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Iraq ki Lok Kathayen-1(इराक की लोक कथाएँ-1)

कहानी-चमत्कारी मेंढ़क: इराकी लोककथा

बलसोरा के बादशाह का राज्य धनधान्य से संपन्न था । किसी भी प्रकार की कोई कमी न थी । उनकी एक प्यारी-सी बेटी थी रुजैल । उसके काले घुंघराले बाल, घनी पलकें, तीखे नयन-नक्श, हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करते रहते थे ।

अनेक राजकुमार राजकुमारी रुजैल का हाथ थामने का प्रयास कर चुके थे । पर रुजैल सबका मजाक उड़ाती रहती थी । वह हर  किसी में कोई न कोई कमी निकाल देती । रुजैल के पिता उसके जन्मदिन पर हर वर्ष कोई न कोई सुंदर उपहार दिया करते थे । रुजैल को उन उपहारों में सोने की सुंदर हीरों जड़ी गेंद बेहद प्रिय थी । खाली वक्त होने पर रुजैल अपने महल के बाहर सुंदर बगीचे में गेंद खेल कर मन बहलाया करती थी ।

एक दिन रुजैल गेंद को जोर-जोर से उछालकर खेल रही थी । जैसे ही सूर्य की किरणों में गेंद चमकती थी, उसकी रोशनी चारों ओर फैल जाती थी । उस रोशनी को देखने में रुजैल को बड़ा आनंद आ रहा था ।

एक बार गेंद अचानक जोर से उछली और बगीचे के बीचों बीच बने तालाब में जा गिरी । गेंद पहले लिली के पत्ते पर रुकी । रुजैल गेंद पकड़ने के लिए दौड़ी, पर तब तक गेंद पानी में जा चुकी थी । सोने की गेंद होने के कारण गेंद पानी में डूब गई ।

रुजैल एकदम उदास हो गई । उसने अपना हाथ पानी में बढ़ाने की कोशिश की, पर गेंद का कहीं अता-पता नहीं था । तभी अचानक उसे एक फूल पर बैठा एक हरा-सा बदसूरत मेंढ़क दिखाई दिया ।

रुजैल को रोना आने लगा था कि अचानक मेंढ़क बोला – “यदि तुम मेरी बात मानो तो मैं तुम्हारी गेंद निकाल सकता हूं ।”

रुजैल तो अपनी गेंद के लिए पागल-सी हुई जा रही थी, बोली – “मैं तुम्हारी सारी बातें मानने को तैयार हूं । पर ऐ मेंढ़क, पहले तुम मेरी गेंद बाहर निकाल दो।”

मेंढ़क बोला – “ऐसी जल्दी भी क्या है ? पहले मेरी बात तो सुनो । मैं तालाब में रहते-रहते थक गया हूं । यदि मैं तुम्हारी गेंद निकाल दूं तो मैं तुम्हारी सोने की थाली में तुम्हारे साथ खाना खाऊंगा ।”

रुजैल जल्दी में बोली – “मुझे मंजूर है, पर मेरी गेंद तो जल्दी निकालो ।”

“तुम्हें मेरी दो शर्तें और माननी होंगी । मैं तुम्हारे चांदी के गिलास में ही पानी पीऊंगा और तुम्हारे मखमली बिस्तर पर ही सोऊंगा । यदि तुम्हें मंजूर हो तो बताओ । मैं तुभी तुम्हारी गेंद निकालूंगा ।” मेंढ़क बोला ।

रुजैल ने किसी भी बात को ध्यान से सुने बिना स्वीकृति दे दी । मन में सोचने लगी कि मेंढ़क कुछ पागल लगता है । मेरे हां करने से क्या फर्क पड़ता है । मेंढ़क चन्द क्षणों में चमकीली गेंद बाहर ले आया ।

रुजैल इतराती हुई बिना मेंढ़क का धन्यवाद किए गेंद लेकर चल दी । वह घर के अंदर आकर गेंद रखकर अपने माता-पिता के साथ खाना खाने बैठ गई ।

संगीत की मीठी-मीठी धुन बज रही थी, सब लोग मद्धम रोशनी में खाना खाने में व्यस्त थे । मेहमान भी मधुर धुनें सुनते हुए भोजन का आनंद ले रहे थे । रुजैल बादशाह व रानी के साथ मेज पर बैठी सोने-चांदी के बर्तनों में भोजन खाने लगी । रुजैल के पीछे खड़े नौकर उसके हाथ-पैर साफ कर उसकी खाने में मदद करने लिए उसके पीछे खड़े हो गए ।

अचानक दरवाजे पर ‘हांप-हांप’ की आवाज सुनाई दी । सभी का ध्यान उस आवाज की ओर आकृष्ट हो गया । रुजैल मेंढ़क को बिल्कुल भूल चुकी थी । उसने नौकर को दरवाजे पर जाकर देखने का आदेश दे दिया ।

मेंढ़क ने नौकर से कहा – “मुझसे राजकुमारी रुजैल ने अपने साथ भोजन करने का वादा किया है, अत: मैं भोजन करने आया हूं ।” मेंढ़क की बात सुनकर नौकर चौंक गया ।

नौकर ने रुजैल से आकर कहा तो रुजैल गुस्से में बोली – “नहीं, मैं किसी मेंढ़क को नहीं जानती, दरवाजा बंद कर दो ।” नौकर दरवाजा बंद करने जाने लगा तो बलसोरा के बादशाह बोले – “प्यारी रुजैल, याद करो, कहीं तुमने किसी मेंढ़क से वादा तो नहीं किया । हम शाही लोग किसी से वादा करके तोड़ते नहीं ।”

पिता की बात सुनकर रुजैल घबरा गई । उसने देखा सभी मेहमानों की निगाहें उसी पर टिकी थीं । रुजैल ने चुपचाप मेंढ़क को अंदर लाने की स्वीकृति प्रदान कर दी ।

मेंढ़क बोला – “रुजैल, मैं तुम्हारे पास बैठकर भोजन करूंगा ।” रुजैल ने मेंढ़क को अपनी कुर्सी पर बिठा लिया । तो मेंढ़क बोला – “तुमने मुझे अपनी थाली में भोजन कराने का वादा किया था, मैं तुम्हारी थाली में भोजन करूंगा, मुझे मेज पर पहुंचा दो ।”

मेंढ़क की बात सुनकर रुजैल को बहुत गुस्सा आ रहा था, परंतु वह अपने पिता की निगाह देखकर चुप हो गई । उसने मेंढ़क को चुपचाप थाली के पास बिठा दिया । मेंढ़क के भोजन शुरू करते ही रुजैल ने अपने हाथ रूमाल से पोंछ लिए । उसे बदसूरत मेंढ़क से बेहद चिढ़ हो रही थी ।

रुजैल ने अपने खूबसूरत चांदी के गिलास में पानी पीना शुरू कर दिया । मेंढ़क बोला – “रुजैल मुझे भी अपने गिलास में पानी दो न, मुझे बड़ी प्यास लगी है ।” मेंढ़क की बात सुनकर रुजैल ने गिलास अपनी तरफ खींच लिया और गुस्से से मेंढ़क को देखने लगी ।

इस पर मेंढ़क बोला – “गुस्सा क्यों होती हो रुजैल, तुम्हीं ने तो वादा किया था कि अपने चांदी के गिलास में मुझे पानी पिलाओगी ।” रुजैल ने खिसियाते हुए गिलास मेंढ़क की तरफ बढ़ा दिया और चुपचाप उठ कर चल दी ।

मेंढ़क के मुंह से रुजैल बार-बार अपना नाम सुनकर जली-भुनी जा रही थी । तभी मेंढ़क बोला – “अपना तीसरा वादा भूल गईं क्या ? मुझे भी बड़ी नींद आ रही है, अपने साथ मुझे भी ले चलो ।”

रुजैल गुस्से में बोली – “नहीं, कभी नहीं ।” तभी बादशाह प्यार से रुजैल से बोले – “प्यारी बेटी, तुम्हें वादा करने से पहले सोचना चाहिए था । अब वादा किया है तो मेंढ़क को भी अपने साथ ले जाओ ।”

रुजैल के पीछे ‘हांप-हांप’ कर उछलता हुआ मेंढ़क भी चल दिया । दो सीढ़ी ऊपर जाने के बाद ही मेंढ़क बोला – “मैं बहुत थक गया हूं, मुझे भी ले चलो उठाकर रुजैल ।” रुजैल ने चुपचाप मेंढ़क को उठा लिया और सोचने लगी कि इसे खाली कमरे में छोड़ दूंगी ।

थोड़ा आगे जाकर रुजैल ने मेंढ़क को एक खाली कमरे में बंद कर दिया और अपना कमरा अंदर से बंद करके सोने चली गई । रुजैल अब निश्चिंत थी कि मेंढ़क को दूसरे कमरे में बंद कर दिया है । इसी निश्चिंतता के कारण रुजैल को लेटते ही नींद आ गई ।

पर कुछ ही मिनटों बाद दरवाजे पर ‘हांप-हांप’ की ठक-ठक सुनाई दी । रुजैल की आंख खुल गई और वह डर गई, कहीं उसके पिता को मेंढ़क की आवाज सुनाई न दे जाए, उसने चुपचाप दरवाजा खोल दिया और जमीन पर पड़े कालीन पर मेंढ़क को सो जाने को कह कर स्वयं पलंग पर लेट गई ।

पर मेंढ़क रुजैल को तंग किए जा रहा था और रुजैल झुंझलाते हुए भी कुछ करने में असमर्थ थी । “सुलाना चाहती हो, अपना वादा भूल गईं क्या ?”

“वादा, वादा, वादा…” रुजैल गुस्से में भर उठी । उसने मेंढ़क को उठाकर जोर से खिड़की के बाहर फेंक दिया, पर यह क्या, वह पलट भी न पाई थी कि उसने देखा कि बगीचे में गिरते ही मेंढ़क राजकुमार बन गया है । चांदनी में राजकुमार का यौवन और भी निखर रहा था ।

राजकुमार को देखकर रुजैल ठगी सी रह गई, ऊपर से ही बोली – “तुम कौन हो ? मैं तुमसे मिलना चाहती हूं ।” राजकुमार ने रुजैल को नीचे आने का इशारा किया ।

रुजैल मेंढ़क से जितना ऊब चुकी थी, राजकुमार के पास जाने को उतना ही व्याकुल हो उठी । वह राजकुमार के पास पहुंची तो राजकुमार से मेंढ़क के बारे में पूछा, राजकुमार ने मेंढ़क के बारे में बताया ।

“मैं भी तुम्हारी तरह सिर्फ सुंदर चीजों से प्यार करता था । एक बार मैं शिकार पर गया था कि जंगल में मुझे एक बदसूरत परी मिली । मैं उसे देखकर हंस पड़ा । बस, उस बदसूरत परी ने मुझे श्राप दे दिया कि तुम जिस सुंदरता पर घमंड करते हो वह बदसूरती में बदल जाएगी और तुम हमेशा के लिए एक बदसूरत मेंढ़क बन जाओगे ।”

मैंने परी से बहुत क्षमा-याचना की तो परी ने मुझे श्रापमुक्त होने का तरीका बता दिया कि यदि कोई खूबसूरत राजकुमारी किसी चांदनी रात में तुम्हें गुस्से में मारेगी तो तुम पुन: पुराने स्वरूप में आ जाओगे । यदि मैं इस प्रकार की शर्तें न रखता और रात में तुम्हारे बिस्तर पर सोने की जिद न करता तो हरगिज रात में मुझे गुस्से से मारने वाली तुम जैसी राजकुमारी न मिलती और में श्रापमुक्त न होता ।

बगदाद के राजकुमार मोबारेक की बात सुनकर राजकुमारी रुजैल का दिल पसीज उठा और वह उसे इज्जत के साथ महल में ले आई । सुबह को उसका परिचय अपने माता-पिता से करवया । फिर बहुत धूमधाम से राजकुमारी रुजैल और राजकुमार मोबारेक की शादी हो गई ।

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Italy ki Lok Kathayen-7(इटली की लोक कथाएँ-7)

कहानी- वफ़ादार शेर: इटली की लोक कथा

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पुराने समय में यूरोप में धनी लोग अपने यहाँ गुलाम रखा करते थे । उन गुलामों को अपने स्वामी की हर आज्ञा का पालन करना पड़ता था । ऐसे ही एक दास का नाम एन्ड्रोक्लीज़ था । एन्ड्रोक्लीज़ का स्वामी अपने गुलामों के साथ जानवरों सा व्यवहार करता था । उनसे बहुत काम लिया जाता था फिर भी उन्हें भूखा रहना पड़ता था । एन्ड्रोक्लीज़ को भी दिन-रात यातना सहनी पड़ती । एक दिन वह यातनाओं से तंग आकर चुपके से भाग गया । वह जंगल की पहाड़ियों के बीच एक गुफा में रहने लगा ।

एक दिन वह जंगल में घूम रहा था कि उसने सामने से आते हुए एक शेर को देखा । एन्ड्रोक्लीज़ डर गया । वह शेर से दूर भागना चाहता था परंतु उसे उपयुक्त अवसर नहीं मिला । शेर धीरे- धीरे उसके पास आया और बैठ गया । वह अपना अगला पैर बार – बार उठाकर एन्ड्रोक्लीज़ को कुछ इशारा कर रहा था । उसका भय दूर हो गया । उसने ध्यान से देखा तो पाया कि शेर के पंजे में एक बड़ा-सा काँटा गड़ा हुआ था । उसने तुरन्त काँटा खींचकर निकाल दिया और घाव पर जड़ी-बूटियों का रस डाल दिया । शेर को आराम मिला । उसने एन्ड्रोक्लीज़ को कोई हानि नहीं पहुँचाई ।

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Italy ki Lok Kathayen-5(इटली की लोक कथाएँ-5)

इटालो कैलवीनो की कहानी- तीन डैक का जहाज: इटली की लोक कथा

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एक बार की बात है कि एक बहुत ही गरीब पति पत्नी थे जो देश की बस्ती से काफी बाहर की तरफ रहते थे। उनके एक बच्चा हुआ पर वहाँ आस पास में कोई ऐसा आदमी नहीं रहता था जो उस बच्चे के बैप्टाइज़ेशन के समय उसका गौडफादर बन सकता।

वे लोग शहर भी गये पर वहाँ भी वे किसी को नहीं जानते थे। और बिना गौडफादर के वे अपने बच्चे को बैप्टाइज़ भी नहीं करा सकते थे। वे शहर से नाउम्मीद हो कर लौटने ही वाले थे कि उन्होंने चर्च के दरवाजे पर एक आदमी बैठा देखा जिसने एक काला शाल ओढ़ रखा था।

उन्होंने उससे भी पूछा — “जनाब, क्या आप मेरे इस बेटे के गौडफादर बनेंगे?” वह आदमी राजी हो गया और इस तरह उनके बच्चे का बैप्टाइज़ेशन हो गया।

बैप्टाइज़ेशन करा कर जब वे चर्च से बाहर निकले तो उस अजनबी ने कहा — “मुझे अब अपने गौडसन को कोई भेंट भी तो देनी चाहिये न, तो लो यह बटुआ लो। इस बटुए के पैसे को तुम इसका पालन पोषण करने में और इसको पढ़ाने लिखाने में खर्च करना और जब यह पढ़ना सीख जाये तो इसको यह चिठ्ठी दे देना।”

बच्चे के माता पिता बच्चे के गौडफादर की यह भेंट देख कर बड़े आश्चर्यचकित हुए। इससे पहले कि वे उसको धन्यवाद देते या उसका नाम पूछते वह आदमी तो वहाँ से गायब ही हो गया।

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Italy ki Lok Kathayen-3(इटली की लोक कथाएँ-3)

इटालो कैलवीनो की कहानी-खुशी की तलाश: इटली की लोक कथा

राजा गिफ़ाड एक शांतिपूर्ण और शक्तिशाली राज्य पर शासन करते थे। उनकी प्रजा उन्हें पूजती थी और पूरी तरह उनपर विश्वास करती थी। साम्राज्य बहुत सुखी था।

राजा का एक युवा पुत्र राजकुमार जोनाश था। बुद्धिमान, प्रतिभाशाली और खूबसूरत युवक जोनाश कुछ दिनों से गहरी अप्रसन्नरता की स्थिति में था। अनेक प्रयासों के बाद भी राजा समझ नहीं पा रहा था कि उसका पुत्र हर समय इतना दुखी क्यों  रहता है। राजकुमार अकसर अपने कमरे कीखिड़की के पास बैठकर शून्य दृष्टि से खिड़की से बाहर देखता रहता। उसे अपने आस-पास घट रही घटनाओं में कोई दिलचस्पी नहीं थी। भव्य समारोहों और शाही उत्सवों में भी वह अप्रभावित-सा रहता।

राजा गिफ़ाड बहुत दिनों तक यह सहन नहीं कर पाए और उन्होंने अपने पुत्र से यह पूछने का निर्णय किया कि कौन-सी बात उसे परेशान कर रही है।

“जोनाश, कौन-सी बात तुम्हें इतना खाए जा रही है? तुम्हारे पास किस चीज़ की कमी है? कौन-सी चीज़ तुम्हें इतना परेशान कर रही है? कुछ समय से तुम खुश नहीं हो! मुझे बताओ, मैं तुम्हारी मदद करने की कोशिश करूँगा।”

युवा राजकुमार ने बस कंधे उचका दिए।

“क्या किसी हसीना ने तुम्हें सम्मोहित कर लिया है? महल में भटकने की बजाय उसके लिए अपना प्रेम प्रदर्शत करने के इससे बेहतर तरीके हैं।’

“नहीं पिता जी, यह लड़की की बात नहीं है। सच में मैं नहीं जानता कि मैं इतना दुखी क्योंए हूँ। मैं किसी चीज़ में खुशी महसूस नहीं करता। मैं खुश रहना चाहता हूँ, लेकिन नहीं जानता कि ऐसा कैसे करूँ।”

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America ki Lok Kathayen-1(अमेरिका की लोक कथाएँ-1)

कहानी-बाँसुरी का कलाकार: अमेरिका की लोक कथा

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एक बार एक गांव में एक लड़का रहता था । उसके मां-बाप बचपन में ही गुजर गए थे । इस दुनिया में उसका सगा कोई न था । उसके जन्म लेते ही उसकी मां की मृत्यु हो गई थी । सब लोग उसे रेवन कहकर पुकारते थे ।

रेवन को अड़ोसी-पड़ोसियों ने मिलकर पाला था । वह एक वक्त का खाना किसी एक के घर खा लेता और दूसरे वक्त का खाना किसी दूसरे के यहां खा लेता था । सभी ने उसे बचपन से अनाथ देखा था, इसलिए सबकी हमदर्दी उसके साथ थी ।

रेवन सबका प्यार और हमदर्दी पाकर आलसी बन गया था । वह बारह-तेरह वर्ष का हो चला था, लेकिन उसका किसी काम में मन नहीं लगता था । वह अपना वक्त इधर-उधर खेतों में घूमते हुए गुजार देता था । खाली बैठकर वह बांसुरी बजाता रहता था ।

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Yugoslavia ki Lok Kathayen-1 (युगोस्लाविया की लोक कथाएँ-1)

कहानी-अन्याय और अज्ञान का अन्त-युगोस्लाविया की लोक-कथा

समुद्र के किनारे मछुआरों की एक छोटी सी बस्ती थी। एक दिन जब मछुआरे मछली पकड़ने जा रहे थे, उन्होंने देखा कि एक बूढ़ा पानी में खड़ा है। वह हाथ हिला-हिलाकर कह रहा था, “मत जाओ, रुक जाओ, तूफान आ रहा है, सब डूब जाओगे!”

उस बूढ़े को पहले कभी किसी ने नहीं देखा था। अधिकतर मछुआरों ने समझा, शायद कोई पागल भटककर इधर आ गया है। वे अपनी नावें लेकर आगे चले गए। वे बूढ़े पर हँस रहे थे। पर कुछ मछुआरों पर बूढ़े की बात का असर हुआ और वे मछली पकड़ने नहीं गये। थोड़ी देर बाद सचमुच बहुत ज़ोर का तूफान आ गया। गये हुए मछुआरे नहीं लौटे-वे तूफान की चपेट में आकर डूब गए थे।

अब बस्ती के लोगों ने बूढ़े की चेतावनी की सच्चाई समझ गई थी। वे सब इकट्ठे होकर उसे ढूंढने निकल पड़े । वह समुद्र के किनारे बैठा था, बस्तीवालों को देखकर बोला, “मैंने तो उन लोगों को पहले ही मना किया था। अपने से बड़े आदमी की बात पर ध्यान देना अच्छा रहता है।”

बूढ़े ने एक चट्टान पर झोपड़ी बना ली और वहीं रहने लगा। मछुआरों ने भी निश्चय कर लिया कि आगे से बूढ़े की हर चेतावनी सुनेंगे। बूढ़े की हर भविष्यवाणी सही होती थी। वह कई दिन पहले बता देता था कि अमुक दिन इस समय तूफान आयेगा। जिससे उस बस्ती का कोई भी मछुआरा तूफान में नहीं फँसा।

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Greek Lok Kathayen-1 (यूनानी लोक कथाएँ-1)

कहानी- सोने की लालसा- ग्रीस की लोक कथा

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ग्रीस देश का राजा मिडास बड़ा लालची था। उसका सबसे प्रिय काम था, अधिक से अधिक सोना जमा करना और उन्हें गिनते रहना। वह बड़े से महल में रहता था, पर उसे और ज्यादा बड़ा महल चाहिए था। ढेर सारे नौकर-चाकर थे, पर और नौकर चाहिए थे। उसकी एक प्यारी सी बेटी थी, जिससे वह सबसे अधिक प्यार करता था। उसके महल के आगे एक सुन्दर सा बगीचा था जिसमे उसकी बेटी को खेलना-कूदना बहुत पसंद था। सुन्दर फल-फूल उसे बहुत अच्छे लगते थे पर मिडास उन्हें देखकर सोचता कि ये सब सोने के होते तो कितना अच्छा होता। दिन का ज्यादा समय वह अपने खजाने में ही बीतता और सोचता रहता कि किसी तरह उसे और ज्यादा खजाना मिल जाये।

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पागल (Paagal) Ch. 2

रखवाला (Rakhwala): Protector

समय बीतता चला गया, संतोष ने भी बच्चों को टोकना बंद कर दिया था, पर पूरा ध्यान रखता कि रूबी और उसके पिल्लों के आस-पास कोई न जाए| पिल्ले भी अब थोड़े बड़े होने लगे थे पर संतोष के अलावा और किसी इंसान से घुलते मिलते न थे|

दिवाली आने वाली थी, चलते फिरते पटाखों की आवाज़ सुनाई देने लगी थी| बच्चों का क्या है, जहाँ चार दोस्त इकठ्ठा हुए, पटाखा निकाला और फोड़ दिया| लोगों को परेशान करने में मानों मज़ा आता हो| खैर बचपन में तो सभी शरारत करते हैं पर चिराग और मयंक तो अलग ही थे, एकदम हाथ से निकले बिगड़ैल बच्चे| माँ-बाप ने भी मानों सर पर चढ़ा रखा हो| दोस्तों में वर्चस्व दिखाने की होड़ में कभी इंसानों को परेशान करते तो कभी जानवरों को| मोहल्ले से ले कर स्कूल तक सभी को पता था कि बच्चे शैतान हैं|

रूबी भी परेशान थी, उसके और बच्चों के तो खासे दुश्मन थे दोनों| बेचारी खाने की मजबूरी में सोसाइटी में टिकी थी| उस दिन तो एक पिल्ले को कान से उठा लिया था और दो की टांग एक साथ बांध दी, जब बचने को चिल्लाए तभी तो संतोष ने डांटा था और बात बढ़ गयी थी|