादरी की बात नहीं सुनी थी इसलिये गुस्से के मारे उसने ताज का गोला ऐलीसा के सिर पर थोड़ा नीचे की तरफ रख दिया जिससे उसके सिर को बड़ी तकलीफ हुई।

पर उससे भी ज़्यादा उसके दिल को तकलीफ हुई क्योंकि वह अपनी इस तकलीफ को बोल कर अपने भाइयों को दुख नहीं पहुँचाना चाहती थी इसलिये वह उस शरीर की तकलीफ को सह गयी।

वह कुछ नहीं कह सकती थी क्योंकि अगर वह एक शब्द भी बोलती तो उसके भाइयों को अपनी ज़िन्दगी से हाथ धोना पड़ता।

पर इस दयावान और सुन्दर राजा के लिये उसके मन में सच्चा प्यार था क्योंकि वह उसको खुश रखने के लिये अपने तरीके से पूरी कोशिश कर रहा था। हर दिन वह उसको ज़्यादा और ज़्यादा चाहने लगी थी।

काश वह उसमें अपने लिये विश्वास पैदा कर सकती और उसे यह बता सकती कि वह क्यों दुखी थी। पर उसको तो चुप ही रहना है और अपना काम खत्म करना है।

सो वह रात को समय निकाल कर अपने उस गुफा जैसे कमरे में जाती और वहाँ जा कर एक के बाद एक कमीज बनाती। जब वह सातवीं कमीज बना रही थी तो उसकी रुई खत्म हो गयी।

उसको मालूम था कि उसको चर्च के कम्पाउंड में कब्रों के ऊपर उगे हुई नैटिल के पौधे ही लेने चाहिये। और वह उसको अपने आप ही इकठ्ठे करने होंगे पर वह वहाँ जाये कैसे?

“मेरे दिल के दर्द के सामने मेरी उँगलियों का दर्द क्या है? मुझे यह खतरा तो लेना ही पड़ेगा। मुझे पूरा विश्वास है कि भगवान मेरा जरूर ख्याल रखेंगे। ”

यह सोच कर जैसे कोई बुरा काम करता है और उसमें उसको डर लगता है उसी तरह से डरती हुई वह दबे पाँव उठ कर लम्बे लम्बे गलियारों में से होती हुई चाँदनी में नहाये बागीचे को पार करती हुई सूनी सड़काें से होती हुई चर्च के कम्पाउंड में पहुँच गयी।

वहाँ पहुँच कर उसने देखा कि कुछ चुड़ैलें कब्र के एक बड़े से पत्थर पर बैठी थीं। उन्होंने अपने फटे कपड़े उतारे हुए थे जैसे कि वे अभी नहाने जाने वाली हों। अपनी पतली पतली उँगलियों से वे नयी बनी कब्रें खोद खोद कर खोल रहीं थीं और उनमें रखे मरे हुए शरीरों का माँस खा रही थीं।

ऐलीसा को उनके पास से गुजरना था और वे उसको देख रही थीं। सो उसने पहले एक प्रार्थना की, फिर अपने नैटिल के पौधे उखाड़े और महल वापस आ गयी।

ऐसा करते हुए उसको केवल एक आदमी ने देखा और वह था चर्च का पादरी क्योंकि जब सब लोग सो रहे थे वह जाग रहा था। जो कुछ भी उसने उस लड़की के बारे में कहा था अब उसके पास उस बात का सबूत था।

उसने सोचा रानी के साथ कुछ गड़बड़ तो थी। वह जरूर ही कोई जादूगरनी थी और इसी वजह से वह राजा और उसके लोगों को धोखा देने में सफल हो गयी थी।

अगले दिन पादरी ने राजा को चर्च में बुलाया और उसको वह सब बताया जो कुछ उसने पिछली रात देखा था और जिसका उसे डर था।

जैसे ही उसके मुँह से रानी के बारे में कड़वे शब्द निकलने शुरू हुए तो वहाँ लगी संतों की मूर्तियों ने ना में अपना सिर हिलाया जैसे वे कह रही हो कि यह आदमी झूठ बोल रहा है और ऐलीसा बिल्कुल बेकुसूर है।

पर पादरी के पास इसकी दूसरी सफाई थी। उसने कहा कि संत भी यही बात कह रहे हैं जो वह कह रहा है और वे उस लड़की की नीचता पर अपना सिर हिला रहे हैं।

यह सुन कर राजा की आखों से दो बड़े आँसू निकल कर उसके गालों पर ढुलक गये और वह भी उस लड़की पर शक करता हुआ अपने महल को चला गया।

उस रात उसने सोने का बहाना किया पर उसकी आँखों में नींद कहाँ। रात को उसने देखा कि ऐलीसा उठी।

हर रात वह ऐलीसा को उठते देखता रहा। हर बार वह चुपचाप उसका पीछा करता रहा और हर बार उसने उसको उस छोटे कमरे में गायब हो जाते हुए देखा। रोज ब रोज यह सब देख कर उसका गुस्सा बढ़ता ही गया।

ऐलीसा ने भी यह देखा कि राजा गुस्सा है पर उसकी समझ में उसकी कोई वजह नहीं आयी बल्कि उसने उसको और ज़्यादा चिन्ता में डाल दिया। इस तरह एक और चिन्ता उसकी अपने भाइयों की चिन्ता में जुड़ गयी।

यह सोच कर वह रो पड़ी और उसके आँसू उसकी शाही जामुनी पोशाक पर गिर पड़े। गिरते ही वे वहाँ हीरों की तरह चमकने लगे। और जिसने भी यह तमाशा देखा वह यही इच्छा करने लगा कि काश वह रानी होता।

इस बीच उसका काम करीब करीब खत्म हो गया था। बस एक कमीज रह गयी थी। पर फिर से उसकी वह रुई कम पड़ गयी थी सो उसको फिर से नैटिल का पौधा लेने के लिये चर्च के कम्पाउंड में जाना था।

अब उसके पास नैटिल का एक भी पौधा नहीं था। एक बार फिर से, शायद आखिरी बार, उसको चर्च के कम्पाउंड में जाना होगा और थोड़े से पौधे और लाने होंगे।

अबकी बार वह अकेले जाते में और उन चुड़ैलों से डर रही थी। पर उसकी इच्छा शक्ति और भगवान में विश्वास बहुत मजबूत थे सो वह अपना काम करने चल दी। उधर राजा और पादरी भी उसके पीछे पीछे चल दिये।

उन्होंने देखा कि वह चर्च के कम्पाउंड के लोहे के दरवाजे के अन्दर जा कर गायब हो गयी। वे भी हिम्मत करके उसके पीछे पीछे चर्च के कम्पाउंड में दाखिल हो गये तो उन्होंने देखा कि एक कब्र के एक बड़े से पत्थर पर कुछ चुड़ैलें बैठीं हैं। जैसे ऐलीसा ने उनको तब वहाँ देखा था जब वह पहली बार यहाँ आयी थी।

राजा वहाँ से वापस लौट आया क्योंकि राजा ने सोचा कि ऐलीसा भी उन्हीं में से एक होगी – वही ऐलीसा जो उस शाम उसके इतने पास बैठी हुई थी।

उसका मन उसको सजा देने का हुआ पर फिर उसने सोचा कि जनता को ही इस बात का फैसला करने दो। सो उसने जनता के सामने अपना मामला रखा तो जनता ने अपना फैसला सुनाया कि रानी को जला कर मार देना चाहिये।

इस तरह रानी को उसके शाही महल से हटा कर एक अँधेरे और सीलन भरे तहखाने में बन्द कर दिया गया। उस तहखाने में उसकी खिड़की की सलाखों में से आती हवा सीटी बजाती थी।

रेशम और मखमल का तकिया देने की बजाय उसके सिर के नीचे लगाने के लिये उसको नैटिल की एक पोटली दे दी गयी जो उसने कमीज बनाने के लिये इकठ्ठी करके रखी थी। ओढ़ने के लिये उसको नैटिल की वे कमीजें दे दी गयीं जो उसने पूरी कर ली थीं।

वह फिर से अपने काम में लग गयी और प्रार्थना करती रही। पर उसको तसल्ली देने के लिये कोई भी नहीं आया।

शाम को उसने अपनी खिड़की के पास हंसों के पंखों की फड़फड़ाहट सुनी। उसके सबसे छोटे भाई ने आखिर उसे ढूँढ ही लिया था।

वह खुशी से रो पड़ी। हालाँकि उसको पता था कि यहाँ उसकी यह आखिरी रात है क्योंकि अब उसका काम खत्म हो चुका था और उसके भाई भी यहाँ थे।

पादरी उसके आखिरी समय में उसके पास ठहरने के लिये आना चाहता था क्योंकि राजा से उसने इस बात का वायदा किया था कि कम से कम वह उसके लिये यह काम तो कर ही सकता था।

पर ऐलीसा ने ना में सिर हिला कर और इशारों से उसको मना कर दिया था कि वह उसको अपने पास नहीं आने देना चाहती थी। यह उसकी वहाँ आखिरी रात थी और आज उसको अपना काम हर हाल में खत्म करना था नहीं तो उसकी मेहनत और तकलीफ, उसके आँसू, उसकी रातों का जागना जो कुछ भी तकलीफें उसने उठायी थीं सब बेकार जातीं।

सो पादरी ऐलीसा को बुरा भला कह कर वहाँ से चला गया। पर ऐलीसा को मालूम था कि वह बेकुसूर है सो वह अपने काम में लगी रही।

कुछ छोटी छोटी चुहियें फर्श पर इधर उधर दौड़ रही थीं और उसकी सहायता कर रही थीं। वे उसको नैटिल ला ला कर दे रही थीं। एक चिड़ा भी उसकी खिड़की पर आ कर बैठ गया था और उसके लिये सारी रात गाना गाता रहा ताकि उसका अपने काम में मन लगा रहे।

अभी पौ ही फटी थी और सूरज निकलने में अभी एक घंटा बाकी था कि उसके 11 भाई महल के दरवाजे पर पहुँच गये और उन्होंने राजा से मिलने की इच्छा प्रगट की।

पर वहाँ के चौकीदारों ने उनको कहा कि यह नामुमकिन है क्योंकि अभी तो रात ही थी और राजा सो रहा था और उसको अभी जगाया नहीं जा सकता था।

उन्होंने उन चौकीदारों से प्रार्थना भी की पर जब उन्होंने उनकी प्रार्थना नहीं सुनी तो उन्होंने उनको इतनी ज़ोर से चिल्ला कर धमकी दी कि वे डर गये और राजा यह जानने के लिये बाहर निकल आया कि मामला क्या है।

पर उसी समय सूरज निकल आया और उसके भाई फिर से हंस बन कर महल के ऊपर उड़ गये।

उधर सारे शहर वाले वहाँ इकठ्ठा हो रहे थे ताकि वे रानी को जलते हुए देख सकें। ऐलीसा को एक गाड़ी में बिठा कर ले जाया जा रहा था जिसे एक बूढ़ा घोड़ा खींच रहा था।

उसको बहुत ही खुरदरे कपड़े पहनाये गये थे। उसके बाल उसके चेहरे के चारों तरफ बिखरे हुए थे। उसके चेहरे का रंग पीला पड़ा हुआ था। उसके होठ चुपचाप से प्रार्थना कर रहे थे और उसकी उँगलियाँ हरी रुई के सूत से कुछ बुन रही थीं।

उसने अपना अधूरा काम नहीं छोड़ा था वह उसको अपने साथ ही ले आयी थी। मरने के लिये जाते समय भी वह काम कर रही थी। 10 कमीजें उसके पैरों में पड़ी हुई थीं और ग्यारहवीं कमीज पर वह काम कर रही थी।

देखने वाले लोग कह रहे थे — “देखो यह क्या बुड़बुड़ा रही है। इसके पास तो साम्स की किताब भी नहीं है। लगता है कि यह वहाँ बैठी बैठी अपना कुछ जादू कर रही है। उसका वह जादू छीन लो और उसे तोड़ कर फेंक दो। ”

वे आगे बढ़ कर यह सब करने ही वाले थे कि 11 हंस आसमान से नीचे उतरे और उसकी गाड़ी के चारों तरफ गोला बना कर उड़ने लगे। भीड़ डर गयी और डर के मारे पीछे हट गयी।

बहुत से लोग फुसफुसाये — “यह तो अच्छी निशानी है। लगता है कि यह बेकुसूर है। ” पर यह बात किसी की खुल कर कहने की हिम्मत नहीं हुई। ऐलीसा की गाड़ी वहाँ पहुँच चुकी थी जहाँ उसको सजा मिलने वाली थी। सजा देने वाले ने उसका हाथ पकड़ कर उसको गाड़ी से नीचे उतारा तो जल्दी से उसने वे 11 कमीजें उन 11 हंसों के उपर फेंक दीं। वे 11 हंस तुरन्त ही 11 सुन्दर राजकुमार बन गये पर सबसे छोटे भाई की एक बाँह अभी भी हंस का पंख रह गयी थी क्योंकि उसकी कमीज की एक बाँह नहीं लग पायी थी। ऐलीसा उसको खत्म ही नहीं कर पायी थी।

उन हंसों को राजकुमारों में बदलते देख कर वह खुशी से चिल्लायी — “अब मैं बोल सकती हूँ कि मैं बिल्कुल बेकुसूर हूँ। ”

जब सब लोगों ने देखा कि वहाँ क्या हो रहा था तो सबने उसके सामने ऐसे सिर झुकाया जैसे कि वे किसी संत के आगे सिर झुकाते।

पर इतने समय में जो दुख, दर्द और गुस्सा उसने सहा था वह इतना ज़्यादा था कि अब उससे वह और नहीं सहा जा रहा था सो वह बेजान सी अपने भाइयों की बाँहों में गिर पड़ी।

उसके सबसे बड़े भाई ने कहा — “यह बेचारी तो बिल्कुल बेकुसूर है। ”

और तब उसने बताया कि क्या सब कैसे हुआ था। जब वह यह कहानी सुना रहा था तो लाखों गुलाबों की खुशबू से वहाँ की सारी हवा महक गयी।

क्योंकि जितनी लकड़ी उसको जलाने के लिये वहाँ इकठ्ठी की गयी थी सब में गुलाब के फूलों के पेड़ की जड़ें निकल आयी थीं और उनमें से शाखें निकल निकल कर उनमें लाखों लाल गुलाब के खुशबूदार फूल खिल गये थे।

उनमें सबसे ऊपर एक सफेद गुलाब सितारे की तरह चमक रहा था। राजा ने वह फूल तोड़ कर ऐलीसा के सामने की तरफ लगा दिया।

चर्च की सारी घँटिया अपने आप बजने लगीं और चारों तरफ चिड़ियें ही चिड़ियें दिखायी देने लगीं। अब तो दुलहिन महल की तरफ अपने जुलूस के साथ ऐसे जा रही थी जैसे किसी राजा ने किसी भी दुलहिन को इस तरह से जाते हुए इससे पहले कभी नहीं देखा था।

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Italy ki Lok Kathayen-1(इटली की लोक कथाएँ-1)

कहानी-गरीबों को याद रखो: इटली की लोक कथा

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एक समय की बात है, किसी जगह पर तीन भाई साथ-साथ रहा करते थे। उनका सेब का एक पेड़ था। उन्होंने बारी-बारी उस पेड़ की देखभाल करने के लिए आपस में निश्चय किया था। जब दो भाई खेतों में काम करने चले जाते, तो तीसरा भाई पेड़ की रखवाली करने के लिए घर पर ही रह जाता था। वह यह देखता रहता कि कोई भी किसी प्रकार पेड़ को हानि न पहुंचा सके और न ही कोई चोरी से सेब तोड़ ले।

एक बार उन तीनों भाईयों की परीक्षा लेने के लिए स्वर्ग से एक दूत आया। भिखारी के रूप में, वह सेब के पेड़ के निकट गया । उस दिन सबसे बड़ा भाई पेड़ की रखवाली कर रहा था। वह भिखारी हाथ फैलाकर बोला, “बाबा, ईश्वर के नाम पर, एक पकी सेब दे दो ।”

सबसे बड़े भाई ने उसे एक सेब दे दी और कहा, “यह मेरे हिस्से की सेब है, इसलिए मैं तुम्हें दे रहा हूं। अन्य नाशपातियां मेरे भाइयों के हिस्से की हैं।”

दूत ने उसे धन्यवाद दिया और चला गया।

दूसरे दिन दूसरा भाई पेड़ की देखभाल कर रहा था। उस दिन भी दूत भिखारी के रूप में आया और एक पकी सेब की भीख मांगने लगा। दूसरे भाई ने कहा, “यह लो, यह सेब मेरे हिस्से की है। परन्तु मैं और नहीं दे सकता, क्योंकि ये मेरे भाइयों के हिस्से की हैं।”

दूत दूसरे भाई को भी धन्यवाद देकर चला गया।

तीसरे दिन जब दूत सबसे छोटे भाई के पास आया, तो उसने भी अपने बड़े भाइयों की भांति उत्तर दिया।

अगले दिन प्रात:काल दूत, साधु के रूप में, उन तीनों भाइयों के घर गया। उस समय तक वे सभी घर पर मौजूद थे। साधु ने कहा, “बच्चों, मेरे साथ आओ । सेब के पेड़ की रखवाली करने की अपेक्षा मैं तुम्हें अच्छा काम दूंगा।”

तीनों भाई उसके साथ हो लिए। चलते-चलते वे दूर एक बड़ी गहरी नदी के किनारे पहुंचे ।

साधु ने सबसे बड़े भाई से पूछा, “बेटे! मांग, क्यार मांगता है?”

सबसे बड़े भाई ने कहा, “कितना अच्छा होता, यदि इस नदी का जल मदिरा में बदल जाए और उसका मालिक मै बन जाऊं।”

साधु ने अपनी छड़ी घुमाई और सारी नदी मदिरा की हो गई। लोग बड़े-बड़े पीपों में मदिरा भर-भरकर ले जाने लगे। कुछ देर में ही ऐसा मालूम पड़ने लगा, मानो एक बड़ा व्यवसाय हो रहा हो। लोग अपने काम में व्यस्त इधर-उधर भाग रहे थे और सबसे बड़े भाई को सम्मानपूर्वक ‘मालिक-मालिक’ कहकर संबोधित कर रहे थे।

दूत जो साधु के वेश में था बोला, “तुम्हारी इच्छा पूरी हो गई। तुम धनवान हो गए। परन्तु गरीबों को मत भूल जाना। उनका ध्यान रखना।”

सबसे बड़े भाई को मदिरा के व्यवसाय में लगाकर, साधु दोनों भाइयों के साथ आगे बढ़ चला। वे एक ऐसे बड़े मैदान में पहुंचे जहां कि बहुत-से कबूतर दाना चुग रहे थे।

दूत ने दूसरे भाई से कहा, “मांगो, तुम क्या मांगते हो?”

दूसरे भाई ने उत्तर दिया, “यदि ये कबूतर बदलकर भेड़ हो जाएं और मैं इनका मालिक बन जाऊं, तो इससे सुन्दर और क्या होगा?”

दूत ने पहले की भांति अपनी छड़ी घुमाकर फिर से पहले जैसी रेखाएं बना दीं। सहसा पूरा मैदान भेड़ों से भर गया। घर और दालान बन गए। स्त्रियां भेड़ों को दुहने लगीं और पनीर बनाने लगीं। कुछ लोग बाजार में बेचने के लिए मांस तैयार करने लगे और कुछ उनकी सफाई में लगे हुए थे। वे सभी अपने-अपने कार्य में व्यस्त थे और दूसरे भाई को उन्होंने अपना मालिक समझ लिया था।

दूत ने कहा, “अब तुम्हारी इच्छा पूरी हो गई। तुम सुखी और सम्पन्न बन गए हो परन्तु निर्धनों का ख्याल रखना ।”

तब दूत और सबसे छोटा भाई वहां से चल दिए। कुछ दूर जाने के पश्चात्‌ दूत ने कहा, “बेटे, तुम भी कुछ मांग लो।”

सबसे छोटे भाई ने चुपके से कहा, “मुझे केवल एक ही चीज चाहिए और वह है एक धर्मपरायण स्त्री।”

दूत ने कहा, “बेटे! तुमने बड़ी कठिन चीज़ मांगी। संसार भर में केवल तीन धर्मपरायण स्त्रियां हैं। उनमें से दो विवाहित हैं। तीसरी राजकुमारी है, जिसके साथ विवाह करने के लिए दो राजा प्रयत्न कर रहे हैं। आओ, हम लोग भी राजा के पास चलें और तुम्हारी इच्छा उनसे कहें।”

अतः वे उस नगर की ओर चल पड़े, जहां राजकुमारी रहती थी लम्बी यात्रा के कारण थके-हारे वे राजमहल में घुसे।

राजा ने उनकी प्रार्थना सुनी | परन्तु जब उसने उनका आने का आशय सुना तो उसने कहा, “मैं कुछ भी निर्णय नहीं कर सकता । दो राजा और यह नवयुवक, तीनों मेरी बेटी से विवाह करने के इच्छुक हैं। क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता ।”

दूत ने कहा, “ईश्वर ही इसका फैसला करेंगे।”

राजा ने भी कहा, “ठीक है, पर कैसे?”

दूत ने कहा, “अंगूर की लता की तीन डालियां काट लो और उन्हें राजकुमारी को दे दो। राजकुमारी प्रत्येक डाली के ऊपर विवाह के इच्छुक एक-एक प्रत्याशी का नाम लिख-लिखकर तीनों डालियां आज रात बगीचे में गाड़ दे। रात-भर में जिस डाली में फूल खिलकर सुबह अंगूर के गुच्छे नज़र आएं, उसी के साथ राजकुमारी का विवाह कर दें ।”

राजा ने कहा, “यह बहुत अच्छा उपाय है।”

राजकुमारी, दोनों राजकुमार और युवक-तीनों इस उपाय पर राजी हो गए। तीन डालियों पर उनके नाम लिखकर बगीचे में गाड़ दिये गए। प्रातःकाल दो डालियां सूख गईं। तीसरी डाली हरी-भरी थी और उसमें अंगूर के गुच्छे लटक रहे थे। इस डाली पर सबसे छोटे भाई का नाम लिखा हुआ था। राजा को यह शर्त माननी पड़ी। उसे अपनी प्रतिज्ञानुसार राजकुमारी का ब्याह उस युवक से करना पड़ा। राजा ने अपनी लड़की और दामाद को आर्शीवाद दिया।

एक साल के बाद, दूत पुनः पृथ्वी पर यह देखने के लिए आया कि अब वे तीनों भाई कैसे रह रहे हैं। भिखारी बनकर वह सबसे बड़े भाई के पास गया, जो अपने शराब के व्यवसाय में व्यस्त था।

दूत ने कहा, “बाबा, भिखारी को भी एक प्याला शराब दे दो।”

बड़े भाई ने चिल्लाकर कहा, “बदमाश! निकल यहां से! यदि मैं सभी भिखारियों को शराब मुफ्त देता रहूंगा तो खुद भी शीघ्र ही भिखारी बन जाऊंगा ।”

दूत ने अपनी छड़ी घुमाकर क्रॉस का चिन्ह बनाया। चिन्ह बनाते ही शराब की दुकान, गोदाम और काम करने वाले मजदूर-सभी गायब हो गए । वहां पहले की भांति लम्बी-चौड़ी और गहरी नदी बहने लगी।

दूत क्रोधित होकर बोला, “तुम धनवान बनके गरीबों को भूल गए। अतः तुम फिर से जाकर अपने सेब के पेड़ की देखभाल करो ।” फिर दूत दूसरे भाई के पास गया, जो कि दूध तथा भेड़ों के करोबार में लगा हुआ था।

दूत ने गिड़गिड़ाकर कहा, “बाबा, ईश्वर के नाम पर पनीर का एक टुकड़ा दे दो।”

दूसरे भाई ने कहा, “अरे, भाग यहां से, नहीं तो कुत्तों से कटवा दूंगा। तुम्हारे जैसे आलसियों को मैं पनीर नहीं देता ।”

दूत ने पहले की भांति अपनी छड़ी से दो आड़ी-तिरछी लकीरें खींचकर क्रॉस का चिन्ह बनाया। सभी भेड़ें, काम करने वाले मज़दूर आदि सब गायब हो गए और पहले की तरह वहां मैदान हो गया, जहां पर बहुत से कबूतरों का झुंड पहले की भांति ही चुगने लगा था।

दूत क्रोधित होकर बोला, “तुम निर्धनों को भूल गए हो अतः तुम सेब के पेड़ के पास जाकर पहले की भांति ही उसकी रखवाली करो ।”

अब दूत शीघ्रता से जंगल में पहुंचा जहां कि सबसे छोटा भाई अपनी स्त्री के साथ रहता था। वे दोनों एक झोंपड़ी में रहते थे और उन्हें रुपये-पैसे की बड़ी तंगी थी।

दूत जो कि अब भी भिखारी के वेश में था, उनके निकट आकर बोला, “भगवान तुम्हारा भला करे! मुझे खाने को कुछ भोजन और रात के लिए आश्रय मिलेगा?”

सबसे छोटे भाई ने कहा, “हम लोग निर्धन हैं, परन्तु आप यहां रहें और जो कुछ रूखा-सूखा हमारे पास है उससे हम आपकी सेवा करेंगे।”

पति-पत्नी दोनों ने दूत को आग के निकट सर्दी से बचने के लिए स्थान दिया। पत्नी ने रात का भोजन अलग-अलग तीन आदमियों के लिए रखा। वे इतने गरीब थे कि उनके पास आटा तक न था। उन्होंने पेड़ों की छाल को कूटकर, उसके आटे से रोटियां बनाई थीं। उसकी पत्नी शर्म के मारे मरी जा रही थी। उसने कहा, “हम लोग बहुत ही लज्जित हैं। आपको खिलाने के लिए हमारे पास आटे की रोटियां तक भी नहीं हैं।”

दूत हँसता हुआ बोला, “चिंता न करो ।”

छोटे भाई की पत्नी जब भोजन लेने के लिए रसोई में गई, तो देखा कि रोटियां गेहूं के आटे की हो गई हैं। उसके आश्चर्य की सीमा न रही। वह बोली, “भगवान तेरी माया विचित्र है।” खुशी के मारे, उसकी आंखों में आँसू छलछला आये। वह निकट के झरने से एक घड़ा जल ले आयी। जब वह प्यालों में जल उड़ेलने लगी, तो पानी मधुर मदिरा में बदल चुका था। सबसे छोटे भाई को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। परन्तु वह बोला कुछ नहीं।

दूत उनके सत्कार से खुश होकर बोला, “आप लोगों ने गरीबों को नहीं भुलाया। ईश्वर आपका भला करे।”

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Afghanistani Lok Kathayen -1(अफगानिस्तानी लोक कथाएँ-1)

कहानी –ऊपर वाले का करम-अफगानिस्तानी लोक कथा

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एक बूढ़ा आदमी नदी के किनारे पर जा रहे था। एक जगह उसने देखा कि नदी की सतह से एक कछुआ निकला और पानी के किनारे पर आ गया। उसी किनारे से एक बड़े ही जहरीले बिच्छु ने नदी के अन्दर छलांग लगाई और कछुए की पीठ पर सवार हो गया। कछुए ने तैरना शुरू कर दिया। वह बूढ़ा आदमी बड़ा हैरान हुआ।

उसने उस कछुए का पीछा करने की ठानी। इसलिए नदी में तैर कर उस कछुए का पीछा किया। वह कछुआ नदी के दूसरे किनारे पर जाकर रूक गया। और बिच्छू उसकी पीठ से छलांग लगाकर दूसरे किनारे पर चढ़ गया और आगे चलना शरू कर दिया। वह बूढ़ा आदमी भी उसके पीछे चलता रहा। आगे जाकर उसने देखा कि जिस तरफ बिच्छू जा रहा था उसके रास्ते में एक एक फ़कीर बड़े ध्यान में आँखे बन्द कर मालिक की याद में सज़दे में लगा हुआ था।

उस बूढ़े आदमी ने सोचा कि अगर यह बिच्छू उस नौजवान को काटना चाहेगा तो मैं करीब पहुंचने से पहले ही उसे अपनी लाठी से मार डालूंगा। लेकिन वह चंद कदम आगे बढ़ा ही था कि उसने देखा दूसरी तरफ से एक काला जहरीला नाग तेजी से उस नौजवान को डसने के लिए आगे बढ़ रहा था। इतने में बिच्छू भी वहां पहुंच गया।

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Dakshin Africa ki Lok Kathayen -2(ज़ुलु लोक कथाएं-2)

चीते के गाल पर धब्बे क्यों होते हैं? (Why The Cheetah’s Cheeks Are Stained?)-दक्षिण अफ्रीका की लोक कथा

बहुत समय पहले की बात है, जंगल में एक आलसी और बेईमान शिकारी पेड़ की छांव में बैठा था| वह सोच रहा था कि, इतनी गरमी में झाड़ियों में छुप कर शिकार का इंतजार करना कितना कठिन काम है| पास ही झाड़ियों में एक तंदरुस्त हिरन घास चर रहा था, पर शिकारी इतना आलसी था कि वह उसका शिकार करने भी न उठ सका| बस बैठा – बैठा सोचता रहा कि हिरनों के झुंड में से कोई हिरन खाने को मिल जाए तो कितना मज़ा आए| तभी दूर कहीं झाड़ियों में कुछ हलचल हुई, शिकारी को वहां एक मादा चीता दिखाई पड़ी| चीते ने कुशलता से एक नादान हिरन को अपने झुंड से अलग किया, और उसको पकड़ने के लिए दौड़ पड़ी| बेहद फुर्ती और तेज़ रफ़्तार से उसने हिरन को हरा दिया और मार गिराया| जैसे ही चीते ने हिरन को मारा, पूरा झुंड बिदक गया और भाग खड़ा हुआ|

शिकारी ने देखा कि मादा चीता अपना शिकार मुहं में दबाए एक झाड़ी में चली गई| झाड़ियों में चीते के तीन छोटे-छोटे बच्चे उसका इंतज़ार कर रहे थे| शिकारी को बहुत ईर्ष्या हुई और वह मन ही मन सोचने लगा कि, काश उसके पास भी चीते जैसा शिकारी होता जो उसके लिए शिकार पकड़ता| सोचो कितना अच्छा हो कि हर रोज़ स्वादिष्ट मांस खाने को मिले, वह भी बिना मेहनत| तभी उसके दिमाग में एक चालाकी भरा विचार आया कि वह चीते के एक बच्चे को चुरा लेगा और उसे अपने लिए शिकार करने योग्य बनाएगा| उसने सोचा जब मादा चीता शाम पानी पीने तालाब पर जायेगी तभी वह चुपके से एक बच्चे को चुरा लेगा| यह सोच वह मन ही मन मुस्कराने लगा|