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Ishhoo Exclusive Satire/ Hasya Vyang Story

बड़ो की कहानी/Badon ki Kahani

कहानी-झगड़े की जड़ (Jhagde ki Jad)

“बिल्लू की मम्मी, बाहर आओ…….अरे क्या नालायक बच्चे की माँ है….बाहर आओ….” पिंकू की माँ गुस्से में चीखती हुई बोली।

अगले घर से बिल्लू की माँ गरजी, “क्या हो गया क्यों चीख रही हो….”

पिंकू की माँ भड़कते हुए बोली, “अरे तेरा लौंडा है या जानवर…कोई तहज़ीब सिखाई है या नहीं….”

“ए…. आवाज़ नीची कर….क्या भौक रही है….सास से डांट खा कर आई है क्या?” बिल्लू की माँ पलट कर बोली।

पिंकू की माँ गुस्से में तमतमाई हुई बोली, “ए तू देख अपने को, और अपना घर….जानवर जैसी औलाद पैदा की है….देख कितनी ज़ोर से मारा है मेरे पिंकू को…”

बिल्लू की माँ ने बिल्लू को देखा, पूरी तरह धूल में सना खड़ा था, वो बोली, “बिल्लू…बिल्लू… हाय राम, क्या हो गया तुझे….ये कमीज़ कैसे फट गई….चुड़ैल देख अपनी औलाद को….क्या हाल कर दिया रे मेरे बच्चे का।”

पिंकू की माँ गरजी, “ए…. जबान संभाल…. तू चुड़ैल… तू डायन….अरे संभाल तेरे जानवर को…”

बिल्लू की माँ ने बराबर की टक्कर देते हुए कहा “जबान संभाल कर बात कर….तेरी गज़ भर लंबी जबान काट कर चूल्हे में डाल दूंगी। देख रही हो बहन,…इसी जबान के चलते रोज़ घर पर लात खाती है….न पति सेठता है न सास…..अरे दो बार तो घर से निकाल भगाया था” 

अब तो पिंकू की माँ और भी भड़क गई थी, बोली, “जा जा कमीनी….तू देख अपना घर….पति घर पर पड़ा रहता है और खुद दिन भर बाहर घूमती फिरती है…”

बिल्लू की माँ बोली, “चुड़ैल, इलजाम लगाती है…तू देख अपना घर…अरे सुनते हो जी! देखो तो बिल्लू का मार- मार कर क्या हाल कर दिया है….बाहर आओ।”

पिंकू की माँ भी अपने पति को बुलाते हुए बोली, “अरे जा-जा….बुला तेरे मरद को …देखती हूँ उसे भी….सुनो! बाहर आओ जी! ये चुड़ैल अपनी औकात दिखा रही है।”

बिल्लू के पापा बाहर आते हुए बोले, “अरे क्या हो गया बिल्लू की माँ, क्यों चीख रही हो?”

“देखो जी, बिल्लू की क्या हालत कर दी है, दरिंदे की तरह नोच डाला है, पूरी कमीज का सत्यानाश कर दिया।” बिल्लू की माँ बोली

बिल्लू के पापा, पिंकू की माँ की ओर मुखातिब हुए और बोले, “पिंकू की मम्मी, समझाओ अपने पिंकू को, क्या है यह सब?”

उधर पिंकू के पापा कमीज पहनते हुए बाहर आए और गरजे, ” ए… इधर देख कर बात कर…औरत से क्या बात कर रहा है….साले अपनी औलाद को देख….हमें क्या बोलता है।”

अब बारी बिल्लू के पापा की थी, बोले, ” तमीज़ से बात कर बे….दो मिनट में औकात दिखा दूंगा…”

“@#$%%^, *&^#@@, साले मुझे औकात दिखाएगा, साले मुंह खोला तो तेरा सर खोल दूंगा” पिंकू के पापा बोले।

भड़कते हुए बिल्लू के पापा बोले, ” साले @@$%%^, *&^#@@, साले डरपोक, दम है तो हाथ लगा कर दिखा…तेरी तो..@##$%%।”

“….आ साले, ले आ गया….तेरी तो….@###$$%$, (*/#/@/@…ये ले…” पिंकू के पापा बिल्लू के पापा का कॉलर पकड़ते हुए बोले।


फिर क्या धूम-धड़ाम, ढिशूम-ढिशूम, पटका-पटकी, सर फुड़उवल……


उधर दूर पान की दूकान पर खड़ा संतोष सब तमाशा देख रहा था, बोला, “का भईया चौरसिया, क्या हो गया?”

“अरे का बताई, पहले मनोहर और परकास की मेहरारू लड़ीं, फिर ओके बाद उ दोनों।” चौरसिया पान पर कत्था मलते हुए बोला।

“अबे पर लड़े काहे….जमीन, जायजाद या औरत…झगड़ा कौन बात का है।” संतोष ने उचक कर तमाशा देखते हुए पूछा।

“अरे नहीं…. दोनों के लौंडे लड़ लिए, उसी बात पर टंटा सुरु…पहले गाली- गलौज फिर सर फुड़उवल।” चौरसिया पान पकड़ाते हुए बोला।

संतोष ने पान मुंह में डालते हुए पूछा, “अच्छा…लौंडे कहाँ है?….ठीक तो है?….ज्यादा मार लगी है क्या?” 


चौरसिया मुस्कुराया और बोला, “काहे की मार, वो देखो, दोनों पारक में खेल रहे हैं।”

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Hasya Kahani: Pocket Radio /हास्य कहानी : पॉकेट रेडियो -छोटी उम्र की खुराफात का एक नमूना

पिछले पंद्रह मिनट से हम तीन फिट की दीवार पर कान पकड़े खड़े थे और माता जी गुस्से से हाथ में हमारा ही प्लास्टिक का बैट लिए इंतजार कर रहीं थी कि ज़रा हिले तो दो चार लगा दें| हमें तो समझ ही नहीं आ रहा था कि ऐसा भला क्या हो गया जो इतनी ज़बरदस्त सजा दे दी गई थी, पर माता जी का पारा गरम था, एक तो उनके आदेश का उल्लंघन ऊपर से एक बड़ा कांड…..

बात उन दिनों की है जब हम शर्ट और हाफ पैंट पहना करते थे, वैसे हाफ पैंट तो अब भी पहनते है पर शौखिया, उस समय वो हमारा ऑफिशियल ड्रेसकोड हुआ करता था| जी हाँ उमर होगी कोई आठ या नौ साल| इलाहाबाद में हम अपने माता पिता और छोटी बहन के साथ किराये के मकान में रहा करते थे| पिता जी टेलीफोन डिपार्टमेंट में टेक्निकल इंजिनियर थे और माता जी ने घर परिवार का बीड़ा उठा रखा था|

ज़िन्दगी सुकून भरी थी, घर से स्कूल और स्कूल से घर, न मोबाइल था न केबल टीवी| लकड़ी के शटर वाले ब्लैक एंड वाइट टीवी पर दूरदर्शन और लगभग उतने ही बड़े रेडियो में बिनाका गीतमाला| घूमने के लिए गर्मियों की छुट्टीयों में कानपुर अपनी दादी – नानी का घर|

सितम्बर या अक्टूबर की बात होगी, मौसम ने करवट लेना शुरू ही किया था कि एक रोज़ कानपुर से हमारे बड़े पापा के ज्येष्ठ पुत्र और हम सब में सबसे बड़े, भाई साहब अपने घनिष्ट मित्र के साथ इलाहाबाद आए| एस.एस.सी. का इम्तहान था और सेंटर इलाहाबाद पड़ा था| घर में मेहमान आए तो कौन खुश नहीं होता, न खेलने जाने की रोक-टोक, न डांट का डर और पूड़ी-पकवान अलग से| हमारा भी हाल वही था, इन बातों से एक अलग ही ख़ुशी थी मन में|          

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हास्य कहानी- रील कट गई…. Hasya Kahani

नमस्ते! कभी इंटरनेट के महासागर से निकले गूगल रूपी यक्ष से पूछियेगा ‘Hangover meaning in Hindi’, जवाब मिलेगा ‘अत्यधिक नशा’…..अगर आप सोच रहे हो कि आज लेखनी का श्रम, ‘हैंगओवर में क्या करें? हैंगओवर के बचाव, या हैंगओवर क्या होता है? जैसे विषयों पर है तो आप निराश होंगे…आज जो स्याही घिसी है, वह हॉस्टल लाइफ या नौकरी के शुरुआती पड़ाव पर हैंगओवर के अलग रूप का वर्णन करती है, जिसे हम आंग्लभाषा में ब्लैकआउट (Blackout) और आम भाषा में ‘रील कटना’ कहते है| जो अनुभवी हैं, वो मन ही मन मुस्करा रहें होंगे और जो अनभिज्ञ हैं, उनका ज्ञानवर्धन इस कहानी के दरमियान हो ही जायेगा…..   

हास्य कहानी- रील कट गई….

दूर कहीं जानी पहचानी धुन बज रही थी, लगा की सुनी सुनाई सी है, कान के पट थोड़े और खोले तो जान पड़ा कि अपने ही मोबाइल की रिंगटोन थी, छह….पूरी नीद टूट गयी| भारी पलकों से आँख खोली तो ऑटोमोड में हाथ मोबाइल ढूँढने लगा, ज़ोर लगा कर देखने पर भी आँखें धुंधली तस्वीर ही उतार  पा रहीं थीं, लगा की कुछ मिस्ड-काल जैसा लिखा है| मरी-थकी उँगलियों से जब गौर करवाया तो देखा आठ मिस्ड-काल थे, उसमें से तीन तो बॉस के, तब कहीं जा कर मुकुंद के शरीर में उर्जा का संचार हुआ| अब दिमाग तो इशारा कर रहा था कि उठ जाओ पर शरीर था कि अलग ही सुर पकड़े बैठा था| सर दर्द, बदन दर्द, गले में खराश, पेट में भारीपन, पूरा शरीर जैसे टूट रहा था| खैर मुकुंद को समझते देर न लगी की वह अत्यधिक नशे यानी हैंगओवर का शिकार हुआ था| उठ कर बैठा तो एक और अचम्भा, अरे, यह तो अपना ही बिस्तर है, यानी अपने ही घर| रजाई से पैर बाहर निकाला तो बाकायदा, टी-शर्ट और पायजामा पहन रखा था|

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Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang

21 डेज टु क्विट अ हैबिट/ 21 days to quit a habit

लॉकडाउन में सिगरेट, शराब और पानमसाला के नशेबाजों पर एक व्यंग. (A satire on smokers and drinkers during lockdown)

नमस्ते! सिगरेट, शराब, पान-मसाला खाने वालों की ज़मात में अक्सर यह नसीहत आम सुनाई देती है कि, आप इक्कीस दिन किसी बुरी आदत से तौबा कीजिये, बाईसवें दिन से आप उस आदत से निजात पा चुके होंगे| सुना तो लगभग सभी ने होता है पर इतना टाइम है किसके पास? एक दो दिन बिना रोटी के तो रह सकते है पर मज़ाल है जो नशे पत्ती का जुगाड़ भूल जायें|

आज नशेबाजों का पक्ष इतनी मजबूती से रख पाने का राज़ यह है कि, हम स्वयं उस दौर से गुज़ार चुके हैं| आदत भी ऐसी की आँख खुलने से पहले तकिया के नीचे टटोल लिया करते थे…अगर सिगरेट है तो ठीक, वर्ना एक दो का तो दिन ख़राब होना ही था| पता ही नहीं था की हम सिगरेट को पी रहे है या सिगरेट हमें| शादी से पहले तक तो बचे हुए टोटों से तंबाखू इकठ्ठा कर आधी सिगरेट जितना जुगाड़ कर लिया करते थे, अब आधी रात कहाँ जाएँ सिगरेट ढूँढने, आलस भी किसी नशे से कम थोड़े ही होता है| शादी हुई तो ऐश-ट्रे से अधजली सिगरेट बटोरने की, और बच्चे के बाद पूरी सिगरेट की आदत छूट ही गयी| खैर मेरी कहानी फिर कभी, आज इतनी बड़ी भूमिका बांधने का उद्देश्य इक्कीस दिन वाली नसीहत पर गौर करना है| तो चलिए शुरू करते हैं…….

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Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang

चटोरों की व्यथा/Chatoron ki vyatha

लॉकडाउन में स्ट्रीट फूड को तरसता एक वर्ग।(Lockdown mein Street food ko tarasta ek varg)

नमस्कार! आज आपका ध्यान उन कुछ मुद्दों पर जो समाज़ ने नकार रखा है….न तो मीडिया में कवरेज मिलेगी न सोशल मीडिया में। घरों को पलायन करते कामगार मज़दूर हो, बिगड़ती अर्थव्यवस्था हो, चाइना हो या पेट्रोल के दाम, हर मुद्दे पर बात करने के लिए दसियों बुद्धिजीवी बैठे है टीवी चैनलों पर।
पर आज बात एक ऐसे मुद्दे की जो भले ही इतना ज्वलंत न लगें पर समाज़ के एक वर्ग के लिए काफी मायने रखता है । खैर किसी न किसी को तो पक्ष रखना ही था , मीडिया न सही हमारी कलम सही । उम्मीद करता हूँ, उस वर्ग के दर्द को आप तक पहुंचा पाऊंगा।
आज बात उस वर्ग की जो बिना किसी स्वार्थ या हीनभावना के समाज में स्वाद की परिभाषा का विस्तारीकरण करता रहा है। जी हां बात जंक-फूड , स्ट्रीट-फूड के उन निष्ठावान उपभोक्ताओं की जिन्हें हम आम बोल चाल की भाषा में “चटोरे” बोलते आये हैं।
वैश्विक महामारी क्या आई बेचारे स्वाद ही भूल गए ….क्या बच्चे, क्या आदमी और क्या औरतें, चटोरों की बिरादरी पर ऐसी गाज़ गिरी कि दर्द भी बयां न कर सके। सरकार ने तो खानापूर्ति कर दी, बोल दिया कि टेक-अवे चालू हैं। अब सरकार को भला कौन समझाए कि पानीपुरी की दुकान पर सी-सी करते बोलना कि “भईया, एक सूखी पापड़ी देना मीठी चटनी के साथ”, ये वाली फीलिंग कौन से टेक-अवे में आती है।
कहां रोज़ शाम ऑफिस से लौटते समय ट्रांस्पेरेंट थैली में अखबार के लिफ़ाफ़े में रखे समोसे…..लिफ़ाफ़े पर उभरने वाले तेल के निशान बता दिया करते थे कि समोसे गरम हैं। गेट की आवाज़ सुनते ही बीवियां चाय चढ़ा दिया करतीं थी। अब तो वर्क फ्रॉम होम है। अच्छा, ऐसा नहीं है कि कोशिश न की हो पर समझ ही न आया कि समोसा खा रहे है या आलू भरी पूरी। अब कहाँ प्रोफेशनल हलवाई और कहाँ यू-ट्यूब के नौसीखिये। अरमान दिल के दिल में ही रह गये।
ऐसी ही हालत कुछ लाल , नीली , पीली मोटरसाइकिल पर उसी रंग के हेलमेट में आने वाले दूतों का इंतज़ार करने वालों की है। अब तो ऐसा लगता है जैसे आंखे पत्थर हो गयी हो। एक समय था कि सोसाइटी में विज़िटर के नाम पर सिर्फ डिलेवरी बॉय ही दिखते थे। हालत ये थी कि सोसाइटी का वॉच मैन मोटरसाइकिल का रंग देख कर बता देता था कि किस फ्लैट का आर्डर है….। क्या पिज़्ज़ा, क्या बर्गर, क्या हक्का नूड्ल्स सारे स्वाद छिन गए। अब कहां बाज़ार का स्वाद और कहां घर का, लगता ही नहीं वही डिश खा रहे हों।


एक और दर्द इसी वर्ग की महिला शाखा का जिनकी सारी सहूलियत ही छीन ली इस लॉकडाउन ने। कहां हर चौथे दिन स्पीड डायल पर पती को फ़ोन किया और बोला, “सुनो! आज कुछ बाहर से आर्डर कर लेते है….।” पती भी बेचारा, कौन दिमाग खपाए, अभी मना कर दो तो दो दिन ख़राब। ऐसे पीड़ित पतियों को तो जैसे बदले का मौका मिल गया हो। टेक-अवे तो था पर करोना -करोना बोल कर सारा हिसाब पूरा कर लिया। ऊपर से रोज़ नया वीडियो पकड़ा देते हैैं कि, “जानू! आज ये वाली डिश ट्राई करते हैं।” यू-टयूबर्स का क्या है सब्सक्राइबर बढ़ाने के लिए बोल दिया बाज़ार जैसा कबाब घर पर बनाएं , कभी ट्राई किजिए और बोलिये क्या है वही स्वाद? अजी कितनों ने तो मन्नत मांग ली है कि, करोना ख़तम हो और ये वर्क फ्रॉम होम की बला टले।
अब समाज़ को कौन समझाये कि, एक भोलेनाथ थे जिन्होंने पृथ्वी बचाने के लिए हलाहल पी लिया था, और एक ये चटोरे है जो जंक फ़ूड खा खा कर न सिर्फ अपना पेट भरते है बल्कि लोकल से ले कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कितने ही कर्मचारियों का पेट पालते हैं।
एक जिम्मेदार लेखक कि तरह मैंने तो चटोरों की व्यथा आप तक पहुंचा दी। अब दुआ कीजिए कि जल्द करोना खत्म हो और बाज़ारों में वापस वही रौनक लौटे।

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लॉकडाउन में वर्क फ्रॉम होम Lockdown mein Work From Home -Vyang

लॉकडाउन में वर्क फ्रॉम होम से पुरुषों की हालत बयां करता एक गुदगुदाता लेख। (Lockdown mein Work From Home se purushon ki haalat bayan karta ek gudgudata lekh)

नमस्ते!! आज बात पुरुष प्रधान युग में गृहकार्य कुशलता के लिए तैयार होती नई खेप की | जी हाँ बात हमारे जैसे लाखों पुरुषों की जो इस करोना काल में न चाहते हुए भी घरेलू कामकाज करने को मज़बूर हैं | वैसे दबाव सिर्फ घर का होता तो कोई बात न थी, आई-गई सी होती, पर यहाँ तो दबाव सामाजिक है | पड़ोसी, दोस्त, आफ़िस के सहयोगी सभी अपनी गृहकार्य कुशलता का बखान कर रहे हैं | और तो और नई- नई डिश, नए- नए पैतरे आग में घी का काम कर रहें है |  एक मिडिल क्लास आदमी के लिए बात यहाँ तक भी होती तो भी चल जाती पर जब से फ़िल्मी जगत के जाने माने सितारे ऐसा ही कुछ काम करते सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगें तो मज़बूरी को पैशन बनाना भी मज़बूरी हो जाती है | आप बोलेंगे लेखक महोदय आप इतने मज़बूर कब से हो गए? तो मैं साफ़ कर दूँ, यहाँ बात हमारी नहीं हमारे जैसे लाखों पुरुषों की हो रही है | रही बात हमारी तो, अंडे उबालने और मैगी बनाने का हुनर तो हमने लड़कपन में ही सीख लिया था | घर में बनने वाली बैगन की सब्ज़ी ने रेबलियन बनने पर मज़बूर किया और अंडे और मैगी ने पैरों पर खड़े होने में मदद की |  

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Online Class: Mahila Sashaktikaran ka ek aur udaharan

ऑनलाइन क्लास: मिडिल क्लास महिला सशक्तिकरण का एक और उदाहरण (Online Class: Middle Class Mahila Sashaktikaran ka ek aur udaharan)

करोना, कोविड-19, क्वारंटाइन, लॉक डाउन जैसे नए शब्दों को सुनते हुए आज तीन महीने हो गए और अब ऐसे लगते हैं जैसे “ चाय, बिस्कुट, और अख़बार”. खैर आज की बात कुछ अलग है, आज स्कूल का पहला ऑनलाइन “पैरेंट – टीचर मीट” है| हमारी श्रीमती जी भी एक अनुभवशील अध्यापिका हैं और पिछले कई वर्षों से अपने अध्यन कौशल का प्रयोग विद्यालय के छात्र-छात्राओं पर करती आ रही हैं|

आप पूछेंगे, इसमें नया क्या है लेखक महोदय, एक मध्यम वर्गीय परिवार की महिला अपने समय का सदुपयोग करने या जीविकोपार्जन के लिए अक्सर अध्यन क्षेत्र में अपना कौशल दिखाने उतरती है|…..तो साहब, नयापन आया उस वैश्विक महामारी के साथ जिसे करोना या कोविड -19 कहते है| पिछली एक दो पीढ़ी ने न तो ऐसी महामारी देखी थी, न सुनी थी| जैसा जैसा सोशल मीडिया पर देखते या सुनते गए अपने अपने दैनिक जीवन में अमल में लाने लगे| “कपालभाति” से ले कर “गरमी में ख़तम होता वायरस” सभी मेसेज ट्रेंड कर  रहे थे,  इस चक्कर में ना A. C सर्विस कराई ना कूलर लगाया|